Monday, 2 February 2026

मुनि सत्यजित् जी ने क्यों कहा आधुनिक क्रांतिकारी इन युवाओं को Ach Satyajit Muni Ji Satya Sanatan

आप अपने परिवार में बच्चों को
जब अपना अपना हिस्सा देते
हैं आपका अपना धन है पत्रिक धन
है उसमें इन बच्चों को भी याद
रखिए यदि आप इनको अपना बच्चा समझ करके
जितने आपके बच्चे हैं उनको भी दीजिए लेकिन
उसका एक अंश इनको भी दे दीजिए एक एक दो दो
प्रतिशत देखिए इनको यह कितना काम करते हैं
और इन्होने तो बहुत काम किया
[संगीत]
है प्रभु के स्मरण के
साथ और प्रभु से जुड़ते
हुए आगे की कुछ बातों को आप सुनने का
प्रयास कीजिएगा नेत्रों को बंद
करके अंतर्मुखी होते
हुए
अपने अंदर भी विराजमान
परम पिता परमात्मा के
साथ
आत्मीयता और निकटता का
भाव श्वास
भरिए
ओम
[संगीत]

[संगीत]
[संगीत]


आंतरिक रूप से अपने को ईश्वर के साथ संबध
रखते हुए नेत्रों को खोल
लीजिए आज के इस कार्यक्रम के माननीय
अध्यक्ष
महोदय
उपस्थित समस्त सम्माननीय विद्व जन माननीय
साथ
जी और
समस्त धर्म प्रेमी वैदिक धर्म के प्रति
मेष दयानंद के प्रति भावना रखने वाले
आगंतुक सभी आर्य भत्र पुरुषों माताओं और
बहनों यहां इस कार्यक्रम में मेरे को जो
विषय दिए गए तीन विषयों में से तो एक विषय
को प्रथम को थोड़ा मैं छूने का प्रयास
करूंगा
लेकिन उससे पहले थोड़ा समय
मैं हमारे इन
युवा विद्वानों और क्रांतिकारियों के से
संबंधित कहना चाहता
हूं मैं इस कार्यक्रम में आया तो माननीय
दार्शनिक जी ने मेरे को पहली बार किसी
कार्यक्रम के लिए कहा यानी इन लोगों ने
इनके माध्यम से मेरे को कहा कि भै आप आइए
हां
पर उनका मान रखते हुए मैं आया मैं उनका
धन्यवाद करता
और साथ ही मेरे को कहा गया
कि आप सब जो यह कार्य कर रहे हैं हमारे
युवा
विद्वान इनकी इच्छा है कि मैं यहां पर
[संगीत]
आऊ और यह मेरी थोड़ी कमजोर कड़ी थी कि मैं
इनके उस आग्रह को मना नहीं कर पाया और मैं
यहां उपस्थित हूं तो इनके लिए मैं कुछ
अवश्य ही कहना चाहता हूं
यह लोग जो कार्य कर रहे
हैं अलग-अलग कुछ सबकी शैली
है लेकिन दिशा एक ही
है और यह जितने भी हैं मेरी दृष्टि से यह
सभी स्वनिर्मित है इन्होंने सबने अपने आप
को बनाया है घड़ा है
बंदर ठीक है माता-पिता गुरुजन सबको ही
सिखाते हैं और हम सभी सीख करके आगे बढ़ते
हैं लेकिन जो इन्होंने रास्ता चुना है और
जोय कार्य कर रहे हैं ये इन्होंने वर्तमान
की स्थिति साधन उन सबको देखते हुए उस दिशा
में आवश्यक समझते हुए चुना है और स्वयं
सीख सीख करके किया है ऐसा मेरे ख्याल से
इनका इस विषय में सिखाने वाला कोई अलग से
गुरु नहीं
होगा और मुझे बहुत प्रसन्नता है यहां पर
आकर के कुछ तो मेरे परिचित हैं और कुछ
अपरिचित से भी यहां पहली बार मैंने उनका
सुना इनके भी बहुत सारे ू में समय समय पर
सुनता रहता
हूं और वह मुझे बहुत अच्छे लगते हैं इन
लोगों के कार्य को देखते
हुए
यह आज के युग के क्रांतिकारी
हैं जैसे कि परतंत्रता के समय में कुछ
