अगर आप चाहते हो राम और कृष्ण पैदा हो तो आपको पहले देवती और कौशल्या जैसी माताए पैदा करनी होंगी तो वो संस्कारों से ही होंगी अभी हम लोग केरला स्टोरी देख कर ही चुके हैं कि भाई अपने बच्चों को नहीं पता और जब तक आप नहीं बताओगे वही पौराणिक रोक दिया मंदिरों में भी नहीं जाना आर्य समाज में भी नहीं जाना तो वो लव जिहाद में फसें ही फसें पुरुष तो अपनी कमाई का हिस्सा घर में देगा पुरुष की कमाई से घर चलेगा और महिला जो कमा रही है उससे वो केवल अपने श्रृंगार करेगी केवल अपने आभूषण बनाएगी अपने कपड़े बनाएगी महिला जो कमा रही है उससे वो केवल अपना ही तो पोषण कर रही [संगीत] है आप लोगों का बहुत-बहुत धन्यवाद कि आपने गुरु कुलों की पुनर स्थापना उनके पुनर्निर्माण के लिए विश्वानी सेवा फाउंडेशन को खूब सपोर्ट दिया और यह सपोर्ट आगे भी आपका चलता रहे इसके लिए मैं आपसे बार-बार अपील करता रहूंगा जो हमारे भाई बहन गुरुकुल को अच्छा देखना चाहते बढ़ते हु देखना चाहते हैं विश्व गुरु भारत की ओर केवल गुरुकुल ही ले जा सकते हैं ऐसा जो मानते हैं वह हमें इस क्यूआर कोड पर स्कैन करके सपोर्ट कर सकते हैं महिला सशक्तिकरण क्या है और उसकी आवश्यकता ही क्यों पड़ी जैसे आपने अभ कहा की सशक्तीकरण की आवश्यकता क्यों पड़ी आवश्यकता का मुख्य कारण जहा तक मुझे लगता है व ये है प्राचीन काल से लेकर के जैसे जैसे देश की परिस्थितियां बदलती चली गई उन बदलती परिस्थितियों में कहीं ना कहीं महिलाओं को अपनी स्थिति या अपनी अवस्था को खोजना महिला अपने आप को इस समय कहा पाती है उस चीज में अपने आप को ढूंढते हुए जब वो अपना स्थान देखती है उस अपने स्थान बनाने की दिशा में हमें महिला सशक्तिकरण की आवश्यकता पड़ी तो किस दिशा में बन रहा है बन भी रहा है या नहीं बन रहा है वो अलग बात है लेकिन महिलाए भारतीय समाज का या राष्ट्र का या एक परिवार का निर्माण करने में कहा तक योगदान दे रही है इस स्थिति को स्पष्ट करने के लिए महिला सशक्तिकरण की आवश्यकता [प्रशंसा] पड़ी बिल्कुल बहुत अच्छा क दे और शने बताया आपका प्रश्न बिल्कुल महत्वपूर्ण है कि पहली बात तो सशक्तिकरण है क्या और उसकी आवश्यकता क्या है हमने देखा समाज में एक समय जब ऐसा आया अभी तो किसी किसी भी हम साहित्य की बात करें किसी भी अन्य समाज की बात करें तो वहां आवश्यकता होती है कि नारी वहां प किस भूमिका में है किसी भी समाज को देखने का जो एक दर्पण ऐसा कहा जाता है कि वहां की नारी की स्थिति क्या है तो उससे उस समाज का एक पैमाना तय किया जाता है और जब हम कहते हैं कितनी भी बातें कर ले हम कितनी भी व्यवस्थाएं बना ले लेकिन नारी उस समाज का मूल होती है और सशक्तिकरण की आवश्यकता है जब तक जड़ मजबूत नहीं होगी तब तक उस समाज को किस क्या दिशा मिलेगी ये हम नहीं जान सकते और वो जड़ मजबूत किस रूप में हो सकती है जैसा अभी करुणा जी ने बताया कि बहुत सारे अलग अलग वहां पे मत आते हैं कि किस किस क्षेत्र में वो मजबूत है और मूल सशक्तिकरण जो शब्द सामान्य भाषा में प्रयोग किया जाता है तो उसको एक सामाजिक रूप से वो कितनी दृढ़ है और वो शारीरिक रूप से कितनी दृढ़ है और उसको कितने अधिकार समाज में मिले हैं जो आज के लिए भी बहुत ज्यादा आवश्यक है उस इतर वेद ने हम क्या अधिकार दिए दयानंद ने क्या बात की है अधिकारों की तो वो सब देखना सशक्तिकरण का अभिप्राय हो सता हैटी की बात आती है तो महिलाए बोलती है हम पुरुषों जैसा अधिकार चाए और दूसरी तरफ फम वाली बात भी आ जाती है तो इस पर आपका क्या पॉइंट ऑफ है बिल्कुल आपका प्रश्न सही है कि हम पुरुषों जैसा अधिकार चाहते हैं जैसा अभ ने बताया कि हम सहूलियत के हिसाब से देख रहे हैं अ मना जी ने बोला एक समय था जब जैसा हमने वेद की बात की तो वेद में सारी चीज ज