Tuesday, 20 January 2026

#MANTHAN अंबेडकर मनुस्मृति के बिना कुछ नहीं थे Gautam Khattar Satya Sanatan Ankur Arya

कृष्ण की गीता को जलाने के नाम पर पुस्तकों को छपा कर के देश के मदरसों और मस्जिदों में बांटा गया तब तब आर्य समाज आकर के प्रहरी बनकर के सनातन धर्म के साथ खड़ा हुआ आर्य समाज विरोधी नहीं है यह हमारे सांस्कृतिक पुरुषों का इतिहास था क्योंकि जब अंग्रेजों और मुगलों ने देखा कि हम इनको इतनी यातना देते हैं इतना प्रताड़ित करते हैं इतना इनको दबाते हैं इतना कुचलने का प्रयास करते हैं फिर भी यह भारत के लोग आखिर क्या कारण है कि अपना तो कटवा देते हैं पर जनेऊ नहीं देते सदा हिंसा सर्वोत्तम मन की कस्तूरी है पर दुष्ट नहीं माने तो हिंसा बहुत जरूरी है सोमनाथ का मंदिर टूटा कहां अहिंसा थी शक हूणों ने हमको लूटा कहां अहिंसा थी भिक्षु नियों की छाती काटी कहां अहिंसा थी लाशों से व्यभिचार किया क्या वहां अहिंसा थी हिंसक पशु के लिए व्यर्थ मय हलवा पूरी है और दुष्ट नहीं माने तो हिंसा बहुत जरूरी है साथ ही साथ मैं आप सभी से अपील करना चाहूंगा कि विश्वानी सेवा फाउंडेशन को आप सभी डोनेट अवश्य करें क्योंकि हमारी यह फाउंडेशन आप लोगों से बूंद-बूंद भर के जो हमारी गगरी भरती है वह हम किसी ना किसी गुरुकुल या फिर गौशाला या गाय के लिए कार्य करने वाले लोगों को प्रदान करते हैं अपनी तरफ से आपका निमित बनकर सप्रेम भेंट करते हैं तो आपकी जो भी इच्छा हो हमें वह भेज सकते हैं बोलते हैं कि सबको मनुस्मृति पढ़नी चाहिए तो एक शूद्र यदि मनुस्मृति पढ़ना चाह रहा है तो मनुस्मृति के पहले अध्याय में लिखा हुआ है कि ब्राह्मण सर्वश्रेष्ठ है तो आगे पढ़ेगा भी क्यों उस मनुस्मृति को है ना बहुत-बहुत धन्यवाद पहले तो मैं आपका और आयोजकों का करूंगा कि उन्होंने आर्य समाज की इस विधा को एक नेक्स्ट लेवल पर ले जाने के लिए इस प्रकार के कार्यक्रम करने की पहल करी दूसरा जो आपने प्रश्न किया आपने कहा कि ब्राह्मण को ही सर्वश्रेष्ठ कहने का प्रावधान दिया है यदि हम सनातन वैदिक धर्म के मूल में जाएं तो हमें स्कंद पुराण में एक श्लोक आता है जन्मना जायते शुद्र संस्कारा भवे द्विज वेद पाठात भवे विप्रा ब्रह्म जाना इति ब्राह्मण जन्म से प्रत्येक व्यक्ति शूद्र होता है कर्म से वह द्विज होता है संस्कारा भवे दज संस्कारों से वह द्विज होता है वेद पाठात भवेदी ब्राह्मणा ब्रह्म को जानने वाला ब्राह्मण होता है हमारे समाज में सर्वाधिक यह मिथक हमारे नसों में हमारे घरों में हमारे मनों में घुस गया है कि एक ब्राह्मण का एक चतुर्वेदी का एक द्विवेदी का एक त्रिवेदी का एक शर्मा का एक मिश्रा का बेटा कोई हो जाएगा तो वह ब्राह्मण हो जाएगा चाहे उसके कर्म हो ना हो चाहे उसकी योग्यता हो या ना हो चाहे उसका गुण हो या ना हो चाहे उसका स्वभाव हो या ना हो किंतु यदि वह त्रिवेदी का बेटा है द्विवेदी का बेटा है तो क्योंकि उसने त्रिवेदी और द्विवेदी के घर घर में जन्म लिया है तो वह ब्राह्मण हो जाएगा यह सबसे बड़ा मिथक है सनातन धर्म इसका पोषक नहीं है सनातन धर्म जन्मना व्यवस्था पर आधारित नहीं है सनातन धर्म कर्मणा व्यवस्था पर आधारित है शूद्रो ब्राह्मण ता ति ब्राह्मण चत शूद्र काम क्षत्रियां तु विद्या द्वेष तथ वचा महर्षि मनु कहते हैं एक ब्राह्मण का बेटा भी यदि