में एक बार क्या हुआ कि उनका खूब सारा लोगों ने आप जैसे यह दोनों ने बहुत विरोध किया और उन विरोध करने वाले लोगों ने महर्षि दयानंद सरस्वती जी का पुतला बनाया और पुतला बनाकर के गधे पर बिठाकर के मुंह काला करके इस पुतले का सारे में को रैलियां निकाली उनका एक शिष्य था वह दौड़ा दौड़ा चला आया नया नशे बनाता मैसेजेस महर्षि जी आप का पुतला बनाकर के इस प्रकार से वहां पर जुलूस निकाला जा रहा है महर्षि शांति दे उस टाइम पर वहां उनका प्रवचन चल रहा था महर्षि ने कहा आराम से बैठ जाओ प्रवचन चल रहा है और दूसरी बात कि नकली दयानंद के साथ ऐसा ही होना चाहिए ही कि नमस्कार दोस्तों आप सभी का एक बार फिर से स्वागत है आपके अपने YouTube चैनल सके सनातन मैं इस चैनल को शुरू किए हुए 2 साल लगभग हो गए हैं और 2 साल से हमारे सभी दर्शकों कह रहे हैं कि इस्कॉन के ऊपर जरूर वीडियो बनाइए और मैंने जो लास्ट वीडियो बनाया था वह स्कैन के सपोर्ट बनाया था क्योंकि स्कैन ने अपनी मजाक बनाने वाली एक तथाकथित स्टैंडअप कॉमेडियन के खिलाफ एक्शन लिया था और मैंने कहा था कि यह अनुकरणीय हैं उसे कुछ दिन के बाद में एक और वीडियो आया स्कैन वालों की तरफ से ही और उन्होंने बताया कि मूर्ति पूजा का विरोध अक्सर हवन यज्ञ करने वाले एक समाज इससे पहले भी एक वीडियो है था जो कि बहुत प्रचारित-प्रसारित किया गया था कि आर्य समाज वालों का किस तरीके से मुंहतोड़ जवाब दिया जा रहा है इस कौन वालों के द्वारा लेकिन मैंने फिर उसके ऊपर कोई वीडियो नहीं बनाया था अभी जो वीडियो आया है उसमें बहुत सारे कुतर्क मैं कुछ तक तो पिछली वीडियो में भी थे लेकिन मुझे ऐसा लग रहा है कि इसके ऊपर एक वीडियो तो बनता है और यह वीडियो भी बहुत सभी ने हैं कि इसमें हम कुछ क्वेश्चंस शूट करना चाहते हैं जिस प्रकार से उन्होंने ताकि ताकि के नाम पर बहुत सारी और तार्किक तर्क वाली बातें रखी है उनका संज्ञान लेना और उसके ऊपर लोगों के जो ऊपर असर पड़ा है या फिर उसमें जो मतिभ्रम किया गया है उसका जवाब देना अत्यंत आवश्यक है उन्होंने इसमें यह बताया कि हम मूर्ती पूजा नहीं करते हुए गृह पूजा करते हैं विग्रह यानि कि बस एक शब्द अंतर करके उन्होंने इसको विग्रह पूजन कह दिया है और विग्रह इस वजह से कह दिया है क्योंकि उन्होंने बताया है कि हमारे यहां पर मूर्ति प्राण प्रतिष्ठा होती है तो इस मेरा सबसे पहला क्वेश्चन यह बनता है कि मूर्ति प्राण प्रतिष्ठा का कौन सा मंत्र है जो वैदिक है अ वैदिक मंत्रों की बात नहीं कर रहा हूं जो वैदिक मंत्रों उसकी ही बात होनी चाहिए दूसरी बात यह है कि जिन श्री कृष्ण महाराज की वहां पर बताई जा रही है कि मूर्ति स्थापित करके प्राण-प्रतिष्ठा करके उनकी पूजा उपासना की जाती है उन भगवान श्रीकृष्ण ने कहां पर अपने संदेश में कहा है कि इस प्रकार की गृह पूजा होनी चाहिए कहां पर उन्होंने मूर्ति प्राण प्रतिष्ठा या फिर इस प्रकार की जो मूर्ति पूजा है उसके विषय में कहां है उनका जो एक वृद्धि