ब्रह्मचर्य सूक्त बात करता है तो वो वेन की भी बात करता है और उपनयन की भी बात करता है और जैसा कहा मातन पन आचार्य मान पुरुष वे मावा शब्द स्वयं में इतना सशक्त है उस मान शब्द में आप समझिए आप वेन कर रहे है पुरुषों को बाल को बहुत गुकुल है और इस मच कहना चाहती कन गु है समाज के है अन है नहीं होते तो वहा कहते है का अधिकार है जितने भी संस्कार होते है बालको के हो सकते है बेटियों के संस्कार की क बात ही नहीं कही है तो आप मानि जब वो बात करते है वो माता जो निर्माता है जसे कोई इंजीनियर होता है एक बहुत से हम एक कथा सुनते हैं कि एक पृष्ठ पर आगे भारत का नक्शा था और दूसरे पृष्ठ पर पीछे एक मनुष्य बना हुआ था वो पजल गेम जैसा था तो किसी ने कहा कि भाई भारत का नक्शा तो बन ही नहीं रहा बहुत मुश्किल है इसको कैसे जोड़ा जाए तो उसको बताया गया कि इसके पीछे एक मनुष्य का नक् बना हुआ है मनुष्य का चित्र बना हुआ है उस मनुष्य के चित्र को जोड़ दो तो भारत का चित्र स्वयं निर्मित हो जाएगा तो ये राज्य के निर्माण की ये प्रक्रिया है तो वो माता वो इंजीनियर जिसके हाथ में मनुष्य का निर्माण है चरित्र का निर्माण है उस माता को संस्कारित ना किया जाए तो ये तो कोई बात ही नहीं हुई ना तो सबसे पहले माता के संस्कार की बच्चों के बच्चियों के संस्कारों की बात की गई होगी कि उसको आप जैसा गोगे अगर आप ये बहुत तथ वाली बात है अगर आप चाहते हो राम और कृष्ण पैदा हो तो आपको पहले देवकी और कौशल्या जैसी माताए पैदा करनी होंगी तो वो संस्कारों से ही होंगी तो जब बात करती है कि पुरुषों जितने संस्कारों की क्या आवश्यकता है या पुरुषों जितनी बराबरी क्यों चाहिए ये तो बिल्कुल बात है कि पुरुषों जितनी बराबरी हर क्षेत्र में चाहिए जैसा अभी आयुष ने कहा कि भाई हम सशक्त है और कहीं आवश्यकता है तो अभी साहित्य में बहुत सारी चीजें हम लोग पढ़ते हैं मीम्स वगैरह भी होते हैं कहते हैं कि कोई स्त्री यदि बने तो ऐसी प्रेमिका बने ऐसी पत्नी बने कि वो पुरुष को अपना कंधा दे सके रोने के लिए तो उनको भी बराबरी मिलनी चाहिए कि आप रो मत कहिए कि पुरुष को दर्द नहीं होता उसको रोने का अधिकार दो और अपने आप को इतना सशक्त होने का अधिकार दो कि आपको छोटी-छोटी चीज में उसकी आवश्यकता ना पड़े अपने भाई की अपने पति की आवश्यकता ना पड़े तो इस रूप में बराबरी होगी तो अच्छी बात है अन्यथा सहूलियत वाली बात करेंगे तो वो तो फिर ब पात हो जाएगा न बहुत अच्छा उतर दिया द आपने अगर हमें बच्चे को संस्कार देना है उसको आगे बढ़ाना है तो लक्ष्य निर्धारित करना पड़ेगा पर आजकल हम देखते हैं तो लोगों के लक्ष्य ही अलग अलग है कि हमें बच्चे को फैशन मॉडल बनाना है हमें बच्चे को फिल्मों में भेजना है हमें बच्चे से यह काम नहीं कराना है मेरी बेटी की ड्रेस ऐसी होनी चाहिए तो इस प्रकार के मतलब बहुत सारे चेंजेज आ रहे है तो उनका उनका जो ग्रोथ है वो उस हिसाब से नहीं हो रहा जिस हिसाब से होना चाहिए था जैसे हमारे वैदिक कल्चर में हुआ करता था तो इस पर श्रद्धा जी मैं आपसे पूछना चाहती हूं कि वो निर्माण कैसे होगा जो हम एक्चुअल में चाहते हैं जो हमारे भारतीय संस्कृति के अकॉर्डिंग होना चाहिए देखिए आपका प्रश्न मैं थोड़ा पूर्व से लेके चलूंगी मतलब मैं प्रारंभ से लेकर के चलूंगी प्रारंभ य से की भारत क्या है हमें सबसे पहले ये समझना पड़ेगा हमें अपनी बुद्धि जो हमारी मनीष है ना उसम ये बात अच्छे से स्थिर करनी पड़ेगी कि इस धारा पर भारत उसके मौलिक नियम क्या है भारत का मूल नैतिकता क्या है और जो इस पृथ्वी पर अन्य देश है वो भारत जैसे नहीं ये बात हमें ये दो अलग अलग बात नहीं है एक ही बात है कि भारत अन्य देशों जैसा नहीं है जितने भी देश है उनके जो मौलिक नियम है नैतिकता है वो