यहां उपस्थित सभी श्रोता गण सभी वक्ताओं को नमन करती हूं और आज मेरा परम सौभाग्य है कि मुझे इस मंच को संचालन करने का मौका मिला है तो मैं बहुत खुश महसूस कर रही हूं तो आज का हमारा विषय है महिला सशक्तीकरण तो पहला प्रश्न मेरा आप सभी से है कि महिला सशक्तीकरण क्या है और उसकी आवश्यकता ही क्यों पड़ी तो एक एक मिनट आप सभी के पास है इस विषय के जैसे की इसका नाम है महिला सशक्तिकरण शक्ति के साथ महिला का अवतरण होना तो शक्ति कई प्रकार की है महिला अनेक रूपों में दिखाई देती है वो एक बालिका है तो कैसी होनी चाहिए उसके पास शक्तिया क्या होनी चाहिए वो युवती है तो उसके पास क्या शक्तिया होनी चाहिए और वो जब गृहस्थ में जा रही है पत्नी के रूप में है तो उसके पास क्या शक्तिया हो और एक मा के रूप में क्या शक्तिया हो राष्ट्र संचालन कर रही है तो क्या शक्तिया हो समाज को देख रही है तो क्या शक्तिया हो ये महिला सशक्तिकरण है ये तथा फेमिनिज का रूपांतरण नहीं है यह हमारा भारतीय सशक्तिकरण है जैसे की आपने अभी कहा शरण की आवश्यकता क्या आवश्यकता का मुख्य कारण जहां तक मुझे लगता है वो ये है प्राचीन काल से लेकर के जैसे जैसे देश की परिस्थितियां बदलती चली गई उन बदलती परिस्थितियों में कहीं ना कहीं महिलाओ को अपनी स्थिति या अपनी अवस्था को खोजना महिला अपने आप इस समय कहा पाती है उस चीज में अपने आप को ढूंढते हुए जब वो अपना स्थान देखती है उस अपने स्थान बनाने की दिशा में हमें महिला सशक्तीकरण की आवश्यकता पड़े तो किस दिशा में बन रहा है बन भी रहा है या नहीं बन रहा है वो अलग बात है लेकिन महिलाए भारतीय समाज का या राष्ट्र का या परिवार का निर्माण करने में कहा तक योगदान दे रही है इस स्थिति को स्पष्ट करने के लिए महिला सशक्तिकरण की आवश्यकता पड़े बिल्कुल बहुत अच्छा कल्पना बताया आपका प्रश्न बिल्कुल महत्त्वपूर्ण है कि पहली बात तो सशक्तीकरण है क्या और उसकी आवश्यकता क्या है हमने देखा समाज में एक समय जब ऐसा आया अभी तो किसी भी हम साहित्य की बात करें अवा किसी भी अन्य समाज की बात करें तो वहां आवश्यकता होती है कि नारी वहां प किस भूमिका में है किसी भी समाज को देखने का जो एक दर्पण ऐसा कहा जाता है कि वहां की नारी की स्थिति क्या है तो उससे उस समाज का एक पैमाना तय किया जाता है और जब हम कहते हैं कितनी भी बातें कर ले हम कितनी भी व्यवस्थाएं बना ले लेकिन नारी उस समाज का मूल होती है और सशक्तिकरण की आवश्यकता है जब तक जड़ मजबूत नहीं होगी तब तक उस समाज को कि क्या दिशा मिलेगी ये हम नहीं जान सकते और वो जड़ मजबूत किस रूप में हो सकते है जैसा अभी कल्पना जी ने बताया कि बहुत सारे अलग अलग वहां पे मत आते हैं कि किस किस क्षेत्र में वो मजबूत है और सशक्तिकरण जो शब्द सामान्य भाषा में प्रयोग किया जाता है तो उसको एक सामाजिक रूप से वो कितनी दृढ़ है और शारीरिक रूप से कितनी द है उसको कितने अधिकार समाज में मिले है जो आज के लिए भी बहुत ज्यादा आवश्यक है उस से इतर वेने हम क्या अधिकार दिए दयानंद ने क्या बात की है अधिकार की तो वो सब देखना सरण का अभिप्राय [प्रशंसा] हो आपने प्रश् पूछ सक्ता क प तो मुझे लगता है कि हमारे समाज में सनातन में एक पंक्ति कही जाती है माता निर्माता भवती माता निर्माता होती है और जो निर्माण करने वाला है ब्रह्मा जी के बाद अगर किसी को सृजन का कार्य दिया गया वो माता को दिया गया है तो जो निर्माण करने वाला है अगर स्वयं सशक्त होगा तभी तो सशक्त राष्ट्र का निर्माण कर पाएगा सशक्त समाज का निर्माण कर पाएगा सशक्त परिवार का निर्माण कर पाएगा इसीलिए सशक्तिकरण की आवश्यकता है नेपोलियन बोनापार्ट ने कहा था आप मुझे 6 हज माताए दे दीजिए मैं आपको एक अच्छा राष्ट्र दे दूंगा अभिप्राय ये है कि जिसको राष्ट्र को बनाना है आपको संबोधित किया जाता है मातृ शक्ति कह कर के पितृ शक्ति हमने कभी नहीं सुना लेकिन मातृ शक्ति कहा गया है तो माता निर्माता है अगर निर्माण करने वाली जो है वो सही दिशा में चलेगी तो परिवार समाज और राष्ट्र तीनों सही दिशा में चलेंगे इसीलिए सशक्तिकरण की आवश्यकता है सबसे पहले तो नमस्ते सभी को और मुस्कान जी ने कहा कि सशक्तिकरण की जरूरत क्यों पड़ी माताएं बहने पहले सेही सशक्त थी एक ऐसा काल आया था मध्य काल बीच में जहां महिलाओं को नीचा दिखाया गया उनको पैर की जूती समझा गया जब मोहम्मद गजनबी इस देश में आया था तो एक तरफ से उसने मंदिरों को लूटना शुरू करा और वो जा पहुंचा यहां अपने सि सोमनाथ के मंदिर में सोमनाथ के मंदिर में उसने बहुत सोना चांदी गिरे मान के सब लूटे और वहां से निकलता हुआ वो जब जा रहा था अपने देश को वापस तो इतनी लूट के बाद उसने यहां की माताओं बहनों और बेटियों को देखा जब उसकी नजर इन पर पड़ी धन दौलत की जो उसने लूट गई थी वो सबको समझ आई सामाजिक जो लूट होती है वो समझ आती है सामरिक लूट समझ आती है संपत्ति की लूट समझ आती है लेकिन एक लूट और करी उसने एक जो लूट थी वो सांस्कृतिक लूट थी जो करी उसने जब मोहम्मद गजनबी इस देश से गया तो अपने वो ऊंट खचर के पीछे हमारी माता बहनों ललना को इस देश की ललना को खींचते हुए घसीटते हुए यहां से लेकर गया और लेकर गया कहां अपने अरब के बाजारों में और अपनी माता बहनों को वहां बेचा गया दोदो दिनार में और उसने क्या नारे लगाए दुख कर हिंदुस्तान दोदो दिनार तो एक जो ये मध्य काल जब मुगल आए मुगल आए यहां पे ये अंग्रेज आए यहां पे ये जो काल था जहां पे महिलाओं को नीचा समझा गया छोटा समझा गया और अब वो बढ़ता बढ़ता ऐसा हो गया था कि बिल्कुल ही खत्म हो गई थी माताओं की पहचान बहनों की पहचान और दूसरी कम्युनिटीज में तो ये भी कहा जाता है कि ये एक पसली है हमा ये कोई इसमें कोई अलग से आत्मा नहीं है ये एक पसली है हमसे निकली हुई ऐसे भी कहा जाता है और उसके बाद सशक्तिकरण की बात हुई फेमिनिज्म की बात हुई जो फेमिनिज्म जो शब्द जो यूज किया जाता है वो 1930 में निकाला गया था वो इक्वलिटी के लिए निकाला गया था कि इक्वलिटी हो क्योंकि उस समय पर बिल्कुल इक्वलिटी थी ही नहीं मतलब बिल्कुल खत्म हो चुका था सब कुछ कुछ ना वोट देने के अधिकार है ना एजुकेशन का अधिकार है किसी चीज का अधिकार नहीं है उस समय पर ये फेमिनिज्म शब्द निकला था और ये ग्रीक के एक लेक्चरर ने यूज किया था अपने भाषण में इक्वलिटी को यूज करते हुए न आज जो फेमिनिज्म का हम अर्थ देखते हैं जो फेमिनिज्म से आप मतलब देखते हैं वो तो हम सभी जानते हैं कि अगर लड़की थप्पड़ भी मार रही है तो उसम भी ये फेमिनिज्म का एक वो दिख जाता है कि फ्रीडम फेमिनिज्म इक्वलिटी इक्वलिटी तो अलग-अलग क्षेत्र में चाहिए लड़कियों को अगर उनको कहा जाएगा कि तुम्हें नहीं छोटे कपड़े पहने तो क्यों नहीं पहनने हमें छोटे कपड़े ये भी तो पहनते हैंकर ये भी तो करते हैं तो इक्वलिटी वहां चाहिए हमें भी दारू पीनी हमें भी सिगरेट पीनी हमें भी छोटे कपड़े पहने लेकिन इक्वलिटी वहां नहीं मानती है जब एक पंडित अपने कथा से कहता है कि तुम्हें यजो पवित्र ने का अधिकार नहीं है तुम्हें गायत्री मंत्र पढ़ने का अधिकार नहीं जब इक्वलिटी नहीं मांगती अरे अरे आपने कह दिया चलो अच्छा है आपने कह दिया ये यहां इक्वलिटी नहीं दिखाई देती इक्वलिटी वहां दिखाई देती है ये फेमिनिज्म वहां दिखाई देता है तो जैसे आयुष जी ने बताया ये नारी शश सबने अच्छे से बताया तो मुझे लगता है नारी को सशक्त होने के जरूरत न सही दिशा में एक मात्र निषा एक शब्द है जो वेद में कहा जाता है जो माता माने वाली हो जो मांझे अपनी संतान को मांझे और मांजने का अर्थ य अपनी बेटी को था मतलब उसको अपनी बेटी को सशक्त करना था वहा माता मांझा करती थी बेटियों को तो मुझे लगता है कि माता को निर्माता ही बना पड़ेगा वापस से क्योंकि आज हम माता को देख रहे हैं क्या हालत है माता की तो माता को वापस से निर्माता बनेगा तभी ये समाज बढ़ पाएगा तभी ये समाज चल पाएगा क्या आप सब एक दूसरे से सहमत है और वास्तव में इसको महिला सशक्तिकरण मानते हैं अभी सबने बड़ी सुंदर सशक्तिकरण की परिभाषा बताई और फेमिनिज्म की बात हुई बहुत सारे शब्दों का हम प्रयोग करते हैं पर वो वास्तविकता में अपना अर्थ खो बैठे हैं जी सभी का एक मत यही है कि माता निर्माता है और ऋषि दर जब सत्या प्रकाश के द्वितीय समुल्लास का प्रारंभ करते हैं तो शप ब्राह्मण में एक पंक्ति देते हैं मातृ मान पितृ मान आचार्य मान पुरुषो वेदा और मातृ मान उसको नहीं कहा गया जिसकी मा है वही मातृ मान है उन्होंने कहा प्रशस्ता धार्मिक विदुष माता यस विद्यते स मातृ मान जिसकी मा प्रशस्ता है धार्मिक है विदुषी है उसको मातृ मान कहा गया तो अगर मां एक उत्तम होगी तो संतान भी उत्तम होगी ये स्वाभाविक है और वीर शिवाजी को छत्रपति शिवाजी बनाने वाली जीजाबाई थी ये हम सभी जानते हैं तो सशक्तिकरण सही अर्थों में जैसे बहन मीनाक्षी जी ने कहा था कि सही दिशा में हमको समानता का अधिकार चाहिए लेकिन कहां चाहिए अभी नारे लगाने है तो बड़ नारे लगाएंगे और जैसे ही दो डंडे लगे तो सशक्तिकरण गया भाड़ में बराबरी गई भाड़ में नारी शक्ति को मार दिया हम तुरंत भूल जाते हैं अरे बराबरी वहां भी तो करो अगर नारे लगाने में बराबरी चाहिए तो आपको मार् खाने में भी तो बराबरी मिलेगी अगर कोई दंड मिल रहा है उससे भी बराबरी मिलेगी हम बराबरी अपनी सहूलियत के हिसाब से चाहते हैं वैसे बराबरी चाहिए लेकिन स्कूटी खराब हो जाएगी तो तुरंत घर फोन करेंगे भाई स्कूटी खराब हो गई हस्बैंड को फोन करेंगे पिता को फोन करेंगे क्यों भाई कहां गई आपकी बराबरी कभी आपने सुना कि पति ने फोन किया हो आइए जरा मेरी बाइक खराब हो गई मेरी गाड़ी खराब हो गई तो बराबरी अपने हिसाब से जैसे हमारे यहां एक मिनट और लूंगी फ्रीडम ऑफ स्पीच है जैसे अपने हिसाब से हम उसको देखते हैं कैसे हमको चलना है जैसे महाभारत का उदाहरण उठ कण है रत का पया धस गया तो क्या कहता है तीर मत मारो क्यों क्योंकि अधर्म हो जाएगा तो कृष्ण जी कहते हैं आई तो तन याद धर्म की अंत समय में आई अगर याद पहले आ जाती तो होती नहीं लड़ाई अर्थात जब भरी सभा में एक महिला का अपमान कर रहे थे तब तुम्हारा धर्म कहा गया था जब सारे मिलकर के पांडवों को फसा रहे थे तब तुम्हारा धर्म कहां गया था जब नौ लोग मिलकर के अकेले अभिमन्यु को लिए त तुम्हारा धर्म कहा गया तो फ्रीडम ऑफ स्पीच बराबरी का अधिकार नारी सशक्तिकरण यह शब्द हम वहा यूज करते जहा हमको अपना लाभ दिखता है तो लाभ ना देखे बराबरी चाहिए तो हर क्षेत्र में बराबरी करे वो आवश्यक है सबने बहुत सुंदर परिभाषा की और हम सबसे सहमत है आपस सत तो आयुष दीदी ने बहुत ही अच्छे से परिभाषित किया तो य पर वही बात आती है कि जब इक्वलिटी की बात आती है तो महिलाए बोलती है हमें पुरुषों जैसा अधिकार चाहिए और दूसरी तरफ फेमिनिज वाली बात भी आ जाती है तो इस पर आपका क्या पॉइंट ऑफ व्यू है सुमे जी आप बताइए बिल्कुल आपका प्रश्न सही है कि हम पुरुषों जैसा अधिकार चाहते है जैसा अभ ने बताया कि हम सहूलियत के हिसाब से देख रहे हैं अभ मिनाक्षी जी ने बोला एक समय था जब जैसा हमने वेद की बात की तो वेद में