के साथ 18 या में श्रीमद भगवत गीता जी है और उसमें कहीं पर भी उन्होंने इस प्रकार की कोई भी पूजा चाहे मूर्तिपूजा चाहिए गृह पूजा नहीं बताई है उन्हें जहां पर बताया है वह बताया है आत्म साक्षात्कार के द्वारा परमात्मा का साक्षात्कार किया जाना उन्होंने जहां पर बताया कर्म को ही पूजा बताया है विग्रह पूजन मूर्ति पूजन आदि नहीं बताया है और इतना जितना भी लंबा चौड़ा इन्होंने भाषणबाजी की है उसका भी कहीं पर जिक्र नहीं किया है दूसरे पॉइंट पर आते हैं जिसमें मैंने कहा कि हां इश्वर जो है वह सर्वव्यापक है लेकिन हम जल के कण की भांति उनको को इस प्रकार से एक्टिव करके उन्हें बताया कि इस प्रकार से जगह-जगह से हम उनको पानी के जो गुण है जले जो कौन है उनको नहीं पी सकते भले ही वह यहां पर अदृश्य हो दिखाई नहीं दे रहे उसको भी हम को साकार गिलास में स्वरूप साकार करके ही पीना पड़ता है तब हमारी प्यास बुझती है चलिए कणों से जो कि वास्तव में फैले पड़े हैं उनसे हमारी प्यास नहीं बुझती है यहां पर यह सबसे बड़ा कुतर्क है और मैं अपने सभी दर्शकों को जहां तक वीडियो पहुंचे उनको बताना चाहता हूं कि हम जो चेतन है जो ज्ञान स्वरूप ईश्वर परमपिता परमेश्वर है उनकी तुलना हम निर्जीव पदार्थों से नहीं कर सकते हैं अर्थात चेतन की तुलना हम अवचेतन से नहीं कर सकते हैं दूसरी चीज पर आते हैं कि यदि ढक्कन पूरे वातावरण में फैले पड़े हैं और उनको हम वहां से चुप कर अपनी प्यास नहीं बुझा सकते और गिलास में उसको लेकर के साकार हमको पीना पड़ेगा तभी हमारी प्यास बुझेगी तो मैं यहां पर आपको ध्यान देना चाहता हूं कि तीन प्रकार के आधुनिक साइंस ने पदार्थ बताए हैं ठोस द्रव कि गैस ठोस में कणों की जो डेंसिटी होती है वह बहुत ज्यादा होती है जो द्रव होता है उसमें थोड़ी सी कम होती है जो कण होते थोड़े अविरल होता है दूर होते हैं और जो गैस होती उसमें और ज्यादा दूर होते हैं अर्थात गैस जो है वह और ज्यादा सूक्ष्म होती है अब मैं दूसरा पॉइंट पर आता हूं कि क्या आप 2 घंटे बिना जल के प्यासे रह सकते हैं तो आपका जवाब होगा हां यदि आप समय पूछो कि क्या आप 2 घंटे बिना सांस लिए रह सकते हैं तो बिल्कुल भी जवाब होगा आपका नहीं क्या आप 2 मिनट रह सकते तो सामान्य लोग कहेंगे बिल्कुल भी नहीं अब हम बात करते हैं कि हमारे जीवन के लिए ऑक्सीजन बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण यानि कि जेल से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है और वह इस वातावरण में अलग-अलग स्थान पर बिखरी हुई पड़ी है पूरे वातावरण में पूरे पंद्रह प्रतिशत भी ऑक्सीजन की मात्रा नहीं है और जहां पर वायु प्रदूषण और ज्यादा है तो वहां पर तो उससे भी कम है तो हम उसको साकार करके अपनी जो सांसो की प्यास है उसको क्यों नहीं बुजाते साकार सिलेंडर में है और सूजन को भर के अपने कंधो पर टांग करके मास्क लगा करके क्यों नहीं करते हैं यदि आप चलिए कणों का उदाहरण लेते हैं तो यहां पर यह चल