बिल्कुल अलग है और भारत की जो मौलिकता है वो बिल्कुल अलग है आपके प्रश्न का उत्तर इसी में मिलेगा यदि हम भारत के मूल को देखेंगे हमारा जो सिस्टम है भारत की जो व्यवस्था है वो हमारे ऋषियों मुनियों ने बहुत सोच समझ के विचार के पढ़ कर के उन चीजों पर र अध्ययन करने के बाद निर्माण की है हम पशुओं की समझ में की तरफ ब बढे नहीं है हम समाज में रहने वाले मनुष्य है और उस समाज को विधि विधान से बनाया गया है जैसे व्यक्तिगत रूप से देखे तो मनुष्य की आयु को चार भागों में बांट करके ब्रह्मचर्य गहन सन्यास चार आश्रमों में बांट दिया और यदि समाज की दृष्टि से देखेंगे तो समाज को भी चार वर्गों में बांट दिया वो ब्राह्मण क्षत्रिय वै सूत्र वो य पर का विषय नहीं है तो ये जो वर्ण और आश्रम में बटा हुआ समाज है इसको बाटने के पीछे बहुत बड़ा वैज्ञानिक कारण था हमारे षि ब्रह्मा से लेकर के महर्षि दयानंद तक जितने भी महापुरुष हुए हैं ऋषि हुए हैं मुनि हुए हैं जिन्होने इस विषय पर चिंतन किया है समय समय पर आ कर के लोगों को जागृत किया है जो अभी ये शब्द बताया है कि हमें जगाना है कर्तव्य बोध कराना है जागृत किया है उस जागरण में ही छिपा हुआ है कि हम उन संस्कारों को ले अब विषय जिस कम में चल रहा है हम महिला शक्ति में आ जाते है एक जो महिला शक्ति है महर्षि दयानंद ने बहुत सारे जो शास्त्र ग्र है पुस्तक ऐसी लिखी है जिसम व नियम से बताते है व संस्कार किस तरह से बालक में डाले जाए महर्षी दयान सरस्वती जी का सबसे बड़ा जो हमारे लिए योगदान रहाय रहा शिक्षा के प्रबल समर्थक सत्या प्रकाश जो की उनके द्वारा ख बहुत सतम पुस्तक है सत्या प्रकाश में वो बहुत सी ऐसी बातें लिखते हैं स्पष्ट रूप से लिखते हैं वैसे तो जितने भी ऋषि मुनि है अपनी बातों को सूद रूप में कहते हैं लेकिन सूद रूप में कही हुई बातों से हमें अर्थ निकालना होता है महर्ष दयानंद में जिन विषयों को प्रबलता से कहना चाहते थे उनको पुनः पुन लिखा है हर स्थान पर उन्होंने लिखा है बालक बालिका की शिक्षा हो माता पिता संस्कारित करे माता पिता बच्चों को विद्या शिक्षा गुण स्वभाव स्वरूप शरीर आत्मा से संस्कारवान युक्त करे द्वितीय तीय समला में विषय विस्तृत रूप से आता है तो यदि संस्कारों की बात चलती है तो हमारे यहा पर 16 संस्कार है 16 संस्कार है मुख्य रूप से जब एक माता गर्भ धारण करती है उस गर्भ में जो शिशु पल रहा है उस माता के द्वारा उन पिता के द्वारा और जिस परिवार में व बालक आने वाला है उस पूरे परिवार के द्वारा उस गर्भस्थ शिशु के और माता के तीन संस्कार किए जाते है जिसम सर्वप्रथम पहला संस्कार होता है गर्भधान संस्कार दूसरा संस्कार होता है पुसन संस्कार तीसरा संस्कार होता है सीम संस्कार सन संस्कार जो गर्भ है जो धारण किया है या किया जा रहा है वो स्थिर हो कर के धारण हो सके पहले तीन महीनों में होता है फिर है पुस संस्कार जो माता है वो अपने शरीर का ध्यान रखे विशेष रूप से परिवार से प्रसन्न रखे संतुष्ट रखे उसके लिए जो भी अच्छी चीज है उनकी व्यवस्था कर सके और तीसरा जो संस्कार है पांचवे महीने से छठे सातवे आठवे में किया जाता है यज इत्यादि के द्वारा मंत्र पाठ के द्वारा तो उसम बच्चे का मस्तिष्क जो है वो अच्छे से बढ़ सके तो संस्कार गर्भ से प्रारंभ होते हैं कोई भी भूमि में अगर हम बीज बोते हैं तो ऐसे ही नहीं फेंक देते उसे एक व्यवस्थित तरीके से भूमिका जैसे निर्माण किया जाता है उसी तरह से एक पुण्य आत्मा का अपने शरीर में आवान किया जाता है कि मैं एक ऐसी आत्मा का अपने शरीर में आवान करता हूं मैं एक ऐसी पुण्य आत्मा को अपने शरीर में बुलाना चाहती हूं जो इस समाज को परिवार को देश को नई दिशा दे सके और ये संस्कार होने के बाद क्रम से जब बच्चा जन्म