अच्छे कर्म नहीं करता उसका विद्या का जन्म नहीं होता उसका द्विज दूसरा जन्म नहीं होता तो वह ब्राह्मण कहने योग्य नहीं है यदि एक त्रिवेदी का बेटा सेना में भर्ती है बॉर्डर पर रहकर के देश की सीमाओं की रक्षा करता है तो वह ब्राह्मण नहीं रहा व क्षत्रिय हो गया क्योंकि वो बॉर्डर पर खड़ा है उसके अंदर क्षत्रिय के गुण कर्म और स्वभाव शामिल हो गए हैं यदि कोई वैश्य का बेटा वेद पढ़ता है पढ़ाता है दान लेता है देता है विद्या का अध्ययन करता है कराता है तो फिर अब वह वैश्य नहीं रहा व्यापारी नहीं रहा मतलब हमारे सनातन धर्म में नीचे से ऊपर उठने की परंपरा भी है और ऊपर से नीचे उठ गिरने की परंपरा भी है आज का जो विषय है मनुस्मृति मनुस्मृति मानवता का संविधान एक तो है मानवता का संविधान और एक है यह भारत का संविधान अच्छा यह बताओ भारत के संविधान के अनुसार यदि कोई व्यक्ति देश का राष्ट्रपति बन गया और वह किसी दलित का पुत्र है क्या वह दलित हो गया या वह राजा हो गया उसको आज भी कह रहे हैं कि दलित हमारे राष्ट्रपति अब वो दलित कहां से रहा और हमारा जो मनुस्मृति जो मानवता का संविधान है इसके अनुसार यदि कोई शूद्र के घर में मोची के घर में कोई बच्चा पैदा हुआ और अब वह वेद पढ़ने लगा वेद पढ़ाने लगा मंत्र बोलने लगा मंत्र सुनाने लगा तो क्या वह शुद्र रहेगा नहीं हां हमारे सनातन धर्म के भीतर ही कुछ ऐसे र्म धर्म को गलत प्रकार से प्रदर्शित करने वाले लोगों ने इस तरह की मानसिकता को प्रचारित करा दूसरा जो आपने कहा कि फिर उसमें ऐसा क्यों लिखा है बार-बार यह प्रश्न आ रहा है मिलावट का तो एक प्रोफेसर हुए जिनका नाम हुआ प्रोफेसर सुरेंद्र कुमार वो गुरुकुल कांगड़ी के कुलपति भी रहे उन्होंने कई वर्षों तक मनुष्य मनुस्मृति पर अनुसंधान किया मनुस्मृति पर शोध किया तो उन्होंने इस बात को पाया कि संसार में जितनी भी मनुस्मृति आज विद्यमान है उसमें सर्वाधिक श्लोक जो पाए जाते हैं 2685 श्लोक पाए जाते हैं कई मानक उन्होंने निर्धारित करके जब उसका शोध किया उन्होंने अनुसंधान किया कई मानकों पर उस मनुस्मृति का को खरा पाया तो उन्होंने यह पाया कि इस मनुस्मृति में लगभग 1471 श्लोक मिलावटी हैं कितने 1471 श्लोक कितने श्लोकों में से 2685 में से 1471 श्लोक मिलावटी है यानी केवल और केवल 1214 श्लोक ही मूल है और एक बात आप जान कर के आश्चर्य होंगे जितनी भी टिप्पणियां अंबेडकर जी ने मनुस्मृति पर करी है अंबेडकर जी ने जिन मनुस्मृति के उदाहरणों को लेकर के महर्षि मनु को गाली दी है अंबेडकर जी ने या जितने भी भीम और मीम वादियों ने श्लोकों का उदाहरण लेकर के महर्षि मनु के पुतलों को फूका है और मनुस्मृति को जलाया जलाया है उन श्लोकों में 88 प्र प्रमाण उन्होंने इन्हीं 1471 मिलावटी श्लोकों से लिए हैं 1214 श्लोकों को तो उन्होंने 124 1214 सॉरी 1471 1471 जो मिलावटी श्लोक है उनमें से उन्होंने उदाहरण लिए हैं 88 प्र और 1214 श्लोकों तक तो वह गए ही नहीं और जो एक बात और मैं कहना चाहता हूं इस मिलावट वाली बात पे कि जब अंग्रेज इस भारत में आए तो उन्होंने देखा कि भारत की नीति व्यवस्था भारत की कानून व्यवस्था भारत का सिस्टम भारत की परिवार व्यवस्था भारत का की न्याय व्यवस्था इतनी उत्तम कैसे है तो उनको पता चला कि भारत की जो व्यवस्थाएं हैं वह कहीं ना कहीं मनु जी