क्यों किया जाता है कि जल का उदाहरण क्योंकि आपको सटीक बैठता है जो कि है नहीं लेकिन यदि आप अपने पॉइंट्स को सटीक बताने के लिए और अपनी जो भीड़ है जो जमात है उसको यह दिखाने के लिए कि व्ाह हमारे लोगों के कितने बड़े तर्क हैं यह दिखाने के लिए कि आप चलिए कोण में है तो ऑक्सीजन के कणों के उदाहरण क्यों नहीं लेते हैं जो कि ढक्कनों से भी अधिक सूक्ष्म है यदि आप बात करेंगे कि इश्वर यदि आप सुष्मिता की बात कर रहे हैं तो इश्वर से वैसे भी तुम ना तो जरिए कणों की नाईं ऑक्सीजन अणुओं की तुलना हो सकती है जरिए तो होगा कुछ ना कुछ आकार होता है और जांघों का भी कुछ ना कुछ साकार होगा लेकिन परमपिता परमेश्वर जो कि सर्वव्यापक है उसका इस प्रकार से कोई आकार ही नहीं है तुलना गलत और यह उदाहरण भी चौकसी आपके उदाहरण से कट जाता है और हम आते हैं अगले पॉइंट के ऊपर के प्राण है चार्जेस तो यह प्राण प्रतिष्ठा कह रहे हैं प्राण पांच प्रकार के होते हैं प्राण उदान व्यान समान इस प्रकार से हमारे शरीर के अंदर अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग प्रैकर्सर्स को बनाने वाले उनके ब्लड को लेकर जाने वाले मल-मूत्र आदि को बाहर निकालने वाले हमारे मस्तिष्क के लिए अलग और हमारे श्वसन क्रिया के लिए अलग इस प्रकार से अलग-अलग पांच प्राण होते हैं अथर्व वेद में भी प्राण सूख पूरा का पूरा 27 मंत्रों का एक प्राण सूक्त है जिसको हम अथर्ववेद 1141 से लेकर के 11 426 तक पढ़ते हैं इसमें भी इन्हीं कारणों का जिक्र किया गया है और यहां तक कि जो हमारे बादल गरजते हैं उसको हमारे वायुमंडल के प्राण की तरह गरजने वाला भी बताया गया है लेकिन इन में भी कहीं पर किसी निर्जीव वस्तु पत्थर मूर्ति में प्राण प्रतिष्ठित करें इस प्रकार का कोई मंत्र नहीं है इस प्रकार का कोई विधान नहीं है लेकिन फिर भी हम मान लेते हैं कि प्राण उसमें प्रतिष्ठित हो जाते हैं पहली चीज के उनका भोजन करना जब भोजन करके सकते हैं वह अलग ही प्राण होता है जो इसको नीचे ले जाता है ना ही तो मूर्ति भोजन को सकती है और ना ही उसको अवशिष्ट पदार्थों की तरह बाहर निकालती है ना ही उनके वंश में ब्लड होता है जो कि चल सके तो हम प्राण कहे किसको रहे हैं प्राण की जो डेफिनेशन है वह भी इनके द्वारा आज तक बताई नहीं गई है सबसे बड़ी चीज यदि के प्राण प्रतिष्ठा होती है तो इसमें एक बहुत बड़ा झोल है और वह जो लिए है कि पहले ही एक सेकेंड पहले ही प्राण निकला है उसके अंदर व्हेन ज्यों के त्यों है मस्तिष्क के सेल्स ज्यों के त्यों है हार्ड किडनी लीवर ब्लड अ भी ज्यों का त्यों है सब कुछ क्या उसके भीतर प्राण प्रतिष्ठा की जा सकती है क्योंकि उसमें प्राण हेतु सभी जितनी भी आवश्यक चीजें होनी चाहिए वह सब कुछ है प्राण के लिए उसमें जो फेल होने चाहिए श्वसन नली होनी चाहिए एवरीथिंग सब कुछ एक सेकेंड में बिगड़ता नहीं है तो क्या उसमें प्राण-प्रतिष्ठा हो सकती है और दूसरी तरफ हम चलते हैं कि जो मूर्ति है क्या उसमें