आत्माएं थी ऐसी जो कि देश के
लिए काम कर गई सहयोग मिला या नहीं मिला
लेकिन उन्होंने देश के लिए कार्य किया और
आज हम उनको स्मरण करते हैं बहुत आदर और
श्रद्धा के साथ
में यह आत्माएं उस समय होती तो यह भी कुछ
क्रांतिकारी होती ऐसे यह अंदर से
हैं यह आज के क्रांतिकारी
जैसे उस समय क्रांतिकारी बड़ा जोखिम उठा
कर के एक कार्य करते थे यह ऐसे ही करते
हैं और जैसे क्रांतिकारी अपने आंतरिक सुख
के लिए अपनी आंतरिक आवाज से अपने जीवन को
उस भारत को स्वतंत्र करने के लिए लग गए थे
ऐसे ही यह स्वयं की प्रेरणा से आंतरिक
संस्कारों से यह लगे हुए हैं अपने
स्वाभिमान से और स्वनिर्मित
है इनका सहयोग
करना य प्रत्येक वैदिक धर्मी का कर्तव्य
बनता
है
हम विभिन्न रूपों में इनका सहयोग कर सकते
हैं आपको या हमारे को बड़ों को जो एक बात
रहती है कि हमारे बच्चे आर्य समाजों में
नहीं आते पुरानी पीढ़ी अपने तरीके से काम
करती है उनका अपना महत्व है ठीक
है लेकिन अपने बच्चों को अगर हम
इनके यह छोटे-छोटे या बड़े संवाद और जो
इनकी चर्चाएं होती है यू पर व यदि सुनाए
तो इस समस्या से हम अपने को उभरा हुआ
पाएंगे नहीं तो यह दुख हम सबको अधिकांश को
है कि हमारे बच्चे आर्य समाज में नहीं आते
वैदिक विचारधारा से नहीं
जुड़ते उसका उपाय यह लोग
हैं और आपके अधिकांश के बच्चे आधुनिक जो
पढ़े हुए हैं सब कंप्यूटर और मोबाइल और यह
सब ट और इनके ऊपर जो टिप्पणियां दी जाती
है समर्थन किया जाता है इनको फैलाया जाता
उन सब से परिचित
है हमारे मन में जो भावना है कि हम वैदिक
धर्म के लिए कुछ
करें अपने बच्चों को थोड़ा आधा घंटा या एक
घंटा इनके चैनलों को बढ़ाने के लिए
प्रेरित कीजिए इनको
सुने इनको विभिन्न जगह जहां भेज सकते हैं
उनको फॉरवर्ड करें और जो टिप्पणियां होती
है नीचे कुछ ना इनके समर्थन में पक्ष में
टिप्पणियां करें
और जो इनके विपरीत बोलते हैं यह सबका
उत्तर नहीं दे सकते इतना समय भी नहीं होता
है लेकिन जो और इनको सुनने वाले हैं वह
उनका उत्तर
दे वहां पर टिप्पणियां करें उनको चुप करें
यह सब इनके मनोबल के लिए बहुत आवश्यक
है इनका मनोबल कम नहीं
है लेकिन जिस उत्साह से यह लोग लगे
हैं यदि आपका और आपके बच्चों का इनको
समर्थन मिल
जाएगा तो यह एक एक जोक यह स्वनिर्मित हैय
सैकड़ों को एक एक जना तैयार कर सकता है
जैसे यह काम करते
हैं यदि हम कुछ वर्ष और कुछ दशक तक ऐसे
लोगों का समर्थन करते
रहे तो सैकड़ों ऐसे कार्य करने वाले मिल
जाएंगे और आज के युग में यही तरीका है
लोगों तक विचार पहुंचाने का
और इस विचारधारा को बढ़ाने का यह वैचारिक
संघर्ष का युग है बाकी चीजें तो बाद में
होंगी जैसा कि हमारे पूर्व वक्ताओं ने भी
बात
रखी आप अपने परिवार में बच्चों को
जब अपना अपना हिस्सा देते
हैं आपका अपना धन है पत्रिक धन
है उसमें इन बच्चों को भी याद
रखिए यदि आप इनको अपना बच्चा समझ कर के
जितने आपके बच्चे उनको भी दीजिए लेकिन