से अभिप्रेरित है मनुस्मृति से अभिप्रेरित हैं तो उन्होंने एक निर्धारित कमीशन इस देश में बनाया जिस कमीशन का नाम था विलियम हंटर कमीशन विलियम हंटर नाम का एक अंग्रेज नियुक्त किया उस विलियम हंटर अंग्रेज के नेतृत्व में कमीशन बना उस कमीशन का केवल और केवल यही काम था कि भारत के जो सांस्कृतिक रूप से जितने भी ग्रंथ है मनुस्मृति है वेद है उपनिषद है दर्शन है जितने भी भारत के ऐतिहासिक ग्रंथ है महाभारत है रामायण है इन सब का शोध करें इन सब का अध्ययन करें अध्ययन करने के बाद इसमें ऐसी मिलावट करें कि जब भारत का नौजवान इस इन ग्रंथों को इन मिलावटी पुस्तकों को पढ़ेगा तो वो बाहर से तो हो सकता है कि वह सनातन धर्म से क क्योंकि उसकी पृष्ठभूमि है लेकिन उसकी जो आत्मा है या तो उसकी आत्मा नास्तिक हो जाएगी या उसकी आत्मा ईसाइयत की तरफ प्रेरित होगी या उसकी आत्मा जो है वह विधर्मी होने के लिए विवश हो जाएगी तो विलियम हंटर कमीशन ने इसकी नीव डाली उससे पहले मुगलों ने तो इस काम को किया ही था मुगलों ने तो इस काम को बहुत किया था लेकिन सिस्टमैटिक रूप से अंग्रेजों ने इसको कमीशन के माध्यम से बनाया और हमारे श्लोकों में मिलावट करी और किसी को यदि ऐसा लगता हो कि यह बात झूठ है तो आप महाभारत का उदाहरण उठा कर के देख लीजिए राजा भोज ने जो अपना इतिहास लिखा संजीवनी नामक इतिहास आज भी मध्य प्रदेश के भिंड में जो ब्राह्मण रहते हैं उन ब्राह्मणों के पास वो इतिहास जस का तस मौजूद है उसमें राजा भोज लिखते हैं कि महर्षि व्यास और उनके शिष्यों ने संयुक्त रूप से जब इस महाभारत नाम के ग्रंथ की उस समय उसको जय संहिता बोलते थे जय संहिता नाम के ग्रंथ की रचना करी तो उसमें केवल और केवल 10000 श्लोक थे 4400 श्लोक महर्षि व्यास और 5600 श्लोक उनके शिष्यों ने मिलकर के 10000 ग्रंथों का जय संहिता बनाया और राजा भोज लिख रहे हैं कि विक्रमादित्य का काल आते-आते वह 10000 श्लोक 200 हज श्लोकों में परिवर्तित हो गए राजा भोज लिखते हैं और मेरे पिता के समय वह 20 से 25 हज हो गए और मेरी नजरों के सामने मेरी आधी उम्र आते-आते वह 25 से 30 हज हो गए यदि ऐसा ही चलता रहा तो यह जय संहिता नाम का जो ग्रंथ है बाद में वह भारत हो गया फिर महाभारत हो गया यह ग्रंथ ऊंट का बोझा बन जाएगा इसलिए उन्होंने दो ऐसे व्यक्तियों को हस्त छेदन का दंड भी दिया था जिन्होंने नकली कुछ पुस्तकें मारकंडे आदि पुराण के नाम से प्रकाशित कर दी थी उन्होंने हाथ काट दिए उन्होंने कहा आपको यदि कोई पुस्तक लिखनी है तो लिखो लेकिन ऋषियों के नाम से कोई भी पुस्तक मत लिखो इससे समाज भ्रमित हो जाएगा भा मेरे को कोई पुस्तक लिखनी है तो मैं अपने नाम से लिखूं मैं यह ना कहूं कि अंकुर आर्य जी ने लिखी है ताकि क्योंकि अंकुर आर्य जी का इस समाज में बहुत नाम है इनका नाम उस पर स्टैंप लग जाएगा तो जनता उसको प्रमाण मान के या जनता उसको थोड़ा आकर्षित होकर खरीद लेगी यह एक प्रकार का पाप है और उस पाप का दंड राजा भोज ने दिया भी तो मैं इतना ही कहूंगा क्योंकि डिस्कशन चल रहा है एक मिनट गौतम जी आपने उदाहरण के लिए स्कंद पुराण का उदाहरण लिया था अभी तो आप पुराणों को मानते हैं मैं यह कहता हूं देखिए पुरा नवं भवती ति पुराण पुराण जो है वो एक समय पर भारत के गौरवशाली महापुरुषों का इतिहास था भागवत क्या था भागवत