ले लेता है घर से पहली बार बाहर निकलता है जात कर्म आप इसे किस नाम से बुलाएंगे नामकरण कर्ण भेदन और चूड़ा कर्म उसके बाल भी हटवाए जाते हैं जन्म के बाल तो इस तरह से चूड़ा कर्म उपनयन वेदार और फिर विद्या पूरी होने के बाद समावर्तन समावर्तन हो जाएगा समावर्तन पर एक एक चिंतन मेरा है मैं भी आपके समक्ष बाद में रखूंगी उसके बाद विवाह संस्कार होता है विवाह के बाद वान सन्यास और अंत संस्कार हमारे य शरीर का भी संस्कार किया जाता है तो संस्कारों की इस परंपरा को जब हम देखते है संस्कार कैसे देने चाहिए तो संस्कार गर्भ से ही देना प्रारंभ हो जाता है जब बालक मां के गर्भ में होता है तभी हमें इस तरह का वातावरण अपने चारों तरफ बनाना चाहिए क्योंकि आज का जो ये सशक्तिकरण का विषय चल रहा है महर्षि दयानंद महिलाओं का जो वास्तविक शक्ति करण मानते थे वो मातृत्व में ही मानते थे क्योंकि उन्होंने सत्या प्रकाश के द्वितीय सब उल्लास के प्रथम पैराग्राफ में वो लिखते हैं माता जितना बच्चे का कल्याण कर सकती है माता जितना बच्चे का उपकार कर सकती है मातृ देवो भव कि माता सबसे प्रथम माता को रखा जितने भी देव है उसम सर्वप्रथम माता है क्योंकि माता बच्चे के उतने ही निकट रहती है आप सबने देखा होगा मां बच्चे को जिन इमोशन से बड़ा करती है बच्चा उसी स्वभाव को लेकर बड़ा होता है तो यदि बच्चे में बच्चे को संस्कारित करने की बात है तो उसमें हमें सर्व प्रथम यही ध्यान देने की बात है कि हम प्रारंभ से उसके लिए वो वातावरण तैयार करें प्रारंभ से ही उसके लिए वो एक तरह से पूरी दिशाए तैयार करें जिसके वो इस समाज को राष्ट्र को नई दिशा दे सके तो महर्षि दयानंद ने इस विषय पर बहुत विशेष रूप से प्रभाव प्रकाश डाला है और बालिकाओ की कन्याओं की पाठशाला खुलवाना हो चाहे उसम फिर विधवा विवाह का समर्थन करना हो चाहे उसमें फिर सती प्रथा का विरोध करना हो और चाहे उसम लड़कियों को सभी तरह की कलाओं को सीखना हो तो महर्षि दयानंद की दृष्टि से तो यही संस्कार है यही सशक्तिकरण है कि आप हर दिशा में हर प्रकार से आगे बढ़े ऐसा स्वामी दयानंद भी मानते हैं और ऐसा मैं मानती हूं ओम समलैंगिकता के आज अधिकारों के लिए लड़कियां लड़ रही है और हमारे देश को मजबूरन कानून बनाने की भी आवश्यकता पड़ रही है तो क्या हमारे देश में ऐसे कानून बनने चाहिए तो सुमेधा जी आप बताइए ये प्रश्न बहन ने पूछा समलैंगिकता वाला अभी जो बात इन्होंने की मैं पहले से थोड़ा सा बस इसमें ऐड करना चाहती हूं अभी कश्मीर विश्व विद्यालय में मैंने एक पेपर आयुष जी प्रेजेंट किया उस पेपर का ही शीर्षक था वेदों में नारी का महात्म और आप सोचिए कि वो गलती से वहां पे जो आचार्य गण थे अब जो लोगों ने यह पेपर पहले पढ़े उसमें कहा भाई विद्वा विवाह का वर्णन है और इस तरह से साम्राज सशु भवा आदि बात कही जाती है मैंने उसमें ऐड कर दिया ब्रह्मचर्य सूक्त में कहा है कि भाई नारी को वेदा अध्ययन का भी अधिकार है उपनयन का भी अधिकार है इसी बात पर मैं तीन मिनट में पेपर खत्म करके बैठने वाली थी उस चर्चा को 10 मिनट लग गए आप सोचि और उनका प्रश्न क्या था उनका मंतव्य क्या था कि आप उपनयन की बात कर रहे हैं चलो आपने ब्रह्मचर्य सूक्त पढ़ लिया है ठीक है उपनयन की बात होती है वहां पे और वेद पाठ की बात होती है इतने तर्क दे दिए ना इतनी देर में जैसे आपने बताया कि भाई या कमेंट्स भरे रहते हैं इतने तर्क दे दिए कि लड़कियों को ये ये ये ये क्यों नहीं मिलता और मैं इस मंच पर थोड़ा सा कहना चाहती हूं उन्होंने सीधा बोला कि लड़कियों को मासिक धर्म की समस्या होती है इसलिए ऐसी बातें लेकिन आप 10 चार पांच वर्ष का छ वर्ष का बालक गुरुकुल में चला जाता है वो दो-तीन वर्ष तो आप अलाव कर सकते हो ना बेटियों को