उसका एक अंश इनको भी दे दीजिए एक एक दो दो
प्रतिशत देखिए इनको यह कितना काम करते हैं
और इन्होंने तो बहुत काम किया
है लेकिन जो दूसरे हैं वह जिस स्तर पर काम
कर रहे हैं और इनका सामना जितने लोगों के
साथ में यह एक एक हजार के बराबर
है लेकिन यह लाखों के बराबर हो जाए यह
करोड़ों के बराबर हो जाए इसके लिए आपकी और
हमारी तो चाहिए
इनको जब भी आप अपने बच्चों को देते हैं या
जो दे भी चुके हैं और जो आपके पास में है
इनको भी अपना बच्चा समझ
करके और इनको कुछ ना कुछ अवश्य
दीजिए यह अभावों में काम करने वाले इनके
पास जो है उसमें काम करने वाले हैं इनको
ज्यादा कोई सुख सुविधाओं की अपेक्षा वाले
नहीं है
ये तपस्वी कोई
ऐसे नहीं होते कि जो इन कपड़ों में हो और
जटा जूट हो या मु मुंड के जैसे हो मुंडन
किया हुआ हो जंगल में रहते हो इन लोगों की
तपस्या इनसे आप इनकी घटनाए पूछेंगे कभी जो
बैठे सुने इनको यह जो कार्य कर रहे हैं यह
तपस्या से कम नहीं है य बहुत बड़ी तपस्या
कर रहे हैं और इनको आंतरिक सुख है आंतरिक
आनंद है इसलिए यह चल रहे
हैं लेकिन यदि इनको
हमारा सहयोग मिल जाएगा आर्थिक रूप से इनके
पास साधनों की वो रहेगी जो अत्याधुनिक
चीजें होती है अधिक से अधिक अच्छी और यह
अपने साथ बहुत लोगों को जुटा लेंगे अपने
जैसे काम करने वालों को उनका भी तो भरण
पोषण चाहिए का जिनको यह अपने साथ जोड़ कर
के काम को आगे बढ़ाना चाहते हैं इनको अपने
कार्य करने में धन की न्यूनता प्रतीत ना
हो तो फिर देखिए इनकी गति कहां होगी
इन्होंने तो तेजी से काम किया ही है
हमारे यहां
पर अतिथि यज्य की बात होती है अतिथि घर
में आए य तो बड़ा मुश्किल हो गया है अतिथि
घर में आए फिर हम भोजन कराए या उनको कुछ
दक्षिणा दे य अतिथि की बात क्यों थी कि
विद्वान आएगा घर में बात करेगा समस्याओं
का समाधान करेगा बच्चों को प्रेरित
करेगा ये इनके जो वीडियो है ये हमारे
मोबाइल पर आते रहते हैं आप इनका
सब्सक्राइब इनको कर लेंगे चुन लेंगे तो
आपके पास आएंगे इनका जब जब वीडियो आता है
वह एक तरह से अतिथि आप हमारे घर पर आया
है अतिथि आकर के प्रवचन ही तो देता है
अपनी बात ही तो रखता है अब आज वह तो संभव
नहीं है कि यह कितनों के घरों में जाए और
अतिथि के रूप में एक विद्वान होता है
अतिथि जिसकी कोई तिथि नहीं होती इनका
वीडियो कभी भी
आएगा ये अतिथि के रूप में आज इनके वीडियो
हमारे मोबाइल पर और हमारे घर में हमारे
पास में पहुंच
रहे तो जैसे किसी अतिथि को हम बिना
दक्षिणा दिए नहीं भेजते उनको भोजन कराते
हैं उनका सत्कार करते
हैं तो और कुछ नहीं तो इनका जब जब वीडियो
आए और आप इनको सत्कार कीजिए उसको समर्थन
दीजिए लाइक कीजिए और कुछ दक्षिणा इनको भी
पहुंचा दीजिए उस वीडियो के माध्यम से इनके
चीजें तो है ही तो यह तो अतिथि य आज का तो
देखो आधुनिक युग में तो अतिथि ऐसे ही करना
पड़ेगा आपके पास सहयोग का अवसर की कमी
नहीं