भगवान श्री कृष्ण का एक इतिहास था लेकिन बाद में कालांतर पर उसको इतना प्रक्षिप्त कर दिया गया कि उसके अ उससे अभिप्रेरित होकर के हमने गीत बना दिए कि मनिहारी का भेष बनाया श्याम चूड़ी बेचने आया जबकि भगवान श्री कृष्ण हमारे योगेश्वर थे योग पुरुष थे श्रेष्ठ पुरुष थे लेकिन हमने प्रक्षेपण कर दिया हमने उसमें इतनी मिलावट कर दी कि अब 90 फीदी तो उसमें मिलावट रह गई और 10 फीदी उसमें कुछ मूल बातें रह गई तो ये जितनी भी पुराण हैं ये गलत नहीं थी ये ये हमारे सांस्कृतिक पुरुषों का इतिहास था क्योंकि जब अंग्रेजों और मुगलों ने देखा कि हम इनको इतनी यातना देते हैं इतना प्रताड़ित करते हैं इतना इनको दबाते हैं इतना कुचलने का प्रयास करते हैं फिर भी यह भारत के लोग आखिर क्या कारण है कि अपना सर तो कटवा देते हैं पर जनेऊ नहीं देते आखिर क्या कारण है कि यह भारत के लोग मुसलमान बनना पसंद नहीं करते लेकिन यह अपनी जनेऊ कटवाना पसंद नहीं करते पर गर्दन कटवा देते हैं तो मालूम चला शोध करके कि यह भारत के जो लोग हैं यह भारत के लोग अपने पूर्वजों का पूर्व जायती ति पूर्वजा जो पूर्व में जन्म लिए हुए श्रेष्ठ पूर्वज हैं उनके गौरवशाली गर्मा मई इतिहास को तेजस्वी इतिहास को पढ़ते हैं जिसके बाद इनके रक्त जो है वह ऊष्मा से परिपूर्ण हो जाता है तो उन्होंने कहा अच्छा ठीक है इनका जो इतिहास है उसमें इतनी मिलावट कर दो कि ये जब उसको पढ़े तो हीन भावना से ग्रसित हो जाएं इसलिए आज हम अपने पुराणों को अब अच्छा हमारी मूर्खता एक और है कि अगर उसमें गलत तरीके से मिलावट कर दि है तो हमने जिम्मेदारी मान कर के जैसे प्रोफेसर सुरेंद्र कुमार जी ने इसको समय की मांग समझ कर के उसका अनुसंधान किया लेकिन हमने क्या करा हमने पुराण में यदि कोई गलत बात पढ़ी तो हमने कहा अरे ये तो लीला है लीला के नाम पर उसको एक्सेप्टेंस दे दी ना कि उसमें अनुसंधान करके उसमें कोई गलत चीज आ गई थी तो उसको हटाया नहीं लीला का ठप्पा लगा कर के हनुमान जी की पूंछ है लीला है कृष्ण जी रास रसते हैं लीला है और भी कोई उल्टी बात है तो लीला है तो मानते हैं पुराण को मानना चाहिए अच्छी बात को सत्य के ग्रहण करने असत्य के छोड़ने में सर्वदा उद्यत रहना चाहिए बहुत-बहुत धन्यवाद एक बार तालियां हो जाए अ गौतम जी जी जैसे हमें पता है कि आर्य समाज में मूर्ति पूजा का विरोध है और हमारे जो आर्य समाज वाले लोग है वो कहते कि मूर्ति पूजा में कुछ नहीं रखा हुआ है ठीक है तो राजस्थान के हाई कोर्ट में मनुज की मूर्ति लगवाई गई आर्य समाज हों ने ही उस मूर्ति को हटवाने का विरोध किया नहीं हटेगी मतलब वो मूर्ति वहां से वो मूर्ति का वहां आने का क्या मतलब था और अब वो मूर्ति वही है और क्यों नहीं हटी है तो इस पर आपका क्या विचार है बहुत अच्छा आपने प्रश्न किया देखिए राजस्थान हाई कोर्ट के जिस प्रकरण का आप बात कर रही हैं अगर किसी को पता नहीं है तो मैं बता देता हूं राजस्थान हाई कोर्ट के परिसर के बाहर महर्षि मनु जी की प्रतिमा बड़ी शान से खड़ी हुई थी अचानक 28 जुलाई 1989 को एक फैसला आया जजेस का कि इस मूर्ति को यहां से हटा देना चाहिए स्थाना ित कर दिया जाए यह स्थानांतरित करने का हाई कोर्ट के परिसर से जो हटाने का आदेश आया था यह किसी ने याचिका डाली थी कि आपने जिस महर्षि मनु की प्रतिमा न्यायालय में