वेद पाठ करना और उपनयना आदि करना तो तर्क तो इतने कुतर्क है और सीधी बात है कि आचार्य नंदिता जी की बात की बहन ने तो इसन चीजों पे हमें बोलने की आवश्यकता है और गायत्री मंत्र बेटियों को पढ़ने का हमें अधिकार देना है इसलिए ताकि वो ये ना सोचे हनुमान चालीसा बच्चों को नहीं आती गायत्री मंत्र नहीं आते वेद पाठ आती तो भूल जाइए अपने ग्रंथों के नाम नहीं पता अभी हम लोग केरला स्टोरी देख कर ही चुके हैं कि भाई अपने बच्चों को नहीं पता और जब तक आप नहीं बताओगे वही पौराणिक रोक दिया मंदिरों में भी नहीं जाना आर्य समाज में भी नहीं जाना तो वो लफ जिहाद में फसें ही फसें आप उन बेटियों को बचाना चाहते हो तो ये सब बोलना आवश्यक है और समलैंगिकता वाली बात जब बहन ने पूछी तो यह बोला जाता है कि भाई आप एक बात सोचिए अभी एक महिमा मंडन इस तरह से चल रहा है ना भोगवा का पश्चिमी संस्कृति का बहुत सी बातें हम यहां पर कर रहे हैं अब विवाह संस्कार जब पढ़ेंगे महर्षि दयानंद का पढ़िए वेदों में पढ़िए जहां भी पढ़िए हर चीज का प्रयोजन होता है आचार्य चाणक्य कहते हैं कि बिना प्रयोजन के कोई भी चीज संसार में होती ही नहीं है तो हर चीज का प्रयोजन होता है विवाह के पीछे भी प्रयोजन है कि भाई संसार में अभिवृद्धि सद्धि करनी है संसार को एक जीने योग्य स्थान बनाना है दो यथा गुण समान गुणों वाले बालक बालिका लड़का लड़की मिलकर विवाह करें तो विवाह का मतलब केवल यह नहीं है कि मुझे प्यार हो गया किसी से मुझे कोई अच्छा लग रहा है मुझे इसके साथ जिंदगी बितानी है आप उत्तरदाई है समाज के लिए राष्ट्र के लिए धर्म के लिए सिद्धांतों के लिए उन ऋषि परंपराओं के लिए जब हम यजो पवित धारण करते हैं तो तीन ऋण हमारे ऊपर होते हैं तो हमारा उत्तरदायित्व होता है उन ऋणों को चुकाना केवल अपना जीवन अपने स्तर पर जीना हमारा उद्देश्य नहीं होता तो समलैंगिकता आदि की जब बात होती है तो आप स्वार्थी होकर जब यह बात करते हैं और फिर वही समाज में पाश्चात्य करण इतना ज्यादा बढ़ रहा है कोर्ट को भी रूल्स बना देने पड़ते हैं और एक दिन मैंने कुछ दिन पहले कल्पना दी का एक वक्तव्य सुना था पेपर प्रेजेंटेशन ही था उसमें उन्होंने बताया था कि किस तरह ये हमारे समाज को तोड़ने की बात है किस तरह हमारे राष्ट्र को हमारी संस्कृति को छिन्न भिन्न कर देना चाहते हैं कि आगे आपके पुत्र हो ही ना आपकी पुत्रियां हो ही ना आप अपने स्तर पर जीवन जी के खत्म हो जाओ आपकी जमीनें उनकी हो जाए आपका सारा जो भी समृद्धि है वो उनकी हो जाए और वही वाली बात हो वो बाइबल लेकर आए थे बाइबल आपके हाथ में आ गई जमीने उनके हाथ में चली गई तो ये सारी चीजें चाहे लिव इन रिलेशनशिप की बात कर ले समलैंगिकता की बात कर ले ये हर दृष्टि से संस्कृति को समाज को तोड़ने का प्रयास है और आवश्यकता है हमें कि हम संस्कारों पे विवाह संस्कार हो या फिर बचपन से लेकर गर्भाधान आदि संस्कार हो संस्कारों को 16 के 16 संस्कारों को बेटे और बेटी के लिए दृढ़ता से उनका प्रतिपादन ऋषियों ने किया है हम उनका इंप्लीमेंटेशन समाज में करें अपने अपने परिवारों में करें यही इसका एक समाधान हो सकता है धन्यवाद आज हमारे देश में डाइवोर्स के केसेस बहुत बढ़ रहे हैं पहले डाइवोर्स के केस पाश्चात्य देशों में ज्यादा देखे जाते थे तो क्या इसका कारण कहीं ना कहीं महिला सशक्तिकरण है तो श्रद्धा जी मैं आपसे पूछना चाहूंगी हां ये जो आपने कहा ना कि क्या तलाक का जो कारण है वह महिला सशक्तिकरण है दरअसल बात यह है कि जो तथाकथित सशक्तिकरण है ना कहीं ना कहीं वह कारण है जैसे जो बात छोड़ी गई है आचार्य जी द्वारा उसी को आगे बढ़ाती हूं अब तक जो शक्तियां आक्रमण शस्त्रों से कर रही थी अपनी पुस्तकों के माध्यम से कर रही थी आज वह शक्तियां