[प्रशंसा]
है तो
यह बहुत ही आशा के केंद्र
है जो पुराने हो गए आप उनका कितना भी
सम्मान कर ले कि यह बड़े हैं और इन्होंने
यह काम किए हैं ठीक है वह अपनी जगह पर मैं
भी उसी में सम्मिलित हूं उन्हीं लोगों
में लेकिन इनका सम्मान होना और इनको
बढ़ाना बहुत आवश्यक है और मैं इस अवसर पर
मुझे आमंत्रित किया गया मैं इनको देखने
सुनने आया हूं मैं बोलने के लिए नहीं आया
था यहां पर इन्होंने मेरे को समय दे दिया
लेकिन मैं इन लोगों को देखने और सुनने आया
था इन दो से तो मैं पहली बार अजमेर में भी
कुछ दिन पहले ही 19 तारीख को मिला था सुना
भी इनको पहली बार
मैंने और भी है जिनको मैं पहली बार देखा
है और
जाना तो मैं यहां इस मंच पर आकर बहुत अपने
आपको को गौरवान्वित और प्रसन्न अनुभव कर
रहा हूं कि इन लोगों के बीच में उपस्थित
हुआ और इनको जितना भी इनको समय कम दिया
गया था नहीं
चलो लेकिन इनको सुनक के बहुत प्रसन्नता है
और बहुत आशा है ऐसे ही होगा हम यह रोना
रोना छोड़ दे कि आर्य समाज में उपस्थिति
इतने से की हो रही है पांच की 10 की 20 की
छोड़ दीजिए उस रोने को देखिए कितने लोग
सुनते हैं
इनको वो बातें हट गई वो जमाना बदल गया अब
देखिए इनको कितना सुनते हैं इनके कितने
अनुसरण करने वाले फॉलोअर्स है मैं अपना जो
विषय मेरे को तीन दिए गए थे जो कि आपके
यहां आर्य समाज में पिछले तीन दिनों से चल
रहे थे उन तीनों को मेरे को दे दिया गया
था कि इन सबको छूते हुए आप कुछ बोलिए तो
बहुत सारा समय तो मैं उसमें नहीं दे पाया
मैं उसम पहले बिंदु पर थोड़ी चर्चा करना
चाहता हूं और वह विषय है महिला सशक्तिकरण
का महिला सशक्तिकरण और महर्षि
दयानंद विषय समाज में बहुत चलता है आपके
यहां परिचर्चा भी हुई है और उस सशक्तिकरण
को पुरुष के साथ में जोड़ते हुए भाई
महिलाओं को भी धन की दृष्टि से समर्थ हो
पढ़ाई की शिक्षा की दृष्टि से तो शिक्षा
का महर्षि ने बहुत कहा ही है
उनको निर्णय लेने में स्वतंत्रता हो उनकी
सुरक्षा हो इत्यादि इत्यादि वह सब चीजें
अपनी जगह ठीक है और वह होनी चाहिए और कैसे
होनी चाहिए और भी बहुत सारी कैसे नहीं
होनी चाहिए वह चर्चा पीछे
चली महर्षि दयानंद ने इस बिंदु को लेकर
अलग से कुछ लिखा हो ऐसा मेरी जानकारी में
नहीं लेकिन महिलाओं के बारे में सब
पुरुषों के बारे में मानव मात्र के बारे
में और महिलाओं के लिए भी बहुत कुछ लिख
यह जो सशक्तिकरण
है हर व्यक्ति को शक्ति की आवश्यकता होती
है अब जब हम कल्पना करते हैं कि जैसे
पुरुषों को धन का अधिकार है ऐसे महिला को
भी हो शिक्षा का पुरुष के सापेक्ष बहुत
कुछ जो चलता है व अपनी जगह पर ठीक है
समानता होनी चाहिए उसका मैं निषेध की बात
नहीं
है लेकिन यह सशक्तिकरण जो हम कर रहे हैं
अब एक स्तर पर सशक्तिकरण है तो क्या जिनको
निर्णय लेने की स्वतंत्रता है यानी पुरुष
वर्ग या जो भी हो
अन्य वह कभी दुर्बल नहीं पड़ते हैं अपने
जीवन में कभी टूटते नहीं है