यानी न्याय के मंदिर में लगा रखी है यह मनु तो समाज के विरोधी हैं यह मनु तो दलितों के दलन करता है यह मनु तो शूद्रों के शोषण करता है यह मनु तो महिलाओं के विरोधी हैं ऐसे समाज के शत्रु ऐसे समाज के दलन करता ऐसे ब्राह्मणों के पक्षपाती मनु की प्रतिमा भले ही भले समानता वाले न्यायालय के परिसर में क्या कर रही है तो जब यह याचिका डाली गई तो जजेस ने यह फैसला दे दिया कि ठीक है यदि ऐसा ही है तो महर्षि मनु की प्रतिमा को बड़े स सम्मान के साथ इस न्यायालय के परिसर से हटा दिया जाए जब यह सूचना यह सूचना जब आर्य समाज को प्राप्त हुई आपने कहा आर्य समाज मूर्ति की विरोधी है आर्य समाज मूर्ति का शत्रु है पहली बात तो यह आधा सच है और आधा झूठ है आर्य समाज मूर्ति को ईश्वर मान कर के पूजने का विरोधी है आर्य समाज मूर्ति का ना तो विरोधी है ना आर्य समाज राम का विरोधी है ना आर्य समाज कृष्ण का विरोधी है ना हनुमान का विरोधी है आप देखिए यह आर्य समाज के प्रांगण में हम बैठे हैं उधर किसकी प्रति ये चित्र लगा हुआ है भगवान श्री राम का आर्य समाज यज के बाद किसकी जयघोष होती है मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम की जय योगेश्वर भगवान श्री कृष्ण की जय जब जब कृष्ण पर आघात हुआ जब जब कृष्ण पर हमला हुआ कृष्ण की गीता को जलाने के नाम पर पुस्तकों को छपा कर के देश के मदरसों और मस्जिदों में बांटा गया तब तब आर्य समाज आकर के प्रहरी बन कर के सनातन धर्म के साथ खड़ा हुआ आर्य समाज विरोधी नहीं है आर्य समाज ईश्वर का सत्य उपासक है ऋषि दयानंद ने प्रथम ही समुल्लास में ईश्वर के नामों की व्याख्या करी आर्य समाज ईश्वर के द्वारा बनाई गई मूर्तियों की पूजा करता है इंसानों के द्वारा बनाई गई मूर्तियों से प्रेरणा लेता है इतना सा अंतर है पहली बात दूसरा हम बात कर रहे थे मनु जी की जब प्रतिमा लगी तो सनातन धर्म जो खुद को कहते हैं हम हिंदू राष्ट्र बना देंगे हम यह कर देंगे हम वो कर देंगे एक भी व्यक्ति आकर के खड़ा नहीं हुआ कि क्यों मनु जी की प्रतिमा को हटाया जा रहा है जब मनु समाज के विरोधी नहीं है उस समय आर्य समाज जो आर्ष साहित्य प्रचार ट्रस्ट की पुस्तकें हम पढ़ते हैं बड़े ही कम मूल्यों पर उसके जो अभी वर्तमान के प्रधान हैं धर्मपाल आर्य जी ने उसके विरोध में एक याचिका दायर करी उसमें कई सारे अन्य विद्वान जन भी शामिल थे एक डॉक्टर धर्म वेदपाल शास्त्री जो गुरुकुल झज्जर के स्नातक हैं वो उस समय वकालत कर रहे थे उन्होंने 14 तर्क प्रस्तुत किए न्यायालय के समक्ष कब जब फैसला आ गया कि मूर्ति को हटा दो उस समय 14 तर्क प्रस्तुत करे और उस तर्कों में लिखा कि मनु जी समाज के विरोधी नहीं है मनु जी महिलाओं के शत्रु नहीं है मनु जी ब्राह्मणों के पक्षपाती नहीं है मनुज शूद्रों के दलन करता नहीं है और 14 प्रस्तुत तर्क करने के बाद उन्होंने जज साहब को कहा कि जज साहब आप कोई भी सबसे कमजोर तर्क मेरे को बता दो इन 14 में से मैं उसी पर बहस करने के लिए तैयार हूं तो माननीय न्यायाधीश ने कहा कि एक पर नहीं हम 14 पर बहस करना चाहते हैं 14 के 14 तर्कों पर बहस हुई और लगभग 10 दिन तक वह बहस चली 10 दिन तक जब बहस चली तो जज साहब इस बात को मानने पर मजबूर हो गए कि मनु जी समाज के शत्रु नहीं है मनु जी दलितों के विरोधी नहीं है और ब्राह्मणों के