सारी चीज जब ब्रह्मचर्य सक्त बात करता है तो वो वेदा जयन की भी बात करता है और उपनयन की भी बात करता है और जैसा अी कहा मातन पमान आचार्य मान पुरुष वे तो मातमा शब्द जब स्वयं में इतना सशक्त है उस मातमा शब्द में आप समझिए कि आप वेदा अध्ययन करा रहे हैं पुरुषों को बालको को बहुत से ऐसे गुरुकुल है और इस मंच प मैं कहना चाहती हूं कि कन्या गुरुकुल जो है वो केवल आ समाज के है वो अन्य जो पौरा गुरु है वो नहीं होते तो वहां प जो वो कहते हैं वेदा का अधिकार है जितने भी संस्कार होते हैं वो बालको के हो सकते हैं बेटियों के संस्कारों की कहीं बात ही नहीं कही है तो आप मानिए कि जब वो बात करते हैं कि वो माता जो निर्माता है जैसे कोई इंजीनियर होता है एक बहुत से हम एक कथा सुनते हैं कि एक पृष्ठ पर आगे भारत का नक्शा था और दूसरे पृष्ठ पर पीछे एक मनुष्य बना हुआ था वो पजल गेम जैसा था तो किसी ने कहा कि भाई भारत का नक्शा तो बन ही नहीं रहा बहुत मुश्किल है इसको कैसे जोड़ा जाए तो उसको बताया गया कि इसके पीछे एक मनुष्य का नक्शा बना हुआ है मनुष्य का चित्र बना हुआ है उस मनुष्य के चित्र को जोड़ दो तो भारत का चित्र स्वयं निर्मित हो जाएगा तो ये राष् के निर्माण की ये प्रक्रिया है तो वो माता वो इंजीनियर जिसके हाथ में मनुष्य का निर्माण है चरित्र का निर्माण है उस माता को संस्कारित ना किया जाए तो ये तो कोई बात ही नहीं हुई ना तो सबसे पहले माता के संस्कार की बच्चों के बच्चियों के संस्कारों की बात की गई होगी कि उसको आप जैसा बढ़ होगे अगर आप ये बहुत तथ वाली बात है अगर आप चाहते हो राम और कृष्ण पैदा हो तो आपको पहले देवती और कौशल्या ऋसी माताए पैदा करनी होंगी तो वो संस्कारों से ही होंगी तो जब बात करते हैं कि पुरुषों जितने संस्कारों की क्या आवश्यकता है या पुरुषों जितनी बराबरी क्यों चाहिए तो बिल्कुल बात है कि पुरुषों जितनी बराबरी हर क्षेत्र में चाहिए जैसा अभी आयुष ने कहा कि भाई हम सशक्त है और कहीं आवश्यकता है तो अभी साहित्य में बहुत सारी चीजें हम लोग पढ़ते हैं मींस वगैरह भी होते हैं कहते हैं कि कोई स्त्री यदि बने तो ऐसी प्रेमिका बने ऐसी पत्नी बने कि वो पुरुष को अपना कंधा दे सके रोने के लिए तो उनको भी बराबरी मिलनी चाहिए कि आप रो मत कहिए कि पुरुष को दर्द नहीं होता उसको रोने का अधिकार दो और अपने आपको को इतना सशक्त होने का अधिकार दो कि आपको छोटी-छोटी चीजों में उसकी आवश्यकता ना पड़े अपने भाई की अपने पति की आवश्यकता ना पड़े तो इस रूप में बराबरी होगी तो अच्छी बात है अन्यथा क सहूलियत वाली करेंगे तो वो तो फिर ब पाक हो जाएगा बहुत अच्छा उतर दिया दीदी आपने अब जो मेरा अगला प्रश्न है वो कल्पना जी से है कि अभी बात की कि संस्कारों की की जो हमारी माताएं होती है वह हमारी निर्माता होती है तो इससे रिलेटेड एक प्रश्न है वो यह है कि बहुत सारे हम देखते हैं कि हमें संस्कार देने है सारी चीज देनी है तो क्या वास्तव में आज जो हमारा देश पाश्चात्य संस्क कृति को अपना रहा है तो उसको देख कर के क्या लगता है कि हमें किस प्रकार से लोगों को संस्कार देने चाहिए या क्या चीजें बदलाव की है सबसे पहला तो संस्कार जो देने का कार्य है वो मां का कार्य है लेकिन कहीं पर भी ये नहीं लिखा गया है कि केवल मां का कार्य है जी इसमें अंतर है एक तो मां का कार्य है और दूसरे का केवल मां का कार्य है नहीं पूरा परिवार पूरा समाज जितने भी बंधु जुड़े हुए हैं सब रिश्तेदार संस्कार सबसे मिलकर बनते हैं कोई भी बच्चे का निर्माण सबसे मिलकर के होता है और आज जो इक्वल इक्वल की बात हो रही है यह शब्द ही बाहर का है यह भारत का है ही नहीं भारत में संतुलन की बात है संतुलन कैसे होगा बोले जब आपका लक्ष्य होगा अब लक्ष्य क्या है लक्ष्य के हिसाब से संतुलन होगा ना जी कार्य का बंटवारा तो लक्ष्य के हिसाब से होगा हम केवल कार्य का बंटवारा कर कोई लक्ष्य ना हो तो भी हर किसी को अपना कार्य बोझ लगेगा तो सबसे पहला तो लक्ष्य निर्धारित होता है क्या निर्धारित होता है भाई सबसे पहले जब गृहस्थ में जा रहे होते हैं उन्हीं कोही कहा जाता है कि मम तेते हृदयम धाम मम चितम अनु चितम ते अस्तु दोनों तरह से कहा जाता है पति भी यही कह रहा होता है और पत्नी भी यही कह रही होती है कि आज से जो मेरे संकल्प है जो मेरा लक्ष्य है ना वो आज से आपका है और पत्नी भी यही कह रही होती है जो मेरा लक्ष्य है ना आज से वो आपका है मतलब दोनों का लक्ष्य एक हो गया है अब अब जब दोनों का लक्ष्य एक हो गया है तो परिवार का लक्ष्य एक आराम से हो जाएगा जी अ से परिवार तो जाएगा नहीं तो जो ये कहा जाता है कि महिला बराबरी बराबरी नहीं है कोई भी बराबर नहीं होता है हर किसी के पास अपना अपना सामर्थ्य है बस हर कोई समाज को चलाने का जिसका लक्ष्य है समाज चलाने के लिए वो अपना 100% सामर्थ्य लगाता है 100% सामर्थ्य राष्ट्र को ल चलाने में लगाया जाता है और 100% सामर्थ्य परिवार को चलाने में लगाया जाता है 100% सामर्थ्य हर किसी का अपने बच्चे के निर्माण में लगाया जाता है अगर हम ये कहे एक का दायित्व है एक का नहीं है या दोनों का बराबर है बराबर कभी हो ही नहीं सकता कभी नहीं हो सकता इसीलिए हमेशा हमारे यहां ऋषि मुनियों ने कहा कि अगर कन्या है ना उन्होंने कहा बोले कन्या निरुक्त का कहते कन्या क्या हो बोले कन्या कनीन के रक्षण कन्या की इस आंख की पुतली की तरह रक्षा करनी चाहिए क्यों कहा वो लोग पागल तो थे नहीं बुद्धि तो उनके पास भी थी उन्होंने बालक को तो नहीं कहा लेकिन कन्या की उत्पत्ति करते हुए जब यासक महर्षि इतने ऊचे विद्वान कह रहे हैं ऋषि कह रहे हैं कि कन्या की इस आंख की पुतली की तरह रक्षा करनी चाहिए तो कोई बात होगी एक बहुत अच्छी बात आती है जब हम व्याकरण भी पढ़ते हैं उसम य आता है कि आप ऋषियों की बात कही हुई को उह करिए सब कुछ करिए लेकिन बाद में आपको समझ में आएगा कि कहीं ना कहीं अच्छा कह रहे थे वो ठीक कह रहे थे क्योंकि उनके कुछ अनुभव रहे होंगे उन्होंने कुछ रिसर्च किया होगा दूसरा ये है कि आज जो है संस्कार देने की बात है तो सबका ही उत्तरदायित्व है कोई भी एक नहीं कर सकता सबके बराबर है सबको लेना पड़ेगा अपना अपना उत्तरदायित्व लेना होगा और जब लेते हैं सब अपना समझते हैं ये काम मेरा है तो बस मेरा है तो मेरा है चल पड़ता है वो चाहे एक सामान्य गृहस्थ चलाना हो या फिर समाज चलाना या राष्ट्र या पूरा संसार चलाना हो मुझे करना है तो करना है तो उसम ना किसी से शिकायत ना किसी से शिकवा कुछ नहीं होता और ये जो हम बारबार ये कहते है ना कि महिला का उत्थान होना चाहिए महिला का उत्थान होना चाहिए हमें लगता है कि भारतीय परिप्रेक्ष्य में उत्थान शब्द ना कह करके हमें ये कहना चाहिए उसको उत्तरदायित्व बोध कराना चाहिए और केवल महिला नहीं सबके लिए उत्तरदायित्व का बोध होना चाहिए हर कोई पदे पदे कभी हम बच्चे होते हैं हम स्टूडेंट होते हैं तो स्टूडेंट का क्या दायित्व है क्या करना चाहिए जब हम और बड़े हो जाते हैं तो हमारा क्या दायित्व है उसका बोध होना चाहिए और उसका बोध महा श्री दयानंद ने जब कहा था कि आप वेदों की ओर लौट तो वेदों की ओर लौटने का मतलब यही था कि जब वेदों में सारी शिक्षाएं दी गई है तो वेदों से ही आप प्राण लेंगे ना जीवन वही से लेंगे तो वहां पर कितने सुंदर सुंदर मंत्र है कितने सुंदर मंत्र है जो केवल बच्चे के लिए नहीं है जो केवल बालक के लिए नहीं है बालिका के लिए भी पूरे वही मंत्र है कि आप विदुषी बनाइए अपनी बच्ची को बच्ची अगर विदुषी है तो वो आचार्य के गुरुकुल में पढ़े गी बहुत सुंदर शब्द है अगर हम ये कहना चाहते हैं कि आचार्य की पत्नी तो उसके लिए शब्द आ बोले उसके लिए जो प्रत्यय आप करेंगे वो है आचार यानी आचार्य की अगर पत्नी है तो आचार यानी कही जाएगी अगर स्वतंत्र आचार्य है अगर वो स्वतंत्र अपना गुरुकुल चलाती है छात्राओं को उपदेश कर रही है तो उसको हम आचार्या कहते हैं तो इस तरह से हर शब्द डिवाइड है मतलब हर शब्द ही अपने पीछे कहानी लिए कन्या क्या है कनु दत धातु से बनता है जो दीप्तिमान है कां मान है जिसकी बहुत सुंदर कांति है उसके गुणों की चर्चा है उसके स्वरूप की चर्चा है वो कन्या है अभी प्रशस्ता शब्द आता है तो वो आता है ससु स्तुत अर्थात जिसकी स्तुति की जा सके जिसकी प्रशंसा की जा सके जिसको कुछ कहा जा सके और मनते माता जिसका मान किया जा सके वो माता है पत्नी क्या है जो पालन करने वाली है और जिसका पालन जो पालन करने योग्य है और जो पालन कर सकती है वो दोनों तरह पत्नी है तो बहुत सारे शब्द बहुत मंत्र है जो कि बराबर नहीं है अ इस बात समझ लीजिए हम बराबरी की बात बिल्कुल नहीं क रहे हम तो 100 पर की बात कह रहे हैं अगर कहीं महिला कार्य कर रही है तो व 100% है कहीं पुरुष कार्य कर रहा है तो व 100% है बराबरी में तो हम उसको कम कर देंगे % हमने निकाल दिया उसके जीवन से अभी आपने बात की लक्ष निर्धारित करने की कि अगर हमें बच्चे को संस्कार देना है उसको आगे बढ़ाना है तो लक्ष्य निर्धारित करना पड़ेगा पर आजकल हम देखते हैं तो लोगों के लक्ष्य ही अलग-अलग है कि हमें बच्चे को फैशन मॉडल बनाना है हमें बच्चे को फिल्मों में भेजना है हमें बच्चे से यह काम नहीं कराना है मेरी बेटी की ड्रेस ऐसी होनी चाहिए तो इस प्रकार के मतलब बहुत सारे चेंजेज आ रहे है तो उनका उनका जो ग्रोथ है वो उस हिसाब से नहीं हो रहा जिस हिसाब से होना जैसे हमारे वैदिक कल्चर में हुआ करता था तो इस पर श्रद्धा जी मैं आपसे पूछना चाहती हूं कि वो निर्माण कैसे होगा जो हम एक्चुअल में चाहते जो हमारे भारतीय संस्कृति के अकॉर्डिंग होना चाहिए देखिए आपका प्रश्न मैं थोड़ा पूर्व से लेके चलूंगी मतलब प्रारंभ से लेकर के चलूंगी प्रारंभ यहा से की भारत क्या है हमें सबसे पहले य समझना पड़ेगा हमें अपनी बुद्धि जो हमारी मनीशा है उसम य बात अच्छे से स्थिर करनी पड़ेगी कि इस धारा पर भारत उसके मौलिक नियम क्या है भारत का मूल नैतिकता क्या है और जो इस पृथ्वी पर अन्य देश है वो भारत जैसे नहीं है ये बात हमें ये दो अलग अलग बातें नहीं है एक ही बात है कि भारत अन्य देशों जैसा नहीं है जितने भी देश है उनके जो मौलिक नियम है नैतिकता है वो बिल्कुल अलग है और भारत की जो मौलिकता है वो बिल्कुल अलग है आप प्रश्न का उत्तर इसी में मिलेगा यदि हम भारत के मूल को देखेंगे हमारा जो सिस्टम है भारत की जो व्यवस्था है वो हमारे ऋषियों मुनियों ने बहुत सोच समझ के विचार के पढ़ कर के उन चीजों पर गंभीर अध्ययन करने के बाद निर्माण की है हम पशुओं की समझ में की तरफ बे बढ़े नहीं है हम समाज में रहने वाले मनुष्य है और उस समाज को विधि विधान से बनाया गया है जैसे व्यक्तिगत रूप से देखे तो मनुष्य की आयु को चार भागों में बांट करके ब्रह्मचर्य गह वान सन्यास चार आश्रमों में बांट दिया और यदि समाज की दृष्टि से देखेंगे तो समाज को भी चार वर्गों में बांट दिया वो ब्राह्मण क्षत्रिय वैश सूत्र वो यहां पर चर्चा का विषय नहीं है तो ये जो वर्ण और आश्रम में बटा हुआ समाज है इसको बाटने के पीछे बहुत बड़ा वैज्ञानिक