वह जिनके पास धन है बहुत अधिक धन है नौकरी
है पद प्रतिष्ठा वह अपने जीवन में कभी
टूटते नहीं है क्या दुर्बल नहीं पड़ते हैं
क्या घर से नहीं निकाले जाते हैं
क्या जो शिक्षित है वह कभी टूटते नहीं है
क्या सशक्ति रण के कुछ तो है बाहर के
उपाय और कुछ है अंदर के
उपाय हम समाज से
सुरक्षा परिवार से सुरक्षा अपनों से
सुरक्षा सबकी बात करते हैं व सब अपनी जगह
होना
चाहिए महर्षि दयानंद की दृष्टि से मैं
उन्होंने जो बातें लिखी हैं उसकी दृष्टि
से मैं कुछ बिंदु रख रहा
हूं तो व्यक्ति जो टूटता है
व बाहर के धन से शरीर से जल्दी टूटता है
या मन से अधिक टूटता
है और यह जो शक्ति है वह व्यक्ति की बाहर
की होती है या अंदर की होती है बाहर की भी
शक्ति अपनी जगह बिल्कुल ठीक है होनी ही
चाहिए लेकिन तुलना करें तो शक्ति कहां पर
हो जो मन की शक्ति आत्मा की शक्ति आंतरिक
शक्ति है वह अधिक महत्वपूर्ण होती है
बड़े-बड़े शक्ति वाले
भी
बलवान हो पहलवान हो धनवान हो विद्वान हो
पुरुष वर्ग जो जिसको कि हम सशक्त मान करके
कहते हैं यदि परिवार में की पत्नी का या
मां का और बच्चों का विरोध हो और सम्मान
ना हो तो टूट जाएगा व
व्यक्ति तो महिलाओं का जो सशक्तिकरण है वह
दूसरी जगह तो है लेकिन उसका जो पहला चरण
है यदि
पति और
बच्चे उनके साथ में हैं और उनका सम्मान
करते हैं उनकी उपेक्षा नहीं करते हैं तो
इससे बढ़कर के उनके उनको सशक्त करने वाली
चीज नहीं है ये वो चीज है जो व्यक्ति को
तोड़ देगी महिला को तोड़
देगी महर्षि दयानंद ने जहां देवों की
चर्चा की वहां पति और पत्नी को एक दूसरे
का देव और देवी का र हम भी कहते हैं कि
देव है यह देवी है यह पति देव है
आपकी देवी कौन सी है यह शब्द हमारे
प्रचलित
है और जो देव और देवी के लिए पूजा की बात
है और पति और पत्नी के बीच
में तो महर्षि ने कहा कि पति और पत्नी एक
दूसरे
का अभिवादन
करें एक दूसरे को नमस्ते
करें नमस्ते जो महर्षि दयानंद की दृष्टि
में है कि मैं आपका आदर करता हूं सम्मान
करता हूं केवल औपचारिकता वाली बात नहीं
अंदर मैं आपका सम्मान करता हूं आपके
द्वारा मेरे जीवन में बहुत सहयोग है और
समर्थन
है पति और पत्नी दोनों के लिए लेकिन मैं
यहां महिलाओं के लिए मैं विशेष रूप से
कहना चाहता हूं मैं अगर पूछू वैसे तो आपकी
आंतरिक बात है मेरे को उतना अधिकार नहीं
है घुसने का लेकिन फिर भी मैं पूछता हूं
आपको आप अपने लोग
हैं कितने ऐसे पुरुष होंगे जो सुबह उठने
पर अपनी पत्नी
को नमस्ते करते
होंगे एक दो चार 10 ठीक है अधिकांश नहीं
है प्रतिदिन छोड़ दीजिए सप्ताह में एक बार
सप्ताह छोड़ दीजिए महीने में एक बार यह
सोच लीजिए कि कितने साल हो गए होंगे कभी
नमस्ते या तो विवाह के बाद कभी नमस्ते की
हो पत्नी के करने पर की हो ऐसे कई हो सकते
हैं पत्नी के लिए मैं क महिला के लिए
महिला सशक्तिकरण की बात है यदि पति का
समर्थन सबसे अधिक और बच्चों का
भी एक आदर के रूप में होता है कि मैं आपका