पक्षपाती नहीं है उसके बाद उन्होंने जो प्रतिपक्ष वकील थे जो ये कहते थे कि मनु जी की प्रतिमा को यहां से हटा दिया जाए उनसे कहा कि भैया इन्होंने तो अपनी सारी बात कह दी अब तुम कहो तो न्यायालय का जो रिकॉर्ड है लिखित रिकॉर्ड यह बताता है कि 20 मिनट तक जो प्रतिपक्ष वकील थे जो इस बात के पक्षधर थे कि मनु की प्रतिमा को यहां से हटा दो वो कुछ बोले नहीं मौन रहे और उसके बाद न्याय पीठ ने यह फैसला दिया कि मनु जी की प्रतिमा कहीं नहीं हटेगी मनु जी की प्रतिमा इसी परिसर में लगी रहेगी और शान से वह प्रतिमा आज भी वहां पर स्थापित है यह आर्य समाज की देन है जिसको हम बोलते हैं कि आर्य समाज तो राम और कृष्ण का विरोधी है जब कृष्ण तेरी गीता जलानी पड़ेगी पुस्तक आई तो एक भी कृष्ण को मानने वाला कृष्ण को चोर बताने वाला कृष्ण को छलिया और रसिया बताने वाला व्यक्ति सामने नहीं आया कि तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई तुमने कृष्ण भगवान के ऊपर ऐसे लांछन लगाए उस समय भी ऋषि दयानंद के अनुयाई सामने उभर कर के आए और ऋषि दयानंद का कोई मत पंथ संप्रदाय नहीं है कि आर्य समाज मूर्ति पूजा का विरोधी है सनातन धर्म में जो विधान है ऋषि दयानंद ने उसी बात को आगे बढ़ाया एक छोटी सी बात मैं और कहूंगा बहन कल्पना जी और आचार्य जी यह बात कह रहे थे कि यह एक आपद धर्म है और वास्तविक रूप में जब हमने धर्म की ठीक-ठीक परिभाषा को नहीं समझा हमने यह देखा कि सनातन धर्म में तो अहिंसा की बात आई है सनातन धर्म में तो सत्य की बात आई है तो हम कट्टरता से जबजब उसको पालन करने लगे और हमने उसके संदर्भ और प्रसंग को नहीं समझा कि कहां पर हिंसा करनी भी जरूरी है और कहां पर अहिंसा करनी भी जरूरी है इन दोनों का जब भेद नहीं समझा तब तब हम कटे और तब तब हम बटे इसीलिए कवि ने लिखा था हम बोलते हैं ना अहिंसा अहिंसा अहिंसा लेकिन धर्म की रक्षा के लिए यदि हिंसा करनी पड़े तो वो भी अच्छी है इसी बात को परिभाषित करते कवि ने लिखा कि सदा अहिंसा सर्वोत्तम मन की कस्तूरी है हा हां अहिंसा करनी चाहिए अहिंसा वादी हमें होना चाहिए सनातन धर्म इसका पोषक है महर्षि पतंजलि ने अष्टांग योग में इसको शामिल किया है ठीक है सदा हिंसा सर्वोत्तम मन की कस्तूरी है पर दुष्ट नहीं माने तो हिंसा बहुत जरूरी है सोमनाथ का मंदिर टूटा कहां अहिंसा थी शक हूणों ने हमको लूटा कहां अहिंसा थी भिक्षु नियों की छाती काटी कहां अहिंसा थी लाशों से व्यभिचार किया क्या वहां अहिंसा थी हिंसक पशु के लिए व्यर्थ मय हलवा पूरी है और दुष्ट नहीं माने तो हिंसा बहुत बहुत जरूरी है बहुत-बहुत धन्यवाद आपका तो गौतम जी एक वीडियो पर मेरे नीचे एक कमेंट आया था जिसमें कहा था कि पौराणिक एक पौराणिक व्यक्ति कहा था जिसने कहा था कि जब हम पौराण कों की बात करते हैं उनकी कथाओं की बात करते तो लीला प आकर टिक जाती है उनकी बातें ऐसा आप लोग मानते हो अब मैं आप लोगों से प्रश्न कर रही हूं इतनी देर से से और ऐसा ही उन्होंने लिखा कि तो आप हर बात को एक लास्ट पॉइंट पर लाकर रुका रहे कि ये मिलावट है तो हमारे जो युवा है जो क्योंकि 30 लाख फॉलोअर्स आपसे जुड़े हैं 30 लाख युवा आपसे जुड़े हुए हैं तो वो सुनना चाहते हैं इस बात को कि यह कहां तक सही है कि आप अंतिम बात इस बात पर लाक रोक रहे हैं कि ये मिलावट है दूसरा