कारण था हमारे ब्रह्मा से लेकर के महर्षी दयानंद तक जितने भी महापुरुष हुए हैं ऋषि हुए हैं मुनि हुए हैं जिन्होंने इस विषय पर चिंतन किया है समय समय पर आ कर के लोगों को जागृत किया है जो अभी ये शब्द बताया है कि हमें जगाना है कर्तव्य बोध कराना है जागृत किया है उस जागरण में ही छिपा हुआ है कि हम उन संस्कारों को कैसे डाले अब विषय जिस क्रम में चल रहा है हम महिला शक्ति प आ जाते हैं एक जो महिला शक्ति है महर्षि दयानंद ने बहुत सारे जो शास्त्र है ग्रंथ है पुस्तक ऐसी लिखी है जिसमें वो नियम से बताते हैं कि वो संस्कार किस तरह से बालक में डाले जाए महर्षि रयान सरस्वती जी का सबसे बड़ा जो हमारे लिए योगदान रहा वो ये रहा वो शिक्षा की प्रबल समर्थक थे सत्या प्रकाश जो कि उनके द्वारा लिखित बहुत सर्वोत्तम पुस्तक है सत्या प्रकाश में वो बहुत सी ऐसी बातें लिखते हैं स्पष्ट रूप से लिखते हैं वैसे तो जितने भी ऋषि मुनि है अपनी बातो को सूद रूप में कहते हैं लेकिन सूद रूप में कही हुई बातो से हमें अर्थ निकालना होता है महर्ष दयानंद में जिन विषयों को प्रबलता से कहना चाहते उनको पुनः पुन लिखा है हर स्थान पर उन्होंने लिखा है बालक बालिका की शिक्षा हो माता पिता संस्कारित करे माता पिता बच्चों को विद्या शिक्षा गुण स्वभाव स्वरूप शरीर आत्मा से संस्कारवान युक्त करे द्वितीय तृतीय समुला में ये विषय विस्तृत रूप से आता है तो यदि संस्कारों की बात चलती है तो हमारे यहां पर सरस संस्कार है 16 संस्कार है मुख्य रूप से जब एक माता गर्भ धारण करती है उस गर्भ में जो शिशु पल रहा है उस माता के द्वारा उन पिता के द्वारा और जिस परिवार में व बालक आने वाला है उस पूरे परिवार के द्वारा उस गर्भस्थ शिशु के और माता के तीन संस्कार किए जाते हैं जिसम सर्वप्रथम पहला संस्कार होता है गर्भाधान संस्कार दूसरा संस्कार होता है पुंसवन संस्कार तीसरा संस्कार होता है सीम संस्कार गन संस्कार की जो गर्भ है जो धारण किया है या किया जा रहा है वो स्थिर हो करर के धारण पहले तीन महीनों में होता है फिर है पु संस्कार जो माता है वो अपने शरीर का ध्यान रखे विशेष रूप से परिवार उ से प्रसन्न रखे संतुष्ट रखे उसके लिए जो भी अच्छी चीज है उनकी व्यवस्था कर सके और तीसरा जो संस्कार है जो पांचवे महीने से छ सात आठ में किया जाता है यज इत्यादि के द्वारा मंत्र पाठ के द्वारा तो उसम बच्चे का मस्तिष्क जो है वो अच्छे से बढ़ सके तो संस्कार गर्भ से प्रारंभ होते है कोई भी भूमि में अगर हम बीज बोते तो ऐसे ही नहीं फेंक देते उसे व्यवस्थित तरीके से भूमिका जैसे निर्माण किया जाता है उसी तरह से एक पुण्य आत्मा का अपने शरीर में आवान किया जाता है कि मैं एक ऐसी आत्मा का अपने शरीर में आवान करता हूं मैं एक ऐसी पुण्य आत्मा को अपने शरीर में बुलाना चाहती हूं जो इस समाज को परिवार को देश को नहीं दिशा दे सके और ये संस्कार होने के बाद क्रम से जब बच्चा जन्म ले लेता है घर से पहली बार बाहर निकलता है जात कर्म आप इसे किस नाम से बुलाएंगे नामकरण भेदन और चूड़ा कर्म उसके बाल भी हटवाए जाते हैं जन्म के बाल तो इस तरह से चूड़ा कर्म उपनयन वेदार और फिर विद्या पूरी होने के बाद समावर्तन समावर्तन हो जाएगा समावर्तन पर चिंतन मेरा है मैं उसे भी आपके समक्ष बाद में रखूंगी उसके बाद विवाह संस्कार होता है विवाह के बाद वा सन्यास और अंत संस्कार हमारे य शरीर का भी संस्कार किया जाता है तो संस्कारों की इस परंपरा को जब हम देखते है संस्कार कैसे देने चाहिए तो संस्कार गर्भ से ही देना प्रारंभ हो जाता है जब बालक मां के गर्भ में होता है तभी हमें इस तरह का वातावरण अपने चारों तरफ बनाना चाहिए क्योंकि आज का जो ये सशक्तिकरण का विषय चल रहा है महर्षि दयानंद महिलाओं का जो वास्तविक सशक्तिकरण मानते थे वो मातृत्व में ही मानते थे क्योंकि उन्होंने सत्या प्रकाश के द्वितीय सब उल्लास के प्रथम पैराग्राफ में वो लिखते हैं माता जितना बच्चे का कल्याण कर सकती है माता जितना बच्चे का उपकार कर सकती है मातृ देवो भव कि माता सबसे प्रथम माता को रखा जितने भी देव है उसम सर्वप्रथम माता है क्योंकि माता बच्चे के उतने ही निकट रहती है आप सबने देखा होगा मां बच्चे को जिन इमोशन से बड़ा करती है बच्चा उसी स्वभाव को लेकर के बड़ा होता है तो यदि बच्चे में बच्चे को संस्कारित करने की बात है तो उसम हमें सर्व प्रथम यही ध्यान देने की बात है कि हम प्रारंभ से उसके लिए वो वातावरण तैयार करे प्रारंभ से ही उसके लिए वो एक तरह से पूरी दिशाए तैयार करें जिससे वो इस समाज को राष्ट्र को नई दिशा दे सके तो महर्षि दयानंद ने इस विषय पर बहुत विशेष रूप से प्रभाव प्रकाश डाला है और बालिकाओं की कन्याओं की पाठशाला खुलवाना हो चाहे उसमें फिर विधवा विवाह का समर्थन करना हो चाहे उसमें फिर सती प्रथा का विरोध करना हो और चाहे उसमें लड़कियों को सभी तरह की कलाओं को सीखना हो तो महर्षि दयानंद की दृष्टि से तो यही संस्कार है यही सशक्तीकरण है कि आप हर दिशा में हर प्रकार से आगे बढ़े ऐसा स्वामी दयानंद भी मानते हैं और ऐसा मैं मानती हूं इ आपने अभी संस्कारों की बात की तो बच्चों के लिए तो चाहे वह लड़की हो लड़का हो सबके सामान्य है कि एंड तक उनके सारे संस्कार सेम है बट एट द एंड जब बात आती है तो हम बहुत सारे कथा वाच कों से सुनते हैं कि नारियों को यजो पवित धारण नहीं करना चाहिए नारियों को गायत्री मंत्र नहीं करना चाहिए तो मीनाक्षी जी मैं आपसे पूछना चाहूंगी मुस्कान जी का ये प्रश्न पूछने का एक और उद्देश्य है मुझसे क्योंकि इसपे मेरी बड़ी कंट्रोवर्सी हुई थी यज्ज पवित संस्कार प क्योंकि मैं ी परिवार से आती हूं मैं सच बताऊं तो मैं पौराणिक परिवार से आती हूं और मेरे फैमिली पूरी कृष्ण डिवटी है और मेरा जो ये टर्निंग पॉइंट था लाइफ का ये यूनिवर्सिटी ऑफ पतंजलि में जाने से ही हुआ है वहां से मैं वैदिक सिद्धांतों को जानना शुरू हुई और मुझे सात से आठ महीने लगभग हुए होंगे आर्य समाज के सिद्धांतों को जानते हुए बस ज्यादा नहीं किंतु मैं ऐसे परिवार से आती हूं और मैं एक छोटी सी घटना बताती हूं आपको क्योंकि बहुत माहौल गंभीर हो चुका है एकदम मैं बताती हूं कि मेरे अभी लक्ष्मी पूजा ई थी मेरे घर में और मम्मी लक्ष्मी जी लेकर आई और हमारे घर में लड्डू गोपाल है तो मेरी माता कहती है कि लक्ष्मी जी ना नीरो तुम्हें देख के हंस रही है मैंने कहा अच्छा मैंने कहा हां हंस रही है मम्मी हंस रही है फिर थोड़ी देर बाद बोल दिया ये लड्डू गोपाल तुम्हारी तरफ देख रहे हैं मैंने कहा मम्मी वो केवल एक मूर्ति है ऐसा नहीं होता है तो तुम नास्तिक हो गई ग हो तुम नास्तिक हो गई हो पता नहीं कौन सा तुम पर प्रभाव पड़ रहा है कहां से तुम यह सब संस्कार ले रही हो तुम नास्तिक हो गई हो तो ये यूनिवर्सिटी ऑफ पतंजलि में जब मैं गई तो य वेद आरंभ से पहले यजो पवित्र होता है तो वहां शुरुआत करने से पहले यज्ज पवित्र संस्कारों सबका हो रहा था मैंने भी वो यजो पवित संस्कार लिया सब कुछ समझकर ध्यान में रखकर परिवार से पूछा मना कर दिया मैंने कहा मैं फिर भी लूंगी तो यजो पवित संस्कार लिया और वो वीडियो मैंने अपने का बहुत विरोध हुआ बहुत गालियां पड़ी मुझे कि ये नारी होकर कैसे फैला रही है ये क्या समाज को दिशा देगी ये कैसी है ये बहुत विरोध हुआ उसका तो मैंने वो वीडियो सोचा कि डिलीट कर देती हूं तो मैंने अपने एक गौतम खट्टर जी हैं मैंने उनसे बात करी कि मैं देखो एक बार ये मैं वीडियो डिलीट कर दूं क्या ये बहुत विरोध हो रहा है इसका तो उन्होंने कहा तुमने कुछ गलत किया क्या मैंने कहा नहीं तो उन्होंने मुझे सारे जितने भी प्रमाण थे वो मेरे सामने रख दिए लाकर तो मनुस्मृति से लेकर सारे प्रमाण मेरे सामने रखे उस दिन मैंने अच्छे से समझा यजो पवित संस्कार को 16 संस्कारों में 16 संस्कार ये पौराणिक में तो सारे संस्कार खत्म हो चुके हैं नारियों में ऐसे भी है कि परिवारों में नामकरण संस्कार तक महिलाओं का नहीं होता है एक परिवार में मैं गई तो संस्कार पूछे इसका नामकरण संस्कार हुआ तो उन्होने कहा हां बेटे का हुआ है मैंने कहा बेटी का इसका नाम तो इसका भी अच्छा है तो उन्होने कहा नहीं हमारे में नामकरण संस्कार लड़कियों का नहीं होता लड़कों का होता है मुझे बहुत बुरा लगा सुनकर दूसरा एक तो विवाह संस्कार तो खैर हो नहीं सकता महिला के बिना नहीं तो वो वो भी कर देते है ना तो एक विवाह संस्कार तो चलो हो जाता है तो 16 संस्कारों में से ये जो 11वें नंबर का जो संस्कार है वो हमारा यजो पवित्र संस्कार है 12वें नंबर का वेद आरंभ संस्कार ये ये दिखाता है कि वेद आरंभ आपका जब होगा उससे पहले ही यजो पवित होगा यजो पवित्र लेकर ही आप वेद आरंभ कर सकते हो तो यजो पवित में जो तीन धागे होते हैं वो तीन ऋणों को दिखाते हैं मातृ पितृ ऋण गुरु ऋण और ऋषि ऋण ये दिखाते हैं तो ऐसा तो नहीं है कि जो माता का दूध का जो ऋण है अब माता ने दूध पिलाया बेटी को पिलाया बेटे को भी पिलाया अब जो उसका ऋण है वो केवल पुत्र पर चढ़ रहा है पुत्री पर नहीं चढ़ रहा है यह तो गलत बात है ना महिलाओं को वेद पढ़ने का अधिकार नहीं है मैं ये पूछना चाहती हूं जो ये भी पौराणिक जो ये कहते हैं कि महिलाओं को वेद पढ़ने का अधिकार नहीं है तो मुझे बता दो क्या तुम्हारे घर में सरस्वती माता की तस्वीर नहीं है और जब सरस्वती माता की तुम उस तस्वीर को देखोगे तो उसमें तुम्हें दिखाई देंगे कि सरस्वती माता ने चारों वेद अपने हाथों में पकड़ रखे हैं तो हटा दो उस तस्वीर को भी तुम वहां से हटा दो उस तस्वीर को भी तो जो ये चार वेद माता सरस्वती ने पकड़े हुए ये ऐसे ही नहीं पकड़े हुए उन्होंने भी अध्ययन किया होगा और वो भी महिला है तो इसका अर्थ हम भी वेद पढ़ सकते हैं और हम भी यज्ज पवित्र संस्कार ले सकते हैं तो ये जो मैं एक राजा जनक की सभा थी राजा जनक की सभा में सारे विद्वानों को बुलाया वेद जो भी वेद जानते हैं उन सबको बुलाया तो विदुषी गार्गी भी वहां थी विदुषी गार्गी वहां थी और याज बल्के भी वहां थे तो वहां सोने से जिन सीं मड़े हुए गाय की जो गाय थी वो वहां थी कि जो भी ये प्रतियोगिता जीतेगा वो ये गाय लेकर जाएगा तो याज वल्की जी अपने साथी से कहते हैं कि ये गाय हमारे यहां जानी चाहिए हमारे यहां आनी चाहिए तो जितने भी विद्वान वहां बैठे थे उन्होंने कहा कि अभी शुरू तो होने दो अभी शुरू होगी तो तो ये गाय आपके यहां पे जाएंगी ऐसे थोड़ी चली जाएंगी तो प्रश्न उत्तर हुए बहुत ज्यादा हुआ अंत में क्या हुआ गार्गी जी खड़ी हुई विदुषी गार्गी खड़ी हुई उन्होंने कहा मैं तीन प्रश्न पूछूंगी और इन तीन प्रश्नों का यदि यावल जी ने उत्तर दे दिया तो ये गाय ले जा सकते हैं उसके अ और ये निर्णय किया गया कि विदुषी गार्गी को इतना ज्यादा अध्ययन था वेदों का कि ये जो प्रश्न करेंगी उसके बाद कोई प्रश्न करने के लायक है भी नहीं ये ऐसे प्रश्न करेंगी तो उनका जो उत्तर उन्होंने दिया और वो ले गए गायों को तो इतना मान था विदुषी गार्गी में कुछ तो होगा ना पढ़ा तो होगा ना कुछ ऐसे ही तो नहीं बिठा दिया गया होगा