उन्होंने देश का जिस तरह से नुकसान किया वो किया लेकिन देश में नहीं फिर भी कुछ ना कुछ किसी रूप में बचा रहा अब जो आक्रमण हो रहा है वो मूल रूप से भारतीय परिवारों के ऊपर हो रहा है वो जो आक्रमण हो रहा है व्यक्ति व्यक्ति पर हो रहा है पर जब आक्रमण हो रहा है कि पूरा जो सिस्टम है उसी को तोड़ दिया जाए मतलब रा पर आक्रमण हो रहा था हमारे परिवारों में एकता थी दादा दादी परिवार को संभाला करते थे जो दंपति होते थे बच्चों के निर्माण में पूरा प्रयास किया करते थे लेकिन अब क्या हो रहा है वह देखने वाली बात है महिलाओं को क्या करना पड़ता है घर में रह कर के बच्चों का पालन पोषण करना पड़ता है या अपना पूरा समर्पण करके परिवार का निर्माण करना पड़ता है ये जो सशक्तिकरण है हम इसे दो रूप में बांट सकते हैं एक है गांव का सशक्तिकरण एक होता है शहरी सशक्तिकरण गांव में क्या चीजें हैं भाई महिलाएं जो है वो पर्दे से दूर रहे महिलाएं दहलीज पार कर सके महिलाएं शिक्षित हो सके या परिवार में अपना निर्णय ले सके किसी भी विषयों पर या समस्याओं पर इसके अतिरिक्त जो शहरी जो सशक्तिकरण है वो क्या है कि हम अपने अनुसार कपड़े पहन सके हम अपने अनुसार उठ सके बैठ सके बोल सके यहां तक कि शब्दों का भी सशक्तिकरण हो गया है चर्चा चल रही थी जैसे कि अगर कोई प्रोफेसर यूनिवर्सिटी में बैठकर बोलता है प्रिय छात्रों वो प्रिय छात्राओं भी बोल बोले त ब जो है वो समानता का अधिकार होगा इसी तरह से जैसे पहले बहुत सारे शब्द ऐसे हैं जो पुरुषवाचक थे उसको अब महिला वाचक भी बना दिया गया ताकि हमें समानता मिल सके तो परिवार को जो महिला अपना सर्वस्व समर्पण करके पालन पोषण करती थी अब वो स्थिति रे धीरे-धीरे परिवारों के टूटने से बिखरती सी जा रही है इसमें क्या होता है महिलाएं क्या किया करती थी पहले समय में क्या होता था भोजन महिला बनाती थी और सबसे बाद में खाती थी आज का जो शहरी सशक्तिकरण है वो यह कहता है क्या महिला साथ नहीं खा सकती क्या महिला पहले नहीं खा सकती क्या हम सबसे निचले स्तर पर आते हैं या मैं दोयम दर्जे की हूं तो ऐसा नहीं था आप इसे दूसरी दृष्टि से देखिए मेरे परिवार में भी मेरी मां भी बाद में इसलिए खाया करती थी कि मैंने जो भोजन की व्यवस्था की है वह व्यवस्था कम ना पड़ जाए सबके लिए भोजन पूरा हो जाए कोई अतिथि आ जाए कोई बाहर से आगंतुक आ जाए कोई भी पशु भी है सबको भोजन पर्या प्रत मिले उसके बाद मैं खाऊं ऐसी मां मतलब मां की जो भावना हुआ करती थी पिता का क्या होता था भाई जो पिता है वो कमा रहा है वो अपने घर में जो भी कमाई करके ला रहा है सबका पूरा जो भी खर्च है अन्न का भोजन का वस्त्रों का जिस भी चीज में बच्चों की शिक्षा का बूढ़ों की औषधि का जो भी खर्चा है वो पूरा हो जाए उसके बाद कमाने वाला जो घर का पुरुष होता था वो अपने लिए कुछ खरीदता था या लाता था तो ये एक व्यवस्था होती थी कि महिला जो है अपना पूरा कर्तव्य का निर्वाहन करते हुए परिवार का पोषण कर रही है और पुरुष अपने कर्तव्य का निर्वाण कर रहा है लेकिन वर्तमान समय में जो सशक्तिकरण सशक्तिकरण रूपी जो भवन है इसके जो स्तंभ होने चाहिए थे वो स्तंभ ही अब भवन बन गए हैं वो स्तंभ ही हम नीव बन गए हैं जैसे आर्थिक सशक्तिकरण महिलाओं को लगता है मैं कमाऊ गी मैं अपने पैसे रखूंगी मेरे हाथ में पैसा होगा तो मैं खुद ही कमाऊ आर्थिक मतलब आर्थिक समर्थ होना आर्थिक रूप से सामर्थ्य महिलाओं के पास होना यह केवल एक स्तंभ था सशक्तिकरण का वो आर्थिक उसके पास धन भी हो या वो इस रूप में शिक्षित हो यदि पति को कुछ हो जाए या पारिवारिक स्थिति इस रूप में पहुंच जाए कि उसे कमाने के लिए बाहर निकलना पड़े या कमाने के लिए कोई कार्य करना पड़े घर से कोई व्यवसाय चलाना पड़े वो उसके