कि अगर छोटा सा मैसेज मनुस्मृति के लिए कि युवा क्यों पढ़े मनुस्मृति उसके लिए आप कोई देना चाहे मैसेज तो आप वो दे सकते हैं बहुत-बहुत धन्यवाद देखिए एक छोटा सा विचार का एक छोटा सा दृष्टिकोण का भेद है दो महापुरुष इस भूमंडल के इतिहास में हुए एक का नाम था महर्षि दयानंद और एक का नाम था बुद्ध वेदों की प्रतियां जब बुद्ध के समक्ष आई तो उनको इस बात का ज्ञात हुआ कि वेदों में पशुओं की बलि को यानी पशुओं की हत्या करके उसकी आहुति करने का विधान है जब यह बात बुद्ध के संज्ञान में आई तो बुद्ध ने कहा कि यह धर्म नहीं हो सकता मैं ईश्वर को नहीं मानता यही बात जब ऋषि दयानंद के समक्ष आई तो उन्होंने कहा कि ऐसी बात करने वाला ईश्वर नहीं हो सकता ईश्वर ऐसी बात कर ही नहीं सकता यह बात मिलावटी है एक व्यक्ति ने यह बात पढ़ करर के वेदों को नकार दिया और दूसरे व्यक्ति ने यह बात पढ़ कर के वेदों में आए प्रक्षेपण को प्रक्षेपण का अर्थ यानी वेदों में मंत्रों के गलत अर्थों को सही प्रकाशित किया और इस संसार को दिया यह विचार का भेद है एक ने नास्तिक मत प्रारंभ कर दिया और एक ने आस्तिक की ध्वजा को पूरी जोर से खूटे के साथ इस दुनिया के सामने गाड़ा यह विचार का भेद है यानी स्वाभाविक सी बात है जो मनुस्मृति कह रही है यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवता यदि उस मनुस्मृति में कहीं पर भी महिला के विरोध की किसी भी प्रकार की बात आती है तो स्वाभाविक सी बात है जो व्यक्ति जो लेखक जो मनुस्मृति का प्रणेता यह बात कह रहा है एक स्थान पर कि मनु जो मनु जी हैं वह कह रहे हैं कि नारी तो देवी का स्वरूप है वह स्वाभाविक सी बात है ऐसा नहीं कह सकते कि नारी के ऊपर अत्याचार करो जो मनु कह रहा है कि कोई शूद्र भी गुण कर्म स्वभाव आचरण की उच्चता से ब्राह्मण बन सकता है वह कभी भी जन्मना व्यवस्था का पोषक नहीं हो सकता यह संदर्भ और प्रसंग का अंतर है हमने संदर्भ और प्रसंग को नहीं समझा कि एक-एक अर्थ के अनेक अनेक अर्थ होते हैं जैसे बहन जी ने अभी बलि के बारे में चर्चा चल रही थी तो हमने ये नहीं समझा कि एक अर्थ है तो संदर्भ और प्रसंग के अनुसार उसके अन्य भी अर्थ हो सकते हैं एक शब्द के जैसे अश्वमेध यज नरमेध यज्ज गोमेद यज्ज अजम द यज्ज इन शब्दों को सुन कर के हमने सोचा कि अश्वमेध मतलब जिसमें घोड़े को मार कर डालें नर मेद मतलब जिसमें मनुष्य की बलि दें गोमेद मतलब जिसमें गाय की बलि दें अजमेर मतलब जिसमें बकरी की बलि दे यह क्यों हुआ हमारी अज्ञानता के कारण हमारी संकुचित मानसिकता के कारण क्योंकि एक एक शब्द के अनेक अनेक अर्थ हैं एक मंत्र आया अष्टापद गोलंब निया आठ पैर वाली गाय को मार करके यज्ञ में आहुति दे दो यह भी कई लोगों ने अर्थ किया लेकिन ऋषि दयानंद ने कहा कि यह गलत है अष्टापद गौ आलनिया यहां अष्टपद का मतलब आठ पैर और गौ का मतलब गाय नहीं है अष्ट मतलब आठ पद मतलब संस्कृत में आई हुई विभक्ति यां संबोधन के साथ जो आठ वो है और गौ मतलब वाणी गौ का अर्थ केवल गाय नहीं होता लेकिन सामान्य हम किसी व्यक्ति से पूछे गौ मतलब तो सिर्फ गाय बताएगा पर गौ मतलब वाणी भी है गौ मतलब पृथ्वी भी है गौ मतलब इंद्री भी है गौ मतलब गाय भी है अब डिपेंड करता है कि कौन सा संदर्भ और प्रसंग चल रहा है किस अर्थ का कहां पर ग्रहण होना है तो यह तो बात