दूसरा एक प्रमाण और मैं जब इस सब सुन रही थी जब ये जान रही थी तो उसके दौरान मुझे शंकराचार्य जी का एक एग्जांपल दिया गया जब शंकराचार्य जी मंडन मिश्र जी के पास गए शास्त्र करने के लिए तो उसका जो जजमेंट कर रही थी जो स्त्री वो मंडन मिश्र जी की पत्नी थी तो जब मंडन मिश्र जी की पत्नी उनके शास्त्रार्थ का अगर निर्णय करेगी कौन जीतेगा और कौन हारेगा इसका अर्थ यह है कि वो भी कुछ ना कुछ तो जानती ही होगी उसने भी पढ़ा ही होगा और यदि उसने वेदार लिया वेद आरंभ किया होगा वेद पढ़े होंगे तो यजो पवित्री जरूर लिया होगा तो ऐसा नहीं है 16 का 16 संस्कार जैसे दीदी ने बताया 16 के 16 संस्कार पुत्र के भी होते हैं और पुत्री के भी होते हैं इसलिए जो मैं बोलना चाहती हूं जो अपने मंचों से कथावाचक ये पंडित जो बोल देते हैं कहते हैं कि स्त्रियों को यज्ज पवित्र लेने का अधिकार नहीं है वेद पढ़ने का अधिकार नहीं है उनको गायत्री मंत्र पढ़ने का अधिकार नहीं है तो मैं यही जानना चाहती हूं कि गायत्री मंत्र में ऐसी कौन सी अभद्र बात कह दी गई है जो हमें पढ़ने का अधिकार नहीं है और पुरुषों का पढ़ने का अधिकार है ऐसी कौन सी बात कह दी गई है तो पर मुझे बुरा इस बात पर लगता है जो मैं जो पहले बात बोल रही थी फ्रीडम के नाम पर तुम यह तो कह देती हो कि मुझे क्यों नहीं छोटे कपड़े पहनने का अधिकार है फ्रीडम के नाम पे तुम यही क्यों नहीं पूछ रही हो कि मुझे क्यों नहीं गायत्री मंत्र पढ़ने का अधिकार है फ्रीडम के नाम प तुम ये क्यों नहीं पूछ रहे कि मुझे क्यों नहीं जो पवित्र लेने का अधिकार है तुम ऐसे कैसे पूछ कह सकती हो कि मुझे छोटे कपड़े पहनने का अधिकार क्यों नहीं है ये क्यों नहीं कहते ये क्यों आता है ये सवाल मन में और मैं तो मानती हूं गलती उनकी भी नहीं है जब एक पंडित एक फेमस कथावाचक अपने पंडाल के बाहर यह लिख देगा कि अपने चप्पलों के साथ अपनी बुद्धि भी बाहर छोड़ कर आना तो क्या प्रश्न करेगा बच्चा आकर अगर तुम प्रश्नों के उत्तर नहीं दोगे तो वो कोई नया पंडित ढूंढेंगी नया कथावाचक ढूंढेंगी और वहां से अपने प्रश्नों का उत्तर लेंगी अगर तुम नहीं दोगे तो यहां टाइम ये है कि तुम्हें उत्तर देने पड़ेंगे तुम्हें उत्तर बताना पड़ेगा कि क्यों नहीं ले सकते अगर कोई है वैलिड रीजन तो दो हमें हम मानेंगे हम मानने के लिए तैयार है मेरी माता मुझसे कहती है अ कहते हैं कि जो माता होती है वो देवता होती है हमारे वेदों में हमें बताया जाता है हमरे हमें मेरे आचार्य जी मुझे बताते है जो माता होती है वो वेदों वो देवता होती है माता निर्माता होती है मैं माता की सारी बातें मानती हूं लेकिन माता की बातें मैं ऐसी तो नहीं मान सकती हूं जो गलत होंगी और ऐसा भी नहीं है कि मैं अपनी माता को समझाने का प्रयास नहीं करती हूं मैंने शुरू किया धीरे-धीरे मैंने उस बात को वहीं खत्म कर दिया कि ठीक बोल रहे हो आप मम्मी ये हंस रही है मुझे देखकर ये भी मुझे देख रहे हैं सही बोल रहे हो अगले दिन गोवर्धन था मेरी माता जी वो गोवर का जो बनाते हैं अपने यहां पर उसकी परिक्रमा लगा रही थी और आचार्य जी ने मुझे गोवर्धन का अर्थ समझाया कि गौ का वर्धन करना गायों का वर्धन करना गोवर्धन कहलाता है मम्मी के पास में गई मैंने कहा आपको पता है कि ये गोवर्धन का अर्थ क्या होता है कहती एक कहानी सुनाई पौराणिक से मुझे बढ़िया सी मैंने कहा बढ़िया कहानी थी आपकी मम्मी पर आपको पता है इसका अर्थ कैसे इसको अगर डिवाइड करेंगे आपने संधि विच्छेद तो पढ़ा होगा ना मम्मी कह रही हां तो पता है अब ग और वर्धन को अलग करो गौ का जो वर्धन होता है उसको गोवर्धन कहते हैं तो दो मिनट वो चुप खड़ी रही फ बोलती है कि हो सकता है वैसे यह भी हो स हो सकता है चलो मैं मान लेती हूं तो ऐसे मैंने शुरू करा मैंने उनको बताया कि ईश्वर और भगवान में क्या डिफरेंस है आपको पता है भगवान क्या होते है मम्मी तो बोलती है भगवान कृष्ण है उनका एक ही इलाज वही होता है वैसे मैं बताऊं कृष्ण डिवटी एक ही कृष्ण भगवान है तो फिर मैंने कहा फिर ये कहते कर्ण कण में भगवान है मतलब हर जगह जाकर भगवान है तो मैं उनको ऐसे समझाने का प्रयास करती हूं वो समझती है तो ऐसा नहीं है कि समझेंगे नहीं जहां प्रमाण होंगे वहां लोग समझेंगे मेरे यज्ज पवित्र को उन्होंने समझा मैंने उनको सारे प्रमाण उनके सामने रख दिए कि ये देखो ये है ना ये सारे प्रमाण है ना जिस मुझे एक बात समझ नहीं आती लोग बोलते थे कि मनुस्मृति में ऐसा लिखा हुआ है तो मैंने यह प्रश्न किया आचार्य जी मनुस्मृति में ये लिखा गया है तो उन्होंने कहा कि ये वैसा है कि एक लड़की बोल रही है कि मैं नहीं मानती चीजों को मैं नहीं मानती धर्म को इसमें बहुत मिलावट है और ये पता नहीं क्या पाखंड चल रहा है मैं धर्म को नहीं मानती तो उसको ये पूछो कि जो दूधिया दूध लेकर आता है उसमें पानी मिलाकर लेकर आ तो तुम ये कह दो कि दूध खराब है दूध पीना नहीं चाहिए ऐसा तो नहीं कहोगी दूध अच्छा तो होता है बस वो मिलावट करके लेकर आ रही है वैसा ही है तो यही मुझे आचार्य जी ने समझाया कि ये मिलावट है बेटा जिस मनुस्मृति में ये लिखा हो सकता है यत नार्यस्तु पूजते रमंते तत्र देवता उसी मनुस्मृति में कैसे लिखा हो सकता है कि नारियों को वेद पढ़ने का अधिकार नहीं है देखने का भी अधिकार नहीं छूने का भी अधिकार नहीं है अगर वो पढ़ ले या और सुन ले तो उनके कान में खोलता हुआ तेल डाल देया कुछ भी तो ऐसे कैसा होता एक ही एक ही जो ग्रंथ है वो अलग-अलग दो बातें कह रहा है ये बिल्कुल गलत था ये मिलावट थी हमारे इसमें तो बहुत ब ब कह दिया [प्रशंसा] धन्यवाद आजकल नकली नारी सशक्तिकरण बहुत चल रहा है हम देखते हैं कि हमारे देश में कानून भी बन रहे हैं समलैंगिकता के कानून बन रहे तो मैं जानना चाहती हूं आयुषी जी से कि यह मेंटली कोई इशू है या सच में ऐसे अधिकार कुछ मिलने चाहिए अभी बहन ने बहुत सुंदर बताया मीनाक्षी जी ने और इससे पहले मैं इसी मुद्दे पर विचार कर रही थी आप विचार करो कि आर्य समाज के उत्सव में हमें नारी सशक्तिकरण क्यों लिखना पड़ा कुछ तो कारण है ना कि हमको यहां लिखना पड़ा कि नारी को सशक्त करने की आवश्यकता है और बहन ने वही बात बिल्कुल पुष्ट कर दी कारण उसका यह है आप यह बताइए गायत्री मंत्र नहीं पढ़ना चाहिए और यह बात डंके की चोट प कही जा रही है उस देश में जहां पर ऋग्वेद का उदाहरण देते हुए कहा जाता है कि स्त्री ही ब्रह्मा बभु वि था स्त्री यज की ब्रह्मा होवे और ब्रह्मा को चारों वेदों का ज्ञान होना चाहिए और गायत्री मंत्र ब्रह्मा जी पढ़ेंगे नहीं तो मैंने उसमें तर्क दिया मैंने बोला इसके दो उत्तर माने जा सकते हैं या तो आप हमें इतना बुद्धिमान मानते हो कि यो योन प्रचोदयात बुद्धि की आवश्यकता हमको नहीं है महिलाओं की बुद्धि सती होती है खराब नहीं होती या तो एक यह तर्क है हमको बुद्धिमान मान लो यह बात आप मानेंगे नहीं दूसरा तर्क यह है कि आप यह मानते हैं कि सद बुद्धि की आवश्यकता हमको है ही नहीं मात्र बुद्धि बु ही हो चाहे वो डॉक्टर वाली बात है ना किडनी चुराओ या इलाज करो केवल बुद्धि आपके पास होनी चाहिए सद बुद्धि नहीं चाहिए तो दोनों तरक आप नहीं मानेंगे तो आप एक बात सोच के देखिए नारी सशक्तिकरण की आवश्यकता इसलिए है कि आज भी हमारे देश में अगर भरे मंच से यह कह दिया जाए कि नारी गायत्री मंत्र नहीं पढ़ सकती और इस बात को मानने वाली सबसे ज्यादा महिलाएं ही है सत्य वचन महाराज महिलाए वेद नहीं पढ़ सकती सत्य वचन महाराज महिलाएं गायत्री मंत्र नहीं मैंने कहा ना बड़ी प्यारी होती है महिलाएं बड़ी प्यारी प्यारी कह लीजिए भोली कह लीजिए और मैंने कहा ना अगर शब्द कह दूंगी तो बुरा लगेगा लेकिन भोली अच्छा लगेगा बड़ी भोली होती है मैं एक उदाहरण और दे रही थी चाहे पत्नी कितनी प्यारी हो उसे भेद बताना ना चाहिए लड़ाई सी बात पे आपने बताया नहीं था जी आप ही ने तो कहा तो हम दिमाग नहीं लगाते चल रहे हैं गायत्री मंत्र नहीं पढ़ना चाहिए परसों यही तर्क देके मैंने रील डाल दी और कई लोग कह रहे हैं आप शास्त्र पढ़ो मैंने बोला शास्त्र लेके आओ दिखाओ तो सही समाज में मिलावट का कारण ही यही हो गया इतने पतित हुए कि आज तक संभल नहीं पा रहे लेकिन आज भी बुद्धि नहीं लगा रहे हम कौन थे मैथिली शरण गुप्त की पंक्तियां है हम कौन थे अभी बहन बता रही थी भारती और शंकराचार्य का शास्त्रार्थ होता था हम वो थे कि अगर मेरे पति हार गए मैं अर्धांगिनी हूं अगर मैं नहीं हारू गी तो हारा हुआ नहीं माना जाएगा और शास्त्र क्या करती थी हम वो थे इसीलिए कहा क्या कर नहीं सकती यदि शिक्षिका हो नारियां साक्षर नहीं कहा अक्षर ज्ञानी नहीं कहा क्या कर नहीं सकते यदि शिक्षिका हो नारियां और रण रंग सुधर्म रक्षा कर चुकी सुकुमार यां बोलो नर से नारियां किस बात में है कम हुई मध्यस्थ शास्त्रार्थ में वे भारती के सम हुई मध्यस्थ शास्त्रार्थ में वे भारती के सम हुई ये बराबरी की आवश्यकता है बराबरी में ये नहीं वो 9:00 बजे आता है तो मैं 10 बजे पिंजरा तोड़ो अभियान यह आवश्यकता नहीं है कभी भी चले जाओ यूनिवर्सिटी के गेट पर अलग डिजाइन के कपड़े आपको समझ में आएगा कौन महाशय बैठे हैं किसलिए बैठे हैं उनकी मांग यह नहीं है कि हमें भी गायत्री मंत्र पढ़ने का अधिकार मिले हमें भी य जो प बहनों को यज्ज पवित्र का मतलब ही नहीं पता जिन्होंने सुबह उठक दो आजादी दो आजादी का मतलब ही बस यही किया है तो उनको कुछ नहीं पता लेकिन पिंजड़ा तोड़ अभियान बराबरी मतलब अच्छे में करो ना क्यों नहीं करते हम अच्छों में बराबरी देखो कोई मना करे आप गायत्री मंत्र नहीं पढ़ सकते यही पढ़ूंगी तू रोक के दिखा ये है तर्क लोग कहते हैं और जी हमको आप ये समझिए कितनी बड़ी हानि होती है एक शब्द से लोगों ने कहा आप मंदिर नहीं जा सकते हमने कहा ठीक है हम जाए जाएंगे ही नहीं छोड़ दिया आप नहीं जा सकते अच्छा हम भी नहीं जाएंगे आप आर्य समाज नहीं जा सकते हम नहीं जाएंगे आप यहां नहीं जा सकते हम नहीं जाएंगे क्यों नहीं जाएंगे क्यों तो पूछा होता ये आपका अधिकार है यह आप पूछ सकते हैं अगर आप गायत्री मंत्र पढ़ेंगे तो मैं भी पढ़ूंगी ओ भूर भुवा स्वा आप सोचो ना यो योना प्रचोदय सद बुद्धि की आवश्यकता हमको नहीं है लेकिन यह सवाल नहीं करते यहीं पर हमको बराबरी नहीं चाहिए बराबरी चाहिए 10 बजे मैं हॉस्टल में आऊंगी अगर पूछ लिया वार्डन ने तो उसकी लंका लगनी तय है यही तो बराबरी चाहिए अगर ट्रेन में जरा सा भी आप यह समझिए बराबरी का मतलब क्या होता है बराबरी का मतलब होता है कि पति की मृत्यु हो जाए पति दुनिया में नहीं है आज का समाज होता तो विधवा कह के ताने मार मार के मार देता य हमारी कमी है एक समाज का सच यह भी है यह भी हमको स्वीकार करना पड़ेगा एक सच यह भी है कि बेटी हो जाए तो अरे लक्ष्मी जी आए है क्यों लक्ष्मी जी आई है बेटी है भाई स्वीकार करो ना कोई बात नहीं दूसरी अरे कोई बात नहीं बेटा भी हो जाएगा क्यों भाई यह बात समाज में चलती है यह बात हम बात नहीं करते लेकिन याद रखिए कबूतर के आंख बंद कर लेने से समस्या हल नहीं हो जाएगी बेटी हुई है बाप को समस्या नहीं