लिए हर समय तैयार रहे तो आर्थिक जो सशक्तिकरण है वो एक स्तंभ था लेकिन उसको भवन बना दिया जब महिला घर से कमाने के लिए निकलती है तो जो बातें आप लोग के सामने सभी वक्ताओं ने यहां पर रखी वो सारे दुर्गुण हमारे समाज में आते हैं और वो विनाश का कारण बनते हैं और वो विनाश जो है वो दिखाई नहीं देता शरीर के कैंसर के तरह होता है दिखाई नहीं देता किस रूप में जब आप बाहर कमाने जाते हो तो सही दृष्टि से बताती हूं मैं अगर बाहर कमाने जाती हूं तो मैं सवारी लेती हूं अपने स्थान पर पहुंचती हूं व व जाक परिश्रम करती हूं थक जाती हूं घर आती हूं तो मैं इस अवस्था में बिल्कुल शेष नहीं रहती कि मैं आकर के परिवार की चीजों का भी पालन पोषण परिवार की चीजें भी व्यवस्थित कर सकूं तो यहां पर क्या होता है जब दोनों ही कमाते हैं तो पुरुष तो अपनी कमाई का हिस्सा घर में देगा पुरुष की कमाई से घर चलेगा और महिला जो कमा रही है उससे वह केवल अपनी श्रृंगार करेगी केवल अपने आभूषण बनाएगी अपने कपड़े बनाएगी महिला जो कमा रही है उससे वो केवल अपना ही तो पोषण कर रही है ऐसा इसरू में तो बहुत ज्यादा नहीं कमाती या सहयोग नहीं बड़ा कुछ लेना होगा घर लेना होगा गाड़ी ले कुछ भी करना होगा तो पुरुष के हिसाब से वैसे तो समान रूप से महिलाएं अधिक कमाती हैं तो ये सब चीजें भी अपनी भी पूर्ति करती हैं घर लेना गाड़ी लेना मैं ये नहीं कह रही हूं लेकिन एक परिवार में अगर आप मिडिल क्लास फैमिली में अगर महिलाएं इस रूप में कमा रही हैं तो जो उनका मुख्य कर्तव्य था मातृत्व वाला जो कार्य था बच्चों को संस्कारित करने वाला जो कार्य था वो पीछे हट जाता है पीछे हट जाता है मतलब वो बैलेंस बिगड़ जाता है और जब बैलेंस बिगड़ता है तब इस तरह की चीजें बहुत ज्यादा होती है कि दोनों लोग जब कमा रहे हैं वह समझती है कि मैं सामर्थ्य शालिनी हूं मैं क्यों इसके पैसों की धोस देखूं या इससे क्यों मांगू और जब हम विचारधारा में आर्थिक रूप से एक समान नहीं रहते तो परिवारों में यह स्थिति बहुतायत पैदा होती है कि तलाक वाली स्थिति बनती है या मनमुटाव वाली स्थिति बनती है और जब हम समाज का यह जो परिवेश आज तैयार हो रहा है भा बाह्य संस्कृति का बाह्य सभ्यता वाला तब इस तरह की बनाए ज्यादा देखने को मिलती है कि हम लोग अपने माता-पिता का जो तपस्या रही है परिवार को बनाने में उसे नहीं देखते हैं और इन व्यवहारों में क्या होता है सबसे बड़ी कमी जो मैं प्रायः मंच से कहती हूं वो माता-पिता की भी रहती है जब बच्चे सुनना छोड़ देते हैं तो माता-पिता कहना भी छोड़ देते हैं हम मैं जब मैं मंच से उतरती हूं तो माताएं कहती है आपकी बात बिल्कुल ठीक लगी आपने बहुत अच्छी बात कही आपका तरीका भी ठीक था लेकिन मेरी बहू तो ऐसी है सुनती नहीं है ये नहीं है फिर हम कहते नहीं है हमें फिर कोई उनसे मतलब नहीं है आपको मतलब जो माता-पिता है जो बूढ़े दादा दादी है वो कहना यदि नहीं छोड़ते हैं तब हमारे परिवारों में हम उन्हें कहना ना छोड़े हम उन्हें समझाना ना छोड़े तो इस तरह की स्थिति नहीं बनेगी कि बच्चों को अलग-अलग रहना पड़े कि इतना तो मैं कमाने लगी हूं अपने बच्चों को साथ रखूं और दूसरी बात जो चरित्र शिक्षा की बात चल रही थी तलाक का सबसे बड़ा कारण आजकल यह भी बनता है कि जो चारित्रिक दोष हमारे परिवेश में परिवारों में व्यक्तिगत रूप से आ गए हैं कि अभी बताया गया कि वो अपना संबंध बाहर किसी से रख रही है या पुरुष अपना संबंध बाहर किसी से रख रहा है घर में बच्चा जो है वह मेड़ के हाथ में सौंप रखा है कैमरा लगा रखा है घर में मेड़ को कैमरे से देख रहे हैं और मेड़ कैमरे में कैसे-कैसे पाल रही है उसको कैमरे में इंस्ट्रक्शन दे रहे हैं ऐसे मत करो वैसे मत करो तो फिर वो बच्चा मां को मां कैसे