सत्कार करता हूं आपकी मेरे जीवन में जो
उपयोगिता है महत्ता है मैं उसको सम्मान
देता हूं इससे बढ़कर के शक्ति देने वाली
महिला को और कोई चीज
नहीं मैं महिलाओं से पूछता हूं कि वो क्या
चाहती
है य जो सशक्ति करण की बात है तो क्या
सशक्तिकरण
है य बलवान बलवान टूटते हुए नहीं दिखते
कितने यह धनवान कितने कहते हैं कि घर से
बाहर निकाल दिया उनके बच्चों ने करोड़ों
अरबों की संपत्ति वाले सड़क पर घूम
रहे आंतरिक रूप से जो सशक्तिकरण
है वह दूसरों से होता है अपने आप कोई नहीं
हम अल्प शक्तिमान है हम कितना शक्ति
करेंगे हम कुछ भी कर लेंगे लाठी चलाना
सीखेंगे तो फिर कहीं सुरक्षा की आवश्यक
बंदूक होगी तो भी आवश्यकता है कितना
करेंगे हम तो सब अल्प शक्तिमान है पुरुष
भी और महिलाएं भी और इस संसार में ऊंच नीच
सब कुछ होती रहती है और हमारे को साथ
मिलने से ही सशक्तिकरण होता है अकेला कोई
सशक्तिकरण कर ही नहीं सकता ना पुरुष महिला
भी नहीं कर सकती यदि आज जो सशक्तिकरण की
प्रक्रिया है वह कुछ इस तरह की है कि मैं
सशक्तिकरण हो जाऊ और उससे मैं अपने जीवन
को कर लूं महिला क्या पुरुष भी इस घमंड
में हो तो वो भी नहीं कर सकता
है यह तो पथरीली जमीन है इस संसार में
इसमें तो मिलकर के हाथ करके ही सशक्तिकरण
हो सकता है और उसका प्रारंभ जो महर्षि
दयानंद ने क्या कि पति और पत्नी एक दूसरे
के लिए देव है और उनका नमस्ते करना है
जैसे अन्य देवताओं को करते
हैं बड़ी दिक्कत होती है नमस्ते करने
में कुछ सीमाए है कुछ दीवार हैं और कुछ
नहीं तो पहले मैं कर लूंगा लेकिन पहले तो
पत्नी को करना
चाहिए दीवार है आंतरिक दीवार
है कुछ कहते हैं नहीं जी ये तो औपचारिकता
है पति पत्नी का संबंध तो इतना निकटता का
है वहां इस नमस्ते वस्ते की औपचारिकता
करने की क्या जरूरत
है इसको औपचारिक समझ के नहीं करते हैं
बोले यह तो फिर फॉर्मल हो गया यह
फॉर्मेलिटी हो गई औपचारिक हम नमस्ते कर
रहे देखो हमारे तो बहुत हृदय के संबंध है
वन औपचारिकताओं से क्या लेना देना ये कुछ
और सिद्धांत अपने नमस्ते नहीं करने के
पीछे या आदर नहीं देने के पीछे हम मन के
अंदर सोच के रखते हैं अपना बहाना अपना
तर्क युक्ति बना कर के रखते यह सब
बहाने क्या हम परमात्मा को नमस्ते नहीं
करते परमात्मा के नमन की बात नहीं है क्या
वोह औपचारिकता है हमारी वह हम हृदय से
नहीं करते विभिन्न देवी देवताओं को
विभिन्न महापुरुषों को हम अभिवादन करते
हैं क्या वो हमारी औपचारिकता है हम हृदय
से नहीं करते व श्रद्धा और नमन से नहीं
करते
उनको यह औपचारिकताएं
नहीं ऋषि ने नमस्ते करने के लिए कहा यह
औपचारिकता नहीं है इसको ऐसे नहीं उड़ाना
यह हृदय की बात
है हम एक दूसरे का सम्मान करते हैं उसके
अस्तित्व को स्वीकार करते हैं अगर हम
अभिवादन या उसके कार्य का को स्वीकार नहीं
करते तो एक तरह उसके अस्तित्व पर संकट
होता है और जो अंदर की पीड़ा वो यह होती