मां को समस्या नहीं दादी को समस्या नहीं दादा को समस्या नहीं पड़ोसन आएगी गंदा सा मुंह लेके अच्छा बेटी हो गई कोई बात नहीं बेटा भी हो जाएगा ऐसे घबराने की बता भगवान ने इसी घर में देनी थी आप विचार करो यही तो समाज का सच है ना क्यों हम नहीं बात करते इन मुद्दों पे यह भी समाज का एक बहुत बड़ा और मैं आपको बताती हूं 75 पर की आबादी यही है और इसीलिए कहीं ना कहीं मैं एक बात कहती हूं आप प्रत्येक के मस्तिष्क को समझने का प्रयास कीजिए ना मेरी बेटी पिंजड़ा तोड़ अभियान में जुड़ी क्यों मैंने क्यों नहीं समझा कि मेरी बेटी को पीड़ा क्या थी मेरा व्यक्ति धर्म छोड़ के गया क्यों मैंने क्यों नहीं समझा मेरा बच्चा काला पहाड़ बना क्यों मैंने क्यों नहीं समझा मेरा व्यक्ति मे इतना कट्टर नहीं था सामान्य बिचारा धर्म परिवर्तन हो गया लेकिन उसको बिचारे को कुछ नहीं पता ना उसे उधर का आता ना इधर का ठीक आता लेकिन उन्होंने मजबूत बना लिया हम अपना घर बैठ कर के अरे कोई बात नहीं हम तो ठीक है कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी हम खुश है करो ना इन मुद्दों पर बात क्यों नहीं करते एक व्यक्ति का जाना एक बच्चे का पिंजरा तोड़ अभियान में जुड़ जाना हमारी असफलता है स्वीकार करो क्यों नहीं लाए अपनी बच्ची को उसको बताओ बराबरी है मंत्र पढ़ हमको बराबरी का अधिकार दिया जाता है आर्य समाज के उत्सव में आना है अकेले चल के आते हैं कोई दिक्कत नहीं कोई मना नहीं करता लेकिन अगर मैं ही कहूं मुझे भी आजादी के नारे लगाने है तो घर वाले क घर बैठो यह बात नहीं करते इन मुद्दों पर भी बात करेंगे तो हमारी बेटी किसी अभियान में नहीं जुड़ी आप अपने बच्चे को इतना प्यार से लेकर चलो ना कि वो अभिमन्यु बने इतना प्यार से लेकर चलो ना कि आपकी बच्ची पति की मृत्यु हो जाए तो 23 साल की नव युवती घबराती नहीं है किन अंग्रेजों के सामने जो कहते थे कि सीना उनके राज्य में सूरज नहीं डूबता उन अंग्रेजों के सामने एक बेटी खड़े होकर कहते आप पढ़ के देखिए वृंदावन लाल वर्मा की झांसी की रानी उसने कहा मैं जीते जी अपनी झांसी नहीं दूंगी यह है सशक्तिकरण इस सशक्तिकरण की बात क्यों नहीं करते हम उसी के लिए सुभद्रा कुमारी चौहान ने कहा था सशक्तिकरण की परिभाषा चेंज हो गई लेकिन वो बच्चे भी अपने हैं अपना भाई काला पहाड़ ना बने अपनी बच्ची गलत अभियान में ना खड़ी हो उसे खींच के लाने की जिम्मेदारी हमारी है क्योंकि है तो हमारी बेटी उसको लाने की जिम्मेदारी आप सोचो कि उसने कहा मैं जीते जी अपनी झांसी नहीं दूंगी हम कहते हैं पुरुष हमरा साथ नहीं देते ये नहीं देते पूरी झांसी साथ खड़ी हो गई थी एक महिला के आह्वान पे विचार तो करो आप अच्छे आंदोलनों को लेकर चलो तो सही आप लीड करोगे लेकिन आप में ताकत होनी चाहिए अब आपको आंदोलन ही करना है 9:00 बजे घर आना है तो अपने वाले भी और विरोध में हो जाएंगे आप तार्किक आंदोलन कीजिए सही दिशा में देश के राष्ट्र के समाज के परिवार के उत्थान के लिए आंदोलन कीजिए दुनिया आपके साथ होगी आप सोचो 23 साल की नव युवती कहती है मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी एक बेटा आज हमारा बेटा होता है सत्संग में नहीं आ पाते जी छोटा बच्चा है बड़ा रोएगा हम नहीं आ पा रहे छोटा बच्चा है जी हम कॉलेज नहीं आ सकते कितने बहाने बनाते हैं हम सोचो आप और वो तो इतने बड़े राज्य की महारानी है और अपने पुत्र को जिसको पता है कि तेरे प्राण नहीं बचेंगे अपने पुत्र को पीठ से बांधती है दोनों हाथों से तलवार चलाती है घोड़े की लगा मुंह में दबाती है इसीलिए सुभद्रा कुमारी चौहान ने कहा था उनकी गाथा छोड़ चले हम झांसी के मैदानों में जहां खड़ी थी लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानम में जहां खड़ी थी लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानम में ये है सशक्तिकरण और आपको लड़ना है तो अच्छे मुद्दों पर लड़ी हम गायत्री मंत्र पढ़ेंगे जैसे बहन ने कहा अगर चार महिलाएं वहीं खड़े हो जाए पंडित जी हम तो पढ़ेंगे आपका जो होता वो कर लो बात खत्म होना ही नहीं आगे लेकिन आप मजबूत नहीं है पुरुषों की गलती मत बताओ आपसे ही नहीं बोला गया आपने ही नहीं कहा यज जो पवित्र का अधिकार अभी आचार्य नंदिता जी आपके आर्य समाज में भी आई है इतनी प्रतिष्ठित लोग हैं इतनी कन्याओं का निर्माण कर रही हैं उन्होने यजो पवित संस्कार कराया तो आर्य प्रतिनिधि सभा ने [संगीत] अधिकार है अब उसमें पढ़ाएंगे शादी में आर मतलब कुछ लोग पहनाते हैं पत्नी के नाम का भी पति पहने का भाई साहब उसको पहले ही पूरे परिवार का बोझ डाल के आपने गधा बनाने की तैयारी कर ली एक यज्ज पवित्र का और डाल दो मतलब कहने का अभिप्राय यह है कि आप सही दिशा में अगर सशक्तिकरण करेंगे तो निश्चित रूप से समाज में परिवर्तन आएगा लेकिन नारी को आदर करवाना आना चाहिए हमने राम जी पैदा किए बड़ा गर्व होता है अरे जी कौशल्या जी ने कीजिए जीजाबाई ने छत्रपति शिवाजी महाराज की माता विद्यावती ने भगत सिंह करे लेकिन रावण को पैदा करने वाली कौन थी उस पर भी बात कर लो उसको पुरुषों ने थोड़े करा हमने ही करा तो कहने का अभिप्राय यह है कि अपने अच्छे और बुरे दोनों पॉइंट को जान कर के जो आगे बढ़ता है निश्चित रूप से वह समाज वो परिवार वोह राष्ट्र उन्नति करता है तो सशक्तिकरण अगर सही दिशा में होगा जो समाज के परिवार के लिए अच्छा होगा अपने लिए जिए तो क्या जिए यह पंक्ति आपको समझा कर के बहन को माइक देती हूं कि यूं तो जीने के लिए लोग जिया करते हैं अपना सशक्तिकरण करा मुझे आजादी मुझे आजादी परिवार कौन संभालेगा हमारी जिम्मेदारी है अपने कर्तव्यों को समझिए यूं तो जीने के लिए लोग जिया करते हैं और लाभ जीवन का है नहीं फिर भी जिया करते हैं और मरने से पहले मरते हैं हजारों लेकिन जिंदगी उन्हीं की होती है जो मर के भी जिया करते हैं जिंदगी उन्हीं की होती है जो मर के भी जिया करते हैं मेरा जो प्रश्न था वो समलैंगिकता से रिलेटेड था तो बहुत बहुत अच्छा जवाब दिया में चला गया नहीं जिस दिशा में गया बहुत अच्छी दिशा में गया तो जो समलैंगिकता के आज अधिकारों के लिए लड़कियां लड़ रही हैं और हमारे देश को मजबूरन कानून बनाने की भी आवश्यकता पड़ रही है तो क्या हमारे देश में ऐसे कानून बनने चाहिए तो सुमेधा जी आप बताइए ये प्रश्न बहन ने पूछा समलैंगिकता वाला अभी जो बात इन्होंने की मैं पहले से थोड़ा सा बस इसमें ऐड करना चाहती हूं अभी कश्मीर विश्वविद्यालय में मैंने एक पेपर आयुष जी प्रेजेंट किया उस पेपर का ही शीर्षक था वेदों में नारी का महात्म और आप सोचिए कि वो गलती से वहां पर जो आचार्य गण थे अब जो लोगों ने यह पेपर पहले पढ़े उसमें कहा भाई विद्वा विवाह का वर्णन है और इस तरह से साम्राज्य ससुरे भवा आदि बात कही जाती है मैंने उसमें ऐड कर दिया ब्रह्मचर्य सूक्त में कहा है कि भाई नारी को वेद अध्ययन का भी अधिकार है उपनयन का भी अधिकार है इसी बात पर मैं तीन मिनट में पेपर खत्म करके बैठने वाली थी उस चर्चा को 10 मिनट लग गए आप सोचिए और उनका प्रश्न क्या था उनका मंतव्य क्या था कि आप उपनयन की बात कर रहे हैं चलो आपने ब्रह्मचर्य सूक्त पढ़ लिया ठीक है उपनयन की बात होती है वहां पे और वेद पाठ की बात होती है इतने तर्क दे दिए ना इतनी देर में जैसे आपने बताया कि भाई कमेंट्स भरे रहते हैं इतने तर्क दे दिए कि लड़कियों को ये ये ये ये क्यों नहीं मिलता और मैं इस मंच पर थोड़ा सा कहना चाहती हूं उन्होंने सीधा बोला कि लड़कियों को मासिक धर्म की समस्या होती है इसलिए ऐसी बातें लेकिन आप 10 चार पांच वर्ष का छ वर्ष का बालक गुरुकुल में चला जाता है वो दो-तीन वर्ष तो आप अलाव कर सकते हो ना बेटियों को वेद पाठ करना और उपनयन आदि करना तो तर्क तो इतने कुतर्क है और सीधी बात है कि आचार्य नंदिता जी की बात की बहन ने तो इसन चीजों पे हमें बोलने की आवश्यकता है और गायत्री मंत्र बेटियों को पढ़ने का हमें अधिकार देना है इसलिए ताकि वो ये ना सोचे हनुमान चालीसा बच्चों को नहीं आती गायत्री मंत्र नहीं आते वेद पाठ आती तो भूल जाइए अपने ग्रंथों के नाम नहीं पता अभी हम लोग केरला स्टोरी देख कर ही चुके हैं कि भाई अपने बच्चों को नहीं पता और जब तक आप नहीं बताओगे वही पौराणिक रोक दिया मंदिरों में भी नहीं जाना हमारे समाज में भी नहीं जाना तो वो लव जिहाद में फसें ही फसें आप उन बेटियों को बचाना चाहते हो तो यह सब बोलना आवश्यक है और समलैंगिकता वाली बात जब बहन ने पूछी तो ये बोला जाता है कि भाई आप एक बात सोचिए अभी एक महिमा मंडन इस तरह से चल रहा है ना भोगवा का पश्चिमी संस्कृति का बहुत सी बातें हम यहां पर कर रहे हैं अब विवाह संस्कार जब पढ़ेंगे महर्षि दयानंद का पढ़िए वेदों में पढ़िए जहां भी पढ़िए हर चीज का प्रयोजन होता है आचार्य चाणक्य कहते हैं कि बिना प्रयोजन के कोई कोई भी चीज संसार में होती ही नहीं है तो हर चीज का प्रयोजन होता है विवाह के पीछे भी प्रयोजन है कि भाई संसार में अभिवृद्धि करनी है संसार को एक जीने योग्य स्थान बनाना है दो यथा गुण समान गुणों वाले बालक बालिका लड़का लड़की मिलकर विवाह करें तो विवाह का मतलब केवल ये नहीं है कि मुझे प्यार हो गया किसी से मुझे कोई अच्छा लग रहा है मुझे इसके साथ जिंदगी बितानी है आप उत्तरदाई है समाज के लिए राष्ट्र के लिए धर्म के लिए सिद्धांतों के लिए उन ऋषि परंपराओं के लिए जब हम यजो पवित धारण करते हैं तीन ऋण हमारे ऊपर होते हैं तो हमारा उत्तरदायित्व होता है उन ऋणों को चुकाना केवल अपना जीवन अपने स्तर पर जीना हमारा उद्देश्य नहीं होता तो समलैंगिकता आदि की जब बात होती है तो आप स्वार्थी होकर जब यह बात करते हैं और फिर वही समाज में पाश्चात्य करण इतना ज्यादा बढ़ रहा है कोर्ट को भी रूल्स बना देने पड़ते हैं और एक दिन मैंने कुछ दिन पहले कल्पना दी का एक वक्तव्य सुना था पेपर प्रेजेंटेशन ही था उसमें उन्होंने बताया था कि किस तरह ये हमारे समाज को तोड़ने की बात है किस तरह हमारे राष्ट्र को हमारी संस्कृति को छिन्न भिन्न कर देना चाहते हैं कि आगे आपके पुत्र हो ही ना आपकी पुत्रियां हो ही ना आप अपने स्तर पर जीवन जी के खत्म हो जाओ आपकी जमीनें उनकी हो जाए आपका सारा जो भी समृद्धि है वो उनकी हो जाए और वही वाली बात हो वो बाइबल लेकर आए थे बाइबल आपके हाथ में आ गई जमीने उनके हाथ में चली गई तो ये सारी चीजें चाहे लिवि इन रिलेशनशिप की बात कर ले समलैंगिकता की बात कर ले ये हर दृष्टि से संस्कृति को समाज को तोड़ने का प्रयास है और आवश्यकता है हमें कि हम संस्कारों पे विवाह संस्कार हो या फिर बचपन से लेकर गर्भाधान आदि संस्कार हो संस्कारों को 16 के 16 संस्कारों को बेटे और बेटियों के लिए दृढ़ता से उनका प्रतिपादन ऋषियों ने किया है हम उनका इंप्लीमेंटेशन समाज में करें अपने अपने परिवारों में करें यही इसका एक समाधान हो सकता है धन्यवाद अब अगला सवाल मैं आपसे करना चाहूंगी कल्पना जी से कि एलजीबीटी क्यू इस्लाम में प्रतिबंधित है पर हमसा जैसे संगठन को एलजीबीटी क्यू का सबसे ज्यादा सपोर्ट मिल रहा है तो इस पर आप क्या कहना