हो गई जो आपने प्रश्न किया था मिलावट वाला कि कुछ भी आ जाए आप कह देते हो मिलावट है स्वाभाविक सी बात है जो सृष्टि नियम क्रम के विपरीत कोई भी बात होगी वह मिलावट है और यह सनातन धर्म स्वीकार करता है इस बात को लेकिन आप किसी कुरानी व्यक्ति से पूछिए कि भाई तुम्हारे कुरान में यह बात आ रही है कि धरती चपटी है लेकिन दुनिया का कोई भी वैज्ञानिक इस बात को आज वर्तमान में स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है कि धरती चपटी है तो वो बोलेगा नहीं नहीं चपटी ही है दुनिया का कोई भी वैज्ञानिक आ जाए लेकिन हम यह बात मानने को तैयार नहीं है आज आप देखो इस संसार में सनातन धर्म के लोगों नहीं मैं इस्लामिक लोगों की फिलहाल अगर बात ना भी करूं तो जितने भी लोग आज रामचरित्र मानस को जला रहे हैं सड़कों पर खड़े होकर के वह कोई मुसलमान है क्या सनातनी है सिर्फ पार्टी पॉलिटिक्स और राजनीति के लिए जिसने कृष्ण की गीता को जिस आईएएस ऑफिसर ने कहा कि इसको तो कचड़े के डब्बे में फेंक देना चाहिए उसकी पृष्ठभूमि को ईसाइयत की नहीं है इस्लामिक विचारधारा से वह नहीं आता उसकी पृष्ठभूमि भी सनातन धर्म की है लेकिन फिर भी उसने कहा जितने लोग आज वाल्मीकि की रामायण को जला रहे हैं मनुस्मृति को जेएनयू की सड़कों पर जला रहे हैं मनु के पुतलों को दहन कर रहे हैं उनकी पृष्ठ भूमि भी सनातन की ही है और जितने भी लोग चाहे वो इस्लामिक हो चाहे वो ईसाइयत के मानने वाले हो चाहे वह मन वामपंथी हो चाहे वह सनातन की पृष्ठभूमि से आते हो जितने भी लोग धड़ल्ले से मनुस्मृति को जलाते हैं गीता को जलाते हैं वाल्मीकि की रामायण को जलाते हैं रामचरित्र मानस को जलाते हैं यह पूरी पूरी प्रतियों को सड़क पर खड़े होकर के जला देते हैं एक पन्ना भी यह कुरान का यदि जला देवे तो मैं इनको मानने के लिए तैयार हो जाऊंगा पूरी कुरान नहीं केवल कुरान का एक पन्ना कोई भी व्यक्ति जो राम चरित्र मानस को जला आता है वो जला करके दिखा दे तो अगले ही दिन जैसे अंकुर जी ने कहा कि सर तन से जुदा तन सर से जुदा गुस्ता के नबी की एक सजा उसका पर्चा उनके हाथ में आ जाएगा तो इतनी भी हिम्मत करनी चाहिए जो राम को गाली देते हैं कृष्ण को गाली देते हैं हनुमान को गाली देते हैं मनु को गाली देते हैं वो कभी अबू बकर का के बारे में बताएं कभी उस्मान के बारे में बताएं कभी हजरत के बारे में बताएं कभी हुसैन के बारे में बताएं कभी आयशा के बारे में बताएं बताएं ना एक महिला ने बताया था और उसी बात को बताया था नुपुर शर्मा ने जिस बात को जाकिर नायक पूरे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर खड़े होकर के बोलता था और सारे मुसलमान दुनिया के ताली बजाते थे उसी बात को भारत की एक महिला नुपुर शर्मा ने टीवी चैनल पर बैठ कर के बोला तो इस दुनिया के सारे मुसलमान देश एक छत्र के नीचे आ गए और उसके खिलाफ फतवा जारी कर दिया और भारत में तथाकथित जितनी भी हिंदूवादी पार्टी चल रही है उन्होंने उसको बर्खास्त कर दिया और एक भी हिंदू संगठन उसके फेवर में नहीं आया यदि कोई आया तो वह भी केवल और केवल आर्य समाज ही था

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😲 अपना Point साबित के लिए इतने कुतर्कआइये कुछ Cross Questions करें।

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