है कि मेरे को कोई पूछता
नहीं और जब हम दूसरों के लिए भी करते हैं
कि मेरे सामने तुम्हारा कोई अस्तित्व नहीं
है तुम तुम्हारा होना ना होना मेरे लिए
कोई महत्व नहीं रखता है यह बात सबसे अधिक
पीड़ा देती है य सबसे अधिक दुर्बल करती है
धन कम होगा कोई बात नहीं है रोटी कैसी भी
होगी वह दुर्बल नहीं करेगी व्यक्ति
को यह अंदर से तोड़ के रख
वति और यदि हम महिलाओं को और मैं पुरुष को
छोड़ नहीं रहा हूं य पुरुष भी टूटता है
अंदर से दोनों की बात
दोनों एक देव देवी हैं यह सशक्तिकरण जब
दोनों एक दूसरे के लिए करते हैं और फिर
अपने जीवन को बढ़ाते हैं उससे अधिक बल
देने वाला कुछ नहीं है मेरे को पता है कि
मेरी पत्नी साथ में मेरा पति मेरे साथ में
मेरे बच्चे साथ में अकेले सूरमा तो बहुत
हो गए कोई नहीं होगा सबके गर्व जाते हैं
अकेला कौन है जो चल सका है इस दुनिया के
अंदर तो महर्षि ने जो बात रखी है कि
महर्षि की दृष्टि सेय सशक्तिकरण का है और
दूसरा महर्षि ने कहा कि जो महिलाएं हैं
उनको आयुर्वेद का ज्ञान होना चाहिए भोजन
निर्माण में ऋतु में क्या खाना क्या नहीं
पी
पीना बच्चों का स्वास्थ एक महिला टूटती है
जब बच्चे बीमार हो या पति बीमार हो और
परिवार में हो तो बोस तो महिला पर आ जाता
है
अधिकांश और उसमें वह तो हृदय से चाहती है
तो लगी रहती है और उसमें भी वो टूटती है
उसका समय वहां जाता है उसकी शक्ति वहां पर
जाती है
तो अपने अपने स्वास्थ्य को ठीक
रखना अपना शरीर अच्छा है तो व्यक्ति बहुत
बलवान रहता है बहुत आत्मविश्वास रहता है
अब भले ही कितना पैसा हो और स्वास्थ्य ठीक
नहीं है भले ही कितने साधन हो स्वास्थ्य
ठीक नहीं है तो दुर्बलता आएगी ही शारीरिक
रोग के कारण मन में दुर्बलता आएगी
यह बाहर के सशक्तिकरण है लेकिन अपने मन का
और अपने शरीर का हम जितना ध्यान रखेंगे और
हमारे परिजन एक दूसरे का ध्यान रखेंगे
इससे बढ़कर के शक्ति देने वाली कोई चीज
नहीं लौकिक दृष्टि से जो हम परस्पर
सशक्तिकरण की बात करते हैं वह आपसी बात की
दृष्टि और वह भी अगर नहीं है तो परमात्मा
पर
विश्वास परमात्मा के प्रति
समर्पण और मेरे जो अच्छे कर्म है उसका फल
परमात्मा अवश्य देगा वो कहीं नहीं
गए उससे बढ़कर के शक्ति देने वाली कोई चीज
नहीं है पु चाहे
महिला इसलिए यह केवल महिलाओं के सशक्तिकरण
की बात नहीं तो मानव मात्र की बात है
लेकिन कोई सहयोग हो ना हो लेकिन महिलाएं
परमात्मा से जुड़ कर के जो सशक्तिकरण
आंतरिक सशक्तिकरण करती है उससे बढ़कर के
कुछ नहीं है समय हो गया है आप सबने बहुत
ध्यान से सुना और मेरे को य अवसर दिया गया
बोलने के लिए मैं सभी का धन्यवाद करता
हूं

No comments:

Post a Comment

😲 अपना Point साबित के लिए इतने कुतर्कआइये कुछ Cross Questions करें।

में एक बार क्या हुआ कि उनका खूब सारा लोगों ने आप जैसे यह दोनों ने बहुत विरोध किया और उन विरोध करने वाले लोगों ने महर्षि दयानंद सरस्वती जी...