चाहेंगी हम आपने जिसकी बात की है मैं उसके विषय में कोई चर्चा नहीं करूंगी क्योंकि उनके यहां प्रतिबंधित हलाल भी है उनके यहां प्रतिबंधित तलाक भी है उनके यहां प्रतिबंधित दूसरी महिला को देखना भी है जी ठीक है तो जितना उनके यहां प्रतिबंधित हैना उसकी सत्यता हम सबको पता है कि उनके यहां क्या प्रतिबंधित है तो उसमें नहीं जाएंगे कि वहां पर क्या है लेकिन एलजीबीटी क्यू हमारे यहां पर क्यों स्टैंड कर रहा है देखिए वही बात है कुछ लोगों ने कहा कि हम देश को तलवार से नष्ट कर देंगे दूसरों ने कहा हम कन्वर्जन कर लेंगे एक तीसरी शक्ति हमारे बीच में घूम रही है जो बहुत बड़ी ताकत लिए घूम रही है वो कह रही है कि ना तो हम तलवार से करेंगे ना हम हम तुम्हें कन्वर्ट करेंगे हम तुम्हें रहने ही नहीं देंगे तुम्हारी पीढ़ियां ही नहीं होंगी एक ने कहा तलवार से काट देंगे राज हम करेंगे दूसरे ने कहा कन्वर्ट कर देंगे तो तुम्हारे राज्य तुम्हारा देश हमारा हो जाएगा सारी संपत्ति हमारी हो जाएगी तीसरे ने कहा जब तुम्हारी पीढ़ियां ही नहीं रहेंगी तुम बुढ़ापे में किसकी तरफ देखोगे तुम चिल्लाओ ग एंबुलेंस एंबुलेंस तो कहां फोन करोगे बोले हमारी व्यवस्था में फोन करोगे क्योंकि तुम्हारे बच्चे नहीं होंगे जब अगली संतति नहीं होगी तो किसको चिल्लाओ ग बोले हॉस्पिटल करप्ट हो गया है और क्या वो पुलिस प्रशासन सब समाप्त हो गया है जब हमने व्यवस्था करने वाले बच्चे ही हमारे पास नहीं है तो फिर व्यवस्था जो लोग देख रहे हैं फिर उस व्यवस्था को बिगाड़ने का जिम्मेदारी भी तो उन्हीं की है ना वो पहले बिगाड़ फिर प्रशासन अपने हाथ में लेंगे तब वो यहां राज करेंगे तब वो उनकी सारी संपदा को अपने पास रखेंगे राज करना मतलब केवल डंडा चलाना नहीं होता राज करने का मतलब सारी अर्थव्यवस्था उसके हाथ में आ जाना होता है सारी लड़ाई अर्थ को लेकर के है सारी लड़ाई संपदा को लेकर के है तो वह संपत्ति चाहते हैं अब उसमें हो यह रहा है कि जो वेस्टर्न कंट्रीज है उनमें महिलाओं का कोई अधिकार था नहीं वहां तो चर्च से पूछ करके ही विवाह होता था विवाह नाम की चीज ही नहीं थी अगर आपको किसी से प्यार भी करना है तो भी पादरी महोदय बताएंगे अगर आपको कहीं से मतलब बच्चा भी पैदा करना है तो भी चर्चा आपको आया देगा कि आपको बच्चा पैदा करना चाहिए अगर आपने बिना पूछे कर लिया है तो वह फिर कहां जाएगा वोह अनाथालय में जाएगा जिसको कॉन्वेंट कहते हैं तो तो इस तरह से वहां पर व्यवस्था चल रही थी वहां महिलाएं घुट रही थी वहां महिलाएं अपने अंदर ये कह रही थी बोले बताओ हर चीज तो हमें पूछनी पड़ती है हर चीज बताओ हम स्वतंत्रता से नहीं जी सकते हमारा राज्य में कोई कंट्रीब्यूशन नहीं है हम वोट नहीं दे सकते जितने भी वेस्टर्न कंट्रीज है उनमें वोट महिलाओं को देने का अधिकार 1920 30 40 45 50 के बाद हो रहा है अब सोचिए जहां हमारे देश में रानी दुर्गावती रानी चेनम्मा रानी लक्ष्मीबाई इतनी सारी रानी करुणावती रानी दुर्गावती रानी दुर्गाबाई रानी द्रोपदी बाई इतनी सारी रानियां रही हो वहां पर वोट डालने का भी अधिकार नहीं था और सब अधिकारों की तो बात दूर छोड़ दो फिर हुआ ये कि उन्होंने आवाज उठाई कि भाई हमें कुछ तो दो तो महिलाओं ने वोट डालने का अधिकार मांगा फिर महिलाएं वोट डालने से और आगे बढ़ी अब आजादी की बात चल पड़ी थी तो आजादी शब्द ऐसा गूंजा कि उनको फिर उनको लगा अरे हमें ना थोड़ा सा जो शारीरिक सुख होता है ना उसमें केवल पुरुष ही संतुष्ट हो रहा है हम नहीं संतुष्ट हो रहे हैं तो भाई वो भी संतुष्टि चाहिए उनको तो उन्होंने कहा कि ठीक है एक पुरुष जो है हम एक ही पुरुष के साथ क्यों रहे कि जो शादी वाला बंधन है वो तो हम नहीं जिएंगे क्योंकि उसमें तो महिला को ज्यादा बच्चा भी पैदा करना पड़ रहा है तो उत्तरदायित्व उसी के ऊपर आ जा रहा है बोला हम नहीं करते विवाह हम शादी नहीं करेंगे तो शादी नहीं करोगे तो कहां रहोगे बोला हम तो जैसे मतलब एक महिला जो है एक पुरुष से बंधी हुई नहीं है पूरी जिंदगी भर उसी की दासी बनी रहेगी बताओ तो उसी के सुख के लिए काम करती रहेगी बोले नहीं महिला भी अब एक पुरुष को छोड़ कर के कई पुरुषों से भोग करेगी तो वहां पर बोले कि शारीरिक सुख मुख्य है अब शारीरिक सुख मुख्य है तो शारीरिक सुख के लिए तो एक एक की आवश्यकता नहीं है ना वो कई को अपना चलता है एक को छोड़ा दूसरे को पकड़ा दूसरे को पकड़ा तीसरे को पकड़ा तो वो फिर वहां से शुरू हुआ फिर उन्होंने कहा अरे यह पुरुष से भी अगर हम शारीरिक सुख ले रहे हैं तो उन्होंने एक नया इजाद किया बोले शारीरिक सुख तो महिला के साथ भी हो सकता है बोले शारीरिक सुख ही पहुंचना है ना तो उसके लिए पुरुष की आवश्यकता नहीं उसके लिए तो आप जो समलिंग वाला है उसके साथ भी आप रह सकते हो क्योंकि उनका कोई उद्देश्य नहीं है जीवन का कोई उद्देश्य नहीं हमारे यहां तो कहा बोले धर्म अर्थ काम और मोक्ष तो व हम लोग चार सीढ़िया चल के जाते हैं और कहां पहुंचना हमारा परम लक्ष्य मोक्ष का हमारे यहां काम मतलब इच्छाएं इच्छाएं कितनी हो बोले जो मोक्ष में साधक हो बाधक ना हो हो उसके लिए सबसे पहले धर्म करना पड़ेगा अब जब सबका चरम लक्ष्य परम लक्ष्य केवल कामनाओं की ही पूर्ति करना है तो उसके लिए धर्म की बात आती ही नहीं है उसके लिए सबसे पहले अर्थ चाहिए उसके पहले सबसे पहले अर्थ बोल खाओ पियो मजे करो मस्ती से रहो तो वहां से शुरू हुआ समलैंगिकता का प्रकरण अब क्या है कि जो बिगाड़ आता है ना एक नक कटा संप्रदाय चला था बोले गुरु जी ऐसा ज्ञान देते हैं उसमें नाक कटवा नहीं पड़ती है अब एक ने कटवा ली उसको पता चला कि भाई अगर तेरी कट गई है तो फिर बोले सबकी कटनी चाहिए उसने बता गुरु जी बहुत बढ़िया ज्ञान देते हैं जाओ एक बार दूसरे की भी कट गई दो की वो बन गई अब तो दो हो गए दो ज्ञान फैला रहे बोले भाई नाक कटवा लो ज्ञान ही ज्ञान है इससे ऊपर कोई बात नहीं है पता चला हजारों आदमियों ने अपनी नाक कटवा ली तो वो बात है कि मैं तो अब इसमें आ चुका हूं अब उनकी सारी ऊर्जा लगी कि भाई ये तो समलैंगिकता जो है ना ये वो सब जगह होनी चाहिए उसमें सबसे ज्यादा बाधक है भारत का परिवार सिस्टम समलैंगिकता के लिए भारत का परिवार सिस्टम सबसे ज्यादा बाधक है उसके लिए फिर वो लिविन ले आए कि भाई परिवार खत्म करना है और लड़कियों को आजादी किस तरह की चाहिए केवल शारीरिक सुख की आजादी चाहिए केवल शारीरिक सुख क्योंकि उनके यहां पर दूसरा कोई लक्ष्य नहीं है तो केवल शारीरिक सुख जैसे भी हो सकता है वो वैसे चाहिए बहुत सारे बहुत सारे जब ये शुरू हुआ था ना फेमिनिज्म वाला बहुत सारी पढ़ी लिखी बहने उसमें बह गई और आज वो बुढ़ापे में जी रही है बहुत दुखी जी रही है और जब वो परिवार वाली महिला को देखती हैं तो जलती है ईर्ष्या करती है बोले ये सुखी कैसे हैं हम तो अकेले रह गए तो वो अकेलापन बोले अकेले में हम सुखी हैं हम जैसा चाहे वैसा सुख भोगे पता चला अकेले ही पड़े हैं डिप्रेशन हो रहा है दुनिया भर की बीमारी हार्ट अटैक हो रहा है एक माता को पूछ के देख लो डिप्रेशन है क्या माता जी नाती पोतों के बीच में जब घूम रही है महिला तो पता पता चल रहा डिप्रेशन किसी ने सुसू कर दी किसी ने पोटी कर दी उसी से ही फुर्सत नहीं है ठीक है उसने संभाला उसकी कच्छी बदली उसकी नेकर बदला उसका कपड़े बदले उसने गीले कर दिए उसने खाना खाया नहीं खाया खाया तो सारा कर लिया खराब फुर्सत ही नहीं है टाइम ही नहीं है डिप्रेशन लाने के लिए तो वो क्या किया उन्होंने 100 बीमारी शारीरिक ले आए दवाइयां लेकर के आए और दूसरा अब जो सबसे बड़ी समस्या यह आ गई है उसमें जो कि आप अपना जेंडर चेंज करिए एक महिला अपने आप को महिला वाले कॉस्ट्यूम में फिट नहीं मान रही है कि मेरा तो दिमाग लड़का बनने का कर रहा है तो वो लड़का बन जाए उसके लिए दवाई आ गई एक लड़का है उसका दिमाग कह रहा बोले मेरे को तो फीलिंग नहीं आ रही है आपको बताऊं बड़ी-बड़ी यूनिवर्सिटी में कोर्स है सिलेबस नहीं आपके जो एकेडमिक सिस्टम है ना उसके अंदर आपको टीचर्स ट्रेनिंग में बताया जा रहा है कि आप जेंडर इक्वलिटी का मतलब यह नहीं है कि केवल लड़की का सम्मान होना चाहिए लड़ का सम्मान होना चाहिए जेंडर इक्वलिटी अब इस स्तर पर आ गई है अगर एक लड़के को ऐसा फीलिंग आ रही है कि अगर मैं लड़की बन जाऊ तो तो उसका भी टीचर को ध्यान रखना होगा कि आप अच्छा आपको फीलिंग आ रही है ओहो तो इसका कोई अपमान ना करे उसकी भावना आहत ना हो और सब बच्चों को टीचर समझाएगा कि देखो इसको अलग फीलिंग आ रही है इसके लिए अलग टॉयलेट बनाए जा रहे हैं तो अब जेंडर इक्वलिटी और य सब कुछ बहुत आगे जा चुका है एक बच्चा कह रहा है कि मेरे को फीलिंग आ रही है अभी एक घंटे की एक घंटे की फीलिंग आ रही मैं शी में होना चाहता हूं और वो शी हो गया है अब उसको फीलिंग आ रही बोले नहीं अब तो मैं ही होना चाहता हूं तो वो ही हो जा रहा है तो उसमें घंटे घंटे में परिवर्तन हो रहा है तो ये जो समस्याएं है ये केवल इसीलिए कि लक्ष्य खत्म हो चुका है केवल काम वासना है और वासनाओं की पूर्ति कभी नहीं हो सकती ये तो था है भोगा न भुगता वयम भुगता तपो न तत वयम तृष्णा न जीर वयम जीर य तृष्णा कभी खत्म नहीं होती काम वासना कभी खत्म नहीं होंगी हम ही खत्म हो जाएंगे तो इसीलिए हमारे य परिवार की व्यवस्था है उसे तोड़ने के लिए उसे तोड़ने के लिए महिला भी टारगेट होगी उससे तोड़ने के लिए हमारा भाई भी टारगेट हो रहा सोचो मैंने बच्चे पैदा किए हैं और मेरा बच्चा कल को कहने लग जाए मैंने बेटा पैदा किया वो कहे मैं तो लड़की बनू सोचो कि मैं तो इसकी दवाई खाऊंगा कि मुझे तो फील अलग-अलग सी आ रही है मतलब इतना बिल्कुल एकदम ध्यान देना है सब सबको बताया जा रहा है ऊपर लेयर में जो काम कर रहे हैं ना लोग उनको सबको समझाया जा रहा है ट्रेनिंग प्रोग्राम चल रहे हैं उनके कि अपने बच्चों को जिसको पढ़ा रहे हो ना उनकी फीलिंग समझो कि बैठा बैठा कहीं लड़की वाली फीलिंग में तो नहीं आ गया है तो इस तरह का मतलब विनाश लीला बचाने के लिए यह सब कुछ लाया जा रहा है अब जो वो नकटे संप्रदाय वाला हाल हो रहा है तो वो भारत में भी लाया जा रहा है अब भारत चकि पारिवारिक रूप से अभी तक भी मजबूत खड़ा हुआ है इसलिए बहुत ज्यादा असर नहीं हो रहा पर चूंकि जो जो कि नियम बनाने वाले लोग कानून बनाने वाले लोग हैं वो वहीं से पढ़ कर के आते हैं उन्हीं के ग्रंथ पढ़ कर के आते हैं उन्हीं की सेवा कर रहे हैं वहां पर खूब उनको ले जाया जाता है वहां से उनके हित बधे हुए हैं तो यहां पर किसका अच्छा बताइए आप शराब बंदी के लिए सबने कानून बनाने की घोषणा की है ना करते हैं ना जी आज शराब बंदी दिल्ली में बंद होना चाहिए हम सब कूद पड़ेंगे ठीक है हजारों लाखों आदमियों ने खूब प्रदर्शन कर लिया शराब बंद हुई क्या नहीं बंद हुई अच्छा एक बात बताओ कौन ऐसा आपके घर का लड़का था कितने लड़के गए बोले मुझे अलग फीलिंग आ रही थी मेरे लिए कानून बनाओ कितने लड़के गए भाई कहीं देखा ऐसा प्रोटेस्ट नहीं देखा व गिने चुने दो चार लोग हैं जो यूनिवर्सिटी में घाघरा पहन कर के घूमते हैं दो