प्राण-प्रतिष्ठा हो गई जबकि उसके तो नासाछिद्र भी पूरे पूरे नहीं होते हैं तो उसमें प्राण-प्रतिष्ठा किसको कहा जा रहा है और उस प्राण-प्रतिष्ठा करने के बाद में उस प्राण का चेकअप किस प्रकार से किया गया क्योंकि आप जो कह कि प्राण प्रतिष्ठा की गई है प्राण प्रतिष्ठा के लिए मंत्र होते हैं मंत्र केवल और केवल वैद्य में है वेद में इस प्रकार का कोई मंत्र नहीं है तो यह कौन से मंत्र है जो द्वारा इनके द्वारा गढ़े गए हैं दूसरी चीज के मंत्र अपने के बाद में प्राण प्रतिष्ठा होने के बाद में उसका क्या प्रमाण है कि प्राण प्रतिष्ठित हो गए हैं इस प्रकार का भी अभी तक आज तक कुछ भी तक नहीं दिया गया है अब वापस आते हैं आर्यसमाज के ऊपर होने सीधा-सीधा रहमान का नाम ले करके एक हवन करने वाले समाज की ओर इंगित किया है आर्य समाज इस बात को बहुत भली-भांति समझता है और आपके जो पूर्व के वीडियोस हैं उनसे भी हम इस बात का अधिग्रहण कर सकते हैं कि आपके विषय में कह रहे हैं तो मैं इसमें सिर्फ इतना पूछना चाहता हूं कि क्या हवन करना कोई पाप है क्योंकि उसके विषय में तो आपने बिल्कुल भी बात नहीं की है योगेश्वर श्री कृष्ण महाराज सोम हवन यज्ञ आदि किया करते थे भगवान श्रीराम स्वयं हवन यज्ञ यागादि किया करते थे उसमें दान आदि भी किया करते थे तो यदि भगवान श्रीकृष्ण जो कि सुमित भी मूर्ति उपासना पूजा इस प्रकार की ठाकुर पूजा प्राण प्रतिष्ठा नहीं करते थे जो गिवर हवन किया करते थे तो उनके चरित्र का पालन करने वाले लोगों से इतनी चिढ़ क्यों और दूसरी बात है वो हवन करने वाले समाज के लोग हैं वह चित्र की भले ही पूजा ना करें लेकिन वह चरित्र को धारण करने का संपूर्ण प्रयास करते हैं और वह चित्र की नहीं बल्कि चरित्र की पूजा में विश्वास रखते हैं उसको अपने अंदर उतार सकें इस बात का विश्वास रखते हैं अगले पॉइंट पर आते हैं उन्होंने कहा कि मैं एक बार उनके मंदिर में गया और वहां पर उनके उन महापुरुष जो फोटो थी वह दीवार पर लगी हुई थी तो मैंने कहा कि क्या मैं इसके ऊपर थूक दूं तो हरकारे यह कैसे कर सकते हो तो इन महाशय से मैं कहना चाहता हूं कि यदि आप किसी के मंदिर में नहीं यदि आप किसी के घर में भी जाएंगे और उस पर भी दीवार पर किसी फोटो पर ने ही आप यदि यह कहेंगे कि क्या मैं तुम्हारी द्वार पर थूक दूं तो भी उसके रिएक्शन यही होंगे महाराज वह किसी फोटो की बात नहीं है यदि आप थूकना ही चाहते हैं तो थूकने के लिए उपयुक्त बहुत सारे स्थान बने हुए हैं दूसरी चीज क्या आपने इस नाथू करने वाली चीज को सीधे-सीधे की पूजा से जोड़ दिया है जबकि आपने यह खुद बताया है कि हम अपने ठाकुर की पूजा कैसे करते हैं उसको हम कहते हैं कि गृह पूजा आप ने यह नहीं बताया कि उस आर्य समाज में जो कि अपनी दीवार पर ठोंकने के लिए मना किया था उसने वह मना क्यों किया यह अपने यहां पर डिस्क्राइब ही नहीं किया केवल और केवल इतनी सी बात पर के मेरा छोटा भाई एक 11 साल का है 17 साल का है यदि किसी को