कहेगा भारत मां को मां कहना तो बहुत दूर की बात है तो परिवारों को परिवार बनाना यह वास्तविक रूप से सशक्तिकरण है महिलाएं भले ही समाज में कितना भी काम करें आज परिस्थिति बदलती है युगों में में नहीं वर्षों में नहीं अब तो महीनों महीनों में बदल जाती है तो परिस्थिति बदल रही है उनके अनुसार हम आधुनिक हो रहे हैं उनके अनुसार हमारे पास सारी सुख सुविधाएं भी है आधुनिक उपकरण भी हैं लेकिन उन आधुनिक उपकरणों के होते हुए उस शिक्षा आधुनिक शिक्षा के होते हुए भी हमें व्यक्तिगत रूप से अपने परिवारों की परिस्थिति को देखते हुए सबकी परिस्थिति अलग-अलग होती है व्यक्तिगत रूप से अपने परिवारों की परिस्थिति को देखते हुए उन निर्णयों को लेने की आवश्यकता है कई मेरी बहू अपनी कंपनी में अपने बोस से इतनी परेशान तो नहीं है कि वह अपने पति से दूर जा रही है या मेरा बेटा परिवार के पालन हो गया इनके शौक पूरे करने में एक मानसिकता अपनी खराब तो नहीं कर रहा है तो यह सब चीजें हमें सबको पारिवारिक स्तर पर देखनी है बहुत बड़ा बड़े उदाहरण ना देते हुए यदि मैं आज इस मंच पर बैठी हूं मैं यदि इस मंच पर बैठी हूं तो किसी ने मुझे यह नहीं कहा जाओ देवी तुम साक्षात विद्या की मूर्ति हो चलो मंच पर बैठो नहीं मेरा भी पर परिवार है पति देव है दोदो बच्चे हैं मेरी मां भी है पिताजी हैं परिवार है पूरा मैंने उन्हें यह समझाया है यह परिस्थिति घर में बनाई है उन्हें यह बताया है कि मैं इस यह मेरी शिक्षा है यह कार्य मुझे करना है इस कार्य को करने के लिए मुझे यह ये आपका सहयोग चाहिए होगा वो मुझे अपना 100% तब देते हैं जब मैं 1000 प्रतिशत अपना समर्पण उनके प्रति देती हूं उनके कार्यों के प्रति देती हूं ऐसा नहीं कि वो सेवक की तरह मेरे लिए लगे रहते मेरे बच्चों को संभाल ते हैं इतने छोटे हैं कि अभी विद्यालय भी स्कूल भी नहीं जाते हैं तो कहने का मतलब यह है अगर आपको बाहर कमाने जाना है तो किध भी शर्तों पर नहीं बल्कि सशर्त इस बात पर जाना है या जो भी आपको अपनी उन्नति करनी है या जो भी कार्य करना है पढ़ना है जो भी चीजें करनी है वो इस शर्त पर कि आपके जो माता-पिता है वही आपके बच्चे का परिवार का संपत्ति का रक्षा ध्यान अच्छे से रख सकते हैं ना कि कोई सेवक और सेविका तो यह माहौल आपको परिवार में क्रिएट करना पड़ता है उन्हें समझाना पड़ता है उनके साम ने ये उदाहरण रखने पड़ते हैं उनका धन्यवाद ज्ञापन करना पड़ता है उनके प्रति आभारी कृतज्ञ होना पड़ता है कि आप मेरे लिए कुछ कीजिए मैं आपके लिए सब कुछ करूंगी क्योंकि महिलाओं की विशेष रूप से बात चल रही है आप वो माता-पिता आपके लिए करने के लिए तत्पर रहते हैं यदि हम यह भाव अपने अंदर जगाएं तो तलाक का मुख्य कारण यही होता है कि सशक्तीकरण के जो स्तंभ है हमने उनको ही भवन मान लिया है यदि उन स्तंभों से उन शिक्षा को उन आर्थिक को सामाजिकता को परिवार को उन स्तंभों को मजबूत बनाते हुए हम अपना भवन तैयार करें तो ये तलाक जैसी स्थिति अलग रहने जैसी स्थिति और यह जो मानसिकता है लिविन में रह रहे हैं बच्चे नहीं करेंगे जैसी स्थिति और यह जो मानसिकता है विवाह नहीं करेंगे इस तरह की जो स्थितियां है वो पैदा नहीं होंगी और हिंदू जो समाज है हिंदू जो राष्ट्र है वो उसी रूप में बना रहेगा ऐसा मेरा मानना है बहुत-बहुत धन्यवाद
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😲 अपना Point साबित के लिए इतने कुतर्कआइये कुछ Cross Questions करें।
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मैं ये पूछना चाहती हूं जो ये भी पौराणिक जो ये कहते हैं कि महिलाओं को वेद पढ़ने का अधिकार नहीं है तो मुझे बता दो क्या तुम्हारे घर में सरस्...
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