चार लोग हैं वही कैमरा लिए घूमेंगे उनके लिए कानून बनाया जा रहा है अब पति पत्नी एक साथ नहीं रह सकते कैसा कानून बनाया जा रहा है कि पत्नी के अगर बाहर संबंध है बच्चा होने के बाद भी बच्चा होने के बाद भी अगर पत्नी बाहर संबंध रखती है तो लीगल कर दो अगर अगर बे वो जो पति है ना अगर सब कुछ परिवार बसा बसाया है तो वह क्या हो रहा है कि अगर वह भी बाहर संबंध रखता है महिला के साथ में तो उसको भी क्या कर दो लीगल कर दो अब एक बात बताओ बच्चे कौन देखेगा भाई वे दोनों तो बाहर किसी और के साथ हो गए हैं बच्चे कौन देखेगा बोले बच्चे लावारिस होंगे तभी तो हमारी दुकान चलेगी तुम्हारे बच्चे लावारिस करने यही तो हमारा उद्देश्य है तो उसके लिए कानून बनाए जा रहे हैं अच्छा महिला के अधिकार के लिए कानून बन रहे हैं कैसे कैसे अधिकार बन रहे हैं कानून बन रहे हैं एक सामान्य सी बात बताती हूं आधे से ज्यादा परिवार इसलिए समाप्त हो रहा है भारतीय हिंदू परिवार के विवाह होने के बाद भी उनकी बेटी का अधिकार उसके घर की संपत्ति में है है और ये क्या दिया बोले महिला सशक्तिकरण के नाम पर दे दिया कानून बना के बड़ा अच्छा लगा भाई बेटी का अधिकार भी बराबर का अधिकार है ठीक है जब तक उसका विवाह नहीं होता वो ठीक से बस नहीं जाती तब तक अधिकार हो बहुत अच्छी बात है लेकिन कानून यहां तक है कि अगर नाना नानी मर गए हैं नाना नानी गुजर गए हैं और यहां भी मामा मामी के बेटे हैं और उधर वो देवती देवता है उनके भी मां-बाप मर गए हैं अगर वो भी अपने मामा की संपत्ति में अधिकार मानना चाहे है तो उनको भी अधिकार दो यहां तक कानून बना रखे अब सोचिए कि भारतीय परिवार व्यवस्था बचेगी या खत्म होगी संबंध खत्म हो जाएंगे जो प्यारा संबंध है वो खत्म हो जाएगा तो ये सब बहुत बड़ा दुश्चक्र है और इसके लिए हमें एक मैं नाम सजेस्ट करूंगी आप लोग हमेशा पढ़िए ऐसे कु चक्रों को ध्यान करने के लिए एक कैट मिलेट है उसकी बहन हुई मैरी मिलेट ठीक है उन्होंने अमेरिका में यही फेमिनिज्म वाली क्रांति फैलाई और कैसे फैलाई बोले इन्हो पुरुषों को सबको खत्म कर दो तो एक महिला तो बोली बोली जैसे ही मैं एक बेटा पैदा करती हूं मैं चाहती हूं कि मैं उसको मार दूं इतना बड़ा ठीक है कि बेटा पैदा ही ना हो अ मगर बेटा पैदा ना हो तो वो गर्भ में कैसे आ रहा है तो जब वो इतना सब कुछ करने के लिए तैयार है तो हमें समझना पड़ेगा अपने परिवारों को बहुत समझदारी से रखना होगा नहीं तो ये लोग ये कहने के लिए तैयार हैं भारत में तो कोई व्यवस्था ही नहीं थी बोले भारत की महिलाएं तो पढ़ती लिखती नहीं थी ये जब से अंबेड वो अंबेडकर जी ने ये जब से बौद्ध मत आया और जैन आया तब से थोड़ा-थोड़ा सा आने लगा था उसके बाद कुछ लोगों ने इनको भी दबाने का प्रयास किया यह तो बाद में हमारे अंबेडकर जी आए तो इनको इनके द्वारा अधिकार मिला है महिलाओं को पढ़ने का आजकल मैं बच्चों के साथ थोड़ा डिबेट करने लग जाती हूं एक बच्ची कल आंखों में आंसू ले आई बोले मैम हमारा तो इतना गंदा सिस्टम था कि महिलाएं पढ़ नहीं सकती थी अब यह सोचिए कि सिस्टम में घुला हुआ है जब आप बच्चे को सिलेबस ही यही पढ़ा रहे रहे हो कि आपके भारत में तो कुछ था ही नहीं तो वह तो वहां से देख रहा है कि जहां कुछ था भाई वहीं से कॉपी कर लेते हैं तो हम भी समलैंगिक हो जाते हैं हम भी एक घंटे का ही और एक घंटे का शी हो जाते हैं तो इसमें बहुत बड़ी समस्या आई एक देश का भी मैं पढ़ रही थी उसमें एक ने अपने आप को कहा कि मैं शी हूं मैं तो महिला हो गया हूं उसके बाद उसको फीलिंग आई ही वाली अब वो पुरुष हो गया पुरुष होते ही बलात्कार कर बैठा अब बलात्कार का केस चला तब तक उसको फीलिंग आ गई शी वाली अब अब वो कोर्ट वहां परेशान है कि सजा दे किसको सजा दे किसको अब ये तो शी बन बैठा इसने बलात्कार किया था तो इस तरह की जो समस्याएं हैं यह बहुत बड़े स्तर की समस्याए हमारे देश में ना बने इसलिए अपना परिवार संभाले अपने बच्चों को संस्कार दे धन्यवाद आज हमारे देश में डाइवोर्स के केसेस बहुत बढ़ रहे हैं पहले डाइवोर्स के केस पाश्चात्य देशों में ज्यादा देखे जाते थे तो क्या इसका कारण कहीं ना कहीं महिला सशक्तिकरण है तो श्रद्धा जी मैं आपसे पूछना चाहूंगी हां यह जो आपने कहा ना कि क्या तलाक का जो कारण है वह महिला सशक्तिकरण है दरअसल बात यह है कि जो तथाकथित सशक्तिकरण है ना कहीं ना वो कारण है जैसे जो बात छोड़ी गई है आचार्य जी द्वारा उसी को आगे बढ़ाती हूं अब तक जो शक्तियां आक्रमण शस्त्रों से कर रही थी अपनी पुस्तकों के माध्यम से कर रही थी आज वह शक्तियां उन्होंने देश का जिस तरह से नुकसान किया वह किया लेकिन देश मिटा नहीं फिर भी कुछ ना कुछ किसी रूप में बचा रहा अब जो आक्रमण हो रहा है वो मूल रूप से भारतीय परिवारों के ऊपर हो रहा है वो जो जो आक्रमण हो रहा है व्यक्ति व्यक्ति पर हो रहा है पर जब आक्रमण हो रहा है कि पूरा जो सिस्टम है उसी को तोड़ दिया जाए मतलब रा पर आक्रमण हो रहा था हमारे परिवार में एकता थी दादा दादी परिवार को संभाला करते थे जो दंपति होते थे बच्चों के निर्माण में पूरा प्रयास किया करते थे लेकिन अब क्या हो रहा है वह देखने वाली बात है महिलाओं को क्या करना पड़ता है घर में रहकर के बच्चों पालन पोषण करना पड़ता है या अपना पूरा समर्पण करके परिवार का निर्माण करना पड़ता है ये जो सशक्तिकरण है हम इसे दो रूप में बांट सकते हैं एक है गांव का सशक्तिकरण एक होता है शहरी सशक्तिकरण गांव में क्या चीजें हैं भाई महिलाएं जो है वो पर्दे से दूर रहे महिलाएं दहलीज पार कर सके महिलाएं शिक्षित हो सके या परिवार में अपना निर्णय ले सके किसी भी विषयों पर या समस्याओं पर इसके अतिरिक्त जो शहरी जो अ सशक्तीकरण है वह क्या है कि हम अपने अनुसार कपड़े पहन सके हम अपने अनुसार उठ सके बैठ सके बोल सके यहां तक कि शब्दों का भी सशक्तिकरण हो गया है चर्चा चल ही रही थी जैसे कि अगर कोई प्रोफेसर यूनिवर्सिटी में बैठकर बोलता है प्रिय छात्रों वो प्रिय छात्राओं भी बोल स बोले तब जो है वो समानता का अधिकार होगा इसी तरह से जैसे पहले बहुत सारे शब्द ऐसे हैं जो पुरुषवाचक थे उसको अब महिला वाचक भी बना दिया गया ताकि हमें समानता मिल सके तो परिवार को जो महिला अपना सर्वस्व समर्पण करके पालन पोषण करती थी अब वो स्थिति धूरे धीरे-धीरे परिवारों के टूटने से बिखरती सी जा रही है इसमें क्या होता है महिलाएं क्या किया करती थी पहले समय में क्या होता था भोजन महिला बनाती थी और सबसे बाद में खाती थी आज का जो शहरी सशक्तिकरण है वो यह कहता है क्या महिला साथ नहीं खा सकती क्या महिला पहले नहीं खा सकती क्या हम सबसे निचले स्तर पर आते हैं या मैं दोयम दर्जे की हूं तो ऐसा नहीं था आप इसे दूसरी दृष्टि से देखिए मेरे परिवार में भी मेरी मां भी बाद में इसलिए खाया करती थी कि मैंने जो भोजन की व्यवस्था की है वो व्यवस्था कम ना पड़ जाए सबके लिए भोजन पूरा हो जाए कोई अतिथि आ जाए कोई बाहर से आगंतुक आ जाए कोई भी पशु भी है सबको भोजन पर्याप्त मिले उसके बाद मैं खाऊं ऐसी मां मतलब मां की जो भावना हुआ करती थी पिता का क्या होता था भाई जो पिता है वो कमा रहा है व अपने घर में जो भी कमाई करके ला रहा है सबका पूरा जो भी खर्च है अन्न का भोजन का वस्त्रों का जिस भी चीज में बच्चों की शिक्षा का बूढ़ों की औषधि का जो भी खर्चा है वह पूरा हो जाए उसके बाद कमाने वाला जो घर का पुरुष होता था वह अपने लिए कुछ खरीदता था या लाता था तो ये एक व्यवस्था होती थी कि महिला जो है अपना पूरा कर्तव्य का निर्वाण करते हुए परिवार का पोषण कर रही है और पुरुष अपने कर्तव्य का निर्वाण कर रहा है लेकिन वर्तमान समय में जो सशक्तिकरण सशक्तिकरण रूपी जो भवन है इसके जो स्तंभ होने चाहिए थे वो स्तंभ ही अब भवन बन गए हैं वो स्तंभ ही हम नीव बन गए हैं जैसे आर्थिक सशक्तिकरण महिलाओं को लगता है मैं कमाऊ गी मैं अपने पैसे रखूंगी मेरे हाथ में पैसा होगा तो मैं खुद ही कमाऊ आर्थिक सम मतलब आर्थिक समर्थ होना आर्थिक रूप से सामर्थ्य महिलाओं के पास होना यह केवल एक स्तंभ था सशक्तिकरण का वो आर्थिक उसके पास धन भी हो या वो इस रूप में शिक्षित हो यदि पति को कुछ हो जाए या पारिवारिक स्थिति इस रूप में पहुंच जाए कि उसे कमाने के लिए बाहर निकलना पड़े या कमाने के लिए कोई कार्य करना पड़े घर से कोई व्यवसाय चलाना पड़े वोह उसके लिए हर समय तैयार रहे तो आर्थिक जो सशक्तिकरण है वह एक स्तंभ था लेकिन उसको भवन बना दिया जब महिला घर से कमाने के लिए निकलती है तो जो बातें आप लोग के सामने सभी वक्ताओं ने यहां पर रखी वो सारे दुर्गुण हमारे समाज में आते हैं और वो विनाश का कारण बनते हैं और वो विनाश जो है वो दिखाई नहीं देता शरीर के कैंसर के तरह होता है दिखाई नहीं देता किस रूप में जब आप बाहर कमाने जाते हो तो सही दृष्टि से बताती हूं मैं अगर बाहर कमाने जाती हूं तो मैं सवारी लेती हूं अपने स्थान पर पहुंचती हूं वहां जाकर परिश्रम करती हूं थक जाती हूं घर आती हूं तो मैं इस अवस्था में बिल्कुल शेष नहीं रहती कि मैं आकर के परिवार की चीजों का भी पालन पोषण परिवार की चीजें भी व्यवस्थित कर सकूं तो यहां पर क्या होता है जब दोनों ही कमाते हैं तो पुरुष तो अपनी कमाई का हिस्सा घर में देगा पुरुष की कमाई से घर चलेगा और महिला जो कमा रही है उससे वोह केवल अपने श्रृंगार करेगी केवल अपने आभूषण बनाएगी अपने कपड़े बनाएगी महिला जो कमा रही है उससे वो केवल अपना ही तो पोषण कर रही है ऐसा इस रूप में तो बहुत ज्यादा नहीं कमाती या सहयोग नहीं बड़ा कुछ लेना होगा घर लेना होगा गाड़ी ले कुछ भी करना होगा तो पुरुष के हिसाब से वैसे तो समान रूप से महिलाएं अधिक कम माती है तो यह सब चीजें भी अपनी भी पूर्ति करती हैं घर लेना गाड़ी लेना मैं यह नहीं कह रही हूं लेकिन एक परिवार में अगर आप मिडिल क्लास फैमिली में अगर महिलाएं इस रूप में कमा रही हैं तो जो उनका मुख्य कर्तव्य था मातृत्व वाला जो कार्य था बच्चों को संस्कारित करने वाला जो कार्य था वो पीछे हट जाता है पीछे हट जाता है मतलब वो बैलेंस बिगड़ जाता है और जब बैलेंस बिगड़ता है तब इस तरह की चीजें बहुत ज्यादा होती है कि दोनों लोग जब कमा रहे हैं वो समझती है कि मैं सामर्थ्य शालिनी हूं मैं क्यों इसके पैसों की धोस देखूं या इससे क्यों मांगू और जब हम विचारधारा में आर्थिक रूप से एक समान नहीं रहते तो परिवारों में यह स्थिति बहुतायत पैदा होती है कि तलाक वाली स्थिति बनती है या मनमुटाव वाली स्थिति बनती है और जब हम समाज का ये जो परिवेश आज तैयार हो रहा है भा बाह्य संस्कृति का बाह्य सभ्यता वाला तब इस तरह की विडंबना ज्यादा देखने को मिलती हैं कि हम लोग अपने माता-पिता का जो तपस्या रही है परिवार को बनाने में उसे नहीं देखते हैं और इन व्यवहारों में क्या होता है सबसे बड़ी कमी जो मैं प्राय मंच से कहती हूं वो माता-पिता की भी रहती है जब बच्चे सुनना छोड़ देते हैं तो माता-पिता कहना भी छोड़ देते हैं हम मैं जब मैं मंच से उतरती हूं तो माताएं कहती है आपकी बात बिल्कुल ठीक लगी आपने बहुत अच्छी बात कही