सड़क पर थूकते हुए देख लें तो उसको तुरंत मोदी जी याद आ जाते हैं वह तुरंत कहता है सड़क पर भी नहीं ठोकना चाहिए तो क्या आप कल यह कहेंगे कि उस मेरे छोटे भाई के लिए सड़क पूजनीय हैं क्या वह सड़क की पूजा करता है ऐसा नहीं कह सकते हैं आप जिस प्रकार से विग्रह पूजा मूर्तिपूजा अधिक करते हैं इस प्रकार से वह अपने महापुरुष की कोई पूजा अर्चना आराधना नहीं करते हैं बल्कि उनके चरित्र पर चलने का पूरा पूरा प्रयास करते हैं सबसे बड़ी चीज में महर्षि दयानंद सरस्वती जी का उदाहरण मैं आपको बताता हूं एक बार क्या हुआ कि उनका खूब सारे लोगों ने आप जैसी दोगुनी बहुत विरोध है अरुण विरोध करने वाले लोगों ने महर्षि दयानंद सरस्वती जी का पुतला बनाया और पुतला बनाकर के गधे पर बिठाकर के मुंह काला करके इस पुतले का सारे में को रैलियां निकाली उनका एक शिष्य था वह थोड़ा एक नया नशे बनाता मैसेजेस मेरे से जी आप का पुतला बनाकर के इस प्रकार से वहां पर जुलूस निकाला जा रहा है महर्षि शांति दे उस टाइम पर वहां उनका प्रवचन चल रहा था महर्षि ने कहा आराम से बैठ जाओ प्रवचन चल रहा है और दूसरी बात कि नकली दयानंद के साथ ऐसा ही होना चाहिए और पूजा सब थी पूरी सभा के चेहरे पर क्या थी मुस्कान थी मीणा पूरी सभा में किसी के भी मन के अंदर खिन्नता नहीं थी तो हम यह कहते हैं महर्षि दयानंद सरस्वती स्वामी इस बात को कह कर के गए हैं कि नकली दयानंद के साथ में ऐसा हो जाए तो कोई दिक्कत नहीं है चरित्र चरित्र सर्वप्रथम है जिस प्रकार से श्रीमद भगवत गीता जी में कहा गया है कि कर्म प्रधान है ना कि इस प्रकार के आडंबर प्रधान है अब दूसरी बात पर आते हैं जो मूर्ति आदि आपने मंदिर में लगा हुई है इसके ऊपर से चूहे हैं वह पोटी करके भी जाते हैं जो मकड़ी है वह अपने थूक से जला बना करके भी जाती है क्विकली है वह ऊपर से ही छत से ही उनके ऊपर पॉटी अधिक करती है तो क्या आपको उनकी साफ-सफाई करने की आवश्यकता नहीं पड़ती है क्या आपको गृह पूजा में जो लगातार उनको झूठा गंदा करने वाली जो विभिन्न शक्तियों है कि प्रकृति ही क्यों न हो चाहे क्या आप उसके लिए नहीं लगे रहते हैं तो इन सब बातों के कुतर्कों के पीछे केवल और केवल इतनी सी बात है कि एक दुकानदार है जिसमें यदुवंश के श्रीकृष्ण को और ठाकुर बताया जाने लगा है ठाकुर जी रूढ़ शब्द में प्रयोग किया जाता है उसके ऊपर भी आज तक किसी ने सफाई नहीं दी कि यदि वंश के तुरंत ठाकुर जी कैसे हो गए हैं इस वीडियो में सिर्फ इतना ही यह वीडियो आपको अच्छी लगे जानकारी से भरपूर लगे तो इसको सबके साथ में Share अवश्य करें और इस प्रकार से किसी के भी कुतर्क में ना आए और हम उम्मीद करते हैं कि हमारे इन प्रश्नों का उत्तर भी जरूर मिलेगा और याद आदि करना यह लोग भी शुरू करें क्योंकि सोम योगेश्वर श्री कृष्ण महाराज भी यज्ञ यागादि किया करते थे सैमसंग बोले सत्य सनातन वैदिक धर्म की जय जय हिंद वंदे मातरम
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