आपका तरीका भी ठीक था लेकिन मेरी बहू तो ऐसी है सुनती नहीं है यह नहीं है फिर हम कहते नहीं है हमें फिर कोई उनसे मतलब नहीं है आपको मतलब जो माता-पिता है जो बूढ़े दादा दादी है वो कहना यदि नहीं छोड़ते हैं तब हमारे परिवारों में हम उन्हें कहना ना छोड़े हम उन्हें समझाना ना छोड़े तो इस तरह की स्थिति नहीं बनेगी कि बच्चों को अलग-अलग रहना पड़े कि इतना तो मैं कमाने लगी हूं अपने बच्चों को साथ रखूं और दूसरी बात जो चरित्र शिक्षा की बात चल रही थी तलाक का सबसे बड़ा कारण आजकल यह भी बनता है कि जो चारित्रिक दोष हमारे परिवेश में परिवारों में व्यक्तिगत रूप से आ गए हैं कि अभी बताया गया कि वो अपना संबंध बाहर किसी से रख रही है या पुरुष अपना संबंध बाहर किसी से रख रहा है घर में बच्चा जो है वह मेड़ के हाथ में सौंप रखा है कैमरा लगा रखा है घर में मेड़ को कैमरे से देख देख रहे हैं और मेड़ कैमरे में कैसे-कैसे पाल रही है उसको कैमरे में इंस्ट्रक्शन दे रहे हैं ऐसे मत करो वैसे मत करो तो फिर वो बच्चा मां को मां कैसे कहेगा भारत मां को मां कहना तो बहुत दूर की बात है तो परिवारों को परिवार बनाना ये वास्तविक रूप से सशक्तिकरण है महिलाएं भले ही समाज में कितना भी काम करें आज परिस्थिति बदलती है युगों में नहीं वर्षों में नहीं अब तो महीनों महीनों में बदल जाती है तो परिस्थिति बदल रही है उनके अनुसार हम आधुनिक हो रहे हैं उनके अनुसार हमारे पास सारी सुख सुविधाएं भी है आधुनिक उपकरण भी हैं लेकिन उन आधुनिक उपकरणों के होते हुए उस शिक्षा आधुनिक शिक्षा के होते हुए भी हमें व्यक्तिगत रूप से अपने परिवारों की परिस्थिति को देखते हुए सबकी परिस्थिति अलग-अलग होती है व्यक्तिगत रूप से अपने परिवारों की परिस्थिति को देखते हुए उन निर्णयों को लेने की आवश्यकता है कहीं मेरी बहू अपनी कंपनी में अपने बोस से इतनी परेशान तो नहीं है कि वह अपने पति से दूर जा रही है या मेरा बेटा परिवार के पालन गया इनके शौक पूरे करने में में एक मानसिकता अपनी खराब तो नहीं कर रहा है तो यह सब चीजें हमें सबको पारिवारिक स्तर पर देखनी है बहुत बड़ा बड़े उदाहरण ना देते हुए यदि मैं आज इस मंच पर बैठी हूं मैं यदि इस मंच पर बैठी हूं तो किसी ने मुझे यह नहीं कहा जाओ देवी तुम साक्षात विद्या की मूर्ति हो चलो मंच पर बैठो नहीं मेरा भी परिवार है पति देव है दोदो बच्चे हैं मेरी मां भी है पिताजी हैं परिवार है पूरा मैंने उन्हें ये समझाया है यह परिस्थिति घर में बनाई है उन्हें यह बताया है कि मैं इस यह मेरी शिक्षा है यह कार्य मुझे करना है इस कार्य को करने के लिए मुझे यह ये आपका सहयोग चाहिए होगा वो मुझे अपना 100% तब देते हैं जब मैं 1000% अपना समर्पण उनके प्रति देती हूं उनके कार्यों के प्रति देती हूं ऐसा नहीं कि वो सेवक की तरह मेरे लिए लगे रहते हैं मेरे बच्चों को संभालते हैं इतने छोटे हैं कि अभी विद्यालय भी स्कूल भी नहीं जाते हैं तो कहने का मतलब यह है अगर आपको बाहर कमाने जाना है तो किध भी शर्तों पर नहीं बल्कि सशर्त इस बात पर जाना है या जो भी आपको अपनी उन्नति करनी है या जो भी कार्य करना है पढ़ना है जो भी चीजें करनी है वो इस शर्त पर कि आपके जो माता-पिता है वही आपके बच्चे का परिवार का संपत्ति का रक्षा ध्यान अच्छे से रख सकते हैं ना कि कोई सेवक और सेविका तो ये माहौल आपको परिवार में क्रिएट करना पड़ता है उन्हें समझाना पड़ता है उनके सामने ये उदाहरण रखने पड़ते हैं उनका धन्यवाद ज्ञापन करना पड़ता है उनके प्रति आभारी कृतज्ञ होना पड़ता है कि आप मेरे लिए कुछ कीजिए मैं आपके लिए सब कुछ करूंगी क्योंकि महिलाओं की विशेष रूप से बात चल रही है आप वो माता-पिता आपके लिए करने के लिए तत्पर रहते हैं यदि हम ये भाव अपने अंदर जगाएं तो तलाक का मुख्य कारण यही होता है कि सशक्तिकरण के जो स्तंभ हैं हमने उनको ही भवन मान लिया है यदि उन स्तंभों से उन शिक्षा को उन आर्थिक को सामाजिकता को परिवार को उन स्तंभों को मजबूत बनाते हुए हम अपना भवन तैयार करें तो ये तलाक जैसी स्थिति अलग रहने जैसी स्थिति और यह जो मानसिकता है लिविन में रह रहे हैं बच्चे नहीं करेंगे जैसी स्थिति और यह जो मानसिकता है विवाह नहीं करेंगे इस तरह की जो स्थितियां है वह पैदा नहीं होंगी और हिंदू जो समाज है हिंदू जो राष्ट्र है वह उसी रूप में बना रहेगा ऐसा मेरा मानना है बहुत बहुत धन श्रद्धा जी की दो महीने की बिटिया है मीनाक्षी जी से मेरा सवाल है कि हम देखते हैं महिलाएं हैं जॉब करना चाह हैं कुछ पति-पत्नी है जो जॉब करना चाहते हैं तो आने वाली जो उनकी संतान होगी उसका निर्माण कैसे होगा सबसे पहले तो मैं बहुत देर से एक चीज ऑब्जर्व कर रही थी मैं जभी भी किसी मैं मेरे को बहुत समय नहीं हुआ है इन सिद्धांतों को जाने हुए इस समाज से जुड़े हुए लेकिन जब भी मैं किसी मंच पर जाती हूं या मैं किसी को देखती हूं तो मुझे कोई युवा नहीं दिखाई देता है मुझे बुरा लगता है ऐसा नहीं है कि युवाओं तक ये बात जा नहीं रही है मुझे युवा दिखाई नहीं देता मुझे लगता है कि यह सिद्धांत इतने इंपोर्टेंट है कि ये युवाओं तक जाने चाहिए पर कहीं ना कहीं ये ऐसा कमी रह जाती है मुझे ऐसा लगता है मुझे कमी खलती है तो मुझे तो ज्यादा समय नहीं हुआ मुस्कान जी भी हम बहुत छोटे हैं और जितने भी यहां बैठे हैं उन सबसे मुझे लगता है हम बहुत छोटे हैं तो जैसे इन्होंने प्रश्न मुझसे किया प्रश्न बच्चों के लिए जो पूछा तो एक जो समय आया था बीच में जैसे नारी सशक्तिकरण की जो बात हो रही है एक काल जो बीच में आया था तो उस काल में बेटियों को वेदों से दूर कर दिया इसलिए व नावेद हो गई और जावेद के करीब हो गई और वो जावेद को अपना बिल्कुल पूरा हमसफर मानती है और माता-पिता को बेवकूफ समझती है है ना तो वो मुझे लगता है व एक एलिमेंट शायद इन्होने छोड़ दिया है श्रद्धा जी ने बहुत अच्छा बताया लेकिन एक जो इसका कारण है यह लव जिहाद और यह जो डाइवोर्स जो इसका कारण है एक कारण यह भी है हम टेलीविजन को भूल जाते हैं आज जो यूथ है यहां बैठे हुए कम लोग चलाते होंगे सोशल मीडिया लेकिन यूथ जितना भी है इंडिया या इंडिया से बाहर भी 80 प्र youtube0 पांच शादियां सासू की हो जाती है और चार पांच बहू की हो जाती है ठीक है डाइवोर्स नहीं होंगे तो क्या होगा उनको देख उनको लग रहा है कि अच्छा इसका हमसफर दूसरा वाला नया वाला आ गया ऐसे तो हमारे जीवन में भी आ सकता है तो ये ये एक बहुत बड़ा कारण है ये हंसी की बात नहीं है मैं सच बता रही हूं ये बात सोशल मीडिया पर हम देख रहे हैं जो कुछ भी हम देख रहे हैं आज अगर किसी एक एक बड़ा जरिया है कमाने का देख रहा है कि सोशल मीडिया प क्या परोसा जा रहा है और कैसे हम कमा सकते हैं तो वो भी प्रयास करेगा आप लाइक दे ही क्यों रहे हो आप ऐसी लड़कियों को देख ही के रहे हो आप 10 दिन एक एक जैसी रील देखिए आप सनातन धर्म के ऊपर रील्स देखिए या सनातन धर्म के ऊपर कोई शॉर्ट्स देखिए वीडियो देखिए तो 11वें दिन आपके मोबाइल में वही चीजें आएंगी आपके सामने वो अध नंगी लड़कियां सिर्फ इसलिए आ रही क्योंकि आप देख रहे हो आप देख रहे हो इसलिए आ रही है आप लाइक फॉलो कर ही क्यों रहे हो नहीं करोगे तो आगे भी कुछ नहीं होगा आप देख रहे हो कर रहे हो इसलिए वो भी बनाने का प्रयास कर रही है वो वहां से कमाने का वो सोर्स है लड़कियों का मुझे लगता है जो लड़कियां ये लव जिहाद के चक्कर में फंसती हैं जो ल शायद उनको अपना इतिहास नहीं पता उनको नहीं पता लक्ष्मीबाई कौन है उनको नहीं पता जीजाबाई कौन है उनको नहीं पता कर्णावती कौन है किरण बाई सा कौन है किरण सिंहनी सी चढ़ी उर पर खींच कटार अकबर मांगे भीख दोनों हाथ फसार ये किरण बाई साथी जानते ही नहीं है शायद वो अपना इतना अनमोल इतिहास नहीं जान जानती है इसलिए वो अब्दुल के चक्कर में फंसती है मुझे ऐसा लगता है ठीक है वो नहीं जानती जीजा मां माता जीजा बहन ने बोला कि शिवा छत्रपति शिवाजी है इसलिए क्योंकि जीजा मां जैसी प्रेरणा करने वाली उनके साथ थी प्रेरणा करने वाली माता होनी चाहिए माता निर्माता होनी चाहिए मैं मानती हूं कि आज का युग ऐसा है कि जो ये जनरेशन चल रही है सोसाइटी में ये और इतना महंगाई जो हो गई है कि अगर माता कमाएंगे तो ही चल पाएगा शायद एक जो मिडिल क्लास है या फिर जो बहुत निम्न स्तर का जो घर है जहां नहीं है ज्यादा सुविधाएं तो अगर माता कमाएंगे तो ही कुछ चल सकता है लेकिन निर्माण की जो बात आती है अगर आप एक कमजोर परिवार जो तो आर्थिक थोड़ा कमजोर है उनके बच्चों को जाके देखोगे तो उनके बच्चे में तो कोई ऐसा नहीं हो रहा है कि वो लिविन में रह रहे हैं या वो समलैंगिक हो रहे हैं उनके बच्चों में तो उनको सिर्फ एक चीज दिखाई दे रही है कि कमाना कैसे है आज मेरे माता-पिता इस हालत में तो मुझे कैसे कमाना है मुझे कैसे आगे बढ़ना है तो वही स्त्रियों को भी सीखना व नारी सशक्तिकरण की बात कर रहे हैं तो क्या वो देख नहीं रही है कि जिस अब्दुल के पीछे मैं पागल हूं जिस अब्दुल के पीछे मैं पागल दिख रही हूं अगर उसके साथ मेरे पिता ने या मेरी माता ने मुझे देखा तो उनको उनके हृदय पर क्या बीतेगा उनको कैसा लगेगा वो सोच नहीं पाती है क्योंकि उन्होंने वो इतिहास पढ़ा नहीं है एक मनु बाई थी लक्ष्मीबाई जब पिता के जब भाई आया और वो तलवार चला रही थी तो भाई ने उनकी तलवार गिरा दी वो पिता के पास रोती हुई जाती है कि मेरी भाई ने तलवार गिरा दी मुझे अच्छा नहीं लगा तो उन्होंने कहा कि तुमने गिरने ही क्यों दी ये चीज तुम्हारी थी तुमने अपनी चीज गिरने ही क्यों दी उसके हाथ तुम्हारी चीज पढ़ी क्या तुम्हें अपनी चीज लेने कैसी दी उसको वही मनु बाई सा बनी लक्ष्मी बाई तो वही बड़े हो के कहते कि मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी ऐसा प्रेरणा करने वाला माता-पिता होना चाहिए ऐसे प्रेरणा करने वाले माता-पिता होने चाहिए जो अपनी बेटी को लक्ष्मी बाई बना सके जीजाबाई बना सके किरण बाई सा बना सके कर्णावती बना सके जो नीरा आर्य जैसी औरतें निकले ऐसा साहस माता-पिता में होना चाहिए और बिल्कुल ठीक बात है कि माताएं नहीं ध्यान दे पाती हैं निकल घर से जा रही हैं तो लक्ष्मीबाई के पास भी ऑप्शन नहीं था उन्होंने बांधा था ना कंधे पर तो वही कंधे पर बांध कर चलना पड़ेगा आपको युद्ध भी लड़ना पड़ेगा और बच्चे को कंधे पर बांध कर भी चलना पड़ेगा करना पड़ेगा यह आपका दायित्व है आज बोल देते कि माता और पिता इक्वल है नहीं है बिल्कुल भी इक्वल जब उस ईश्वर ने भेद किया तो हम कौन है हम इक्वल नहीं है बल्कि तुम्हारा दर्जा ऊंचा है मुझे लगता है कि माता निर्माता थी इसलिए पहले बच्चों से पहले उनका नाम लगाया जाता था हम सुनते हैं कि देवकी नंदन कृष्ण है ना यशोदा नंदन कृष्ण हम देखते हैं कुंती नंदन अर्जुन हम देखते हैं कौशल्या नंदन राम तो शायद माता पहले निर्माता थी इसलिए उनका नाम पहले लगाया जाता था आज माता निर्माता नहीं है और इक्वलिटी उनको ना थोड़ा सा एक पुरुष समाज ने ऐसा भी किया बीच य मिडल जो आया था काल जो आया था इसमें ऐसा भी हुआ कि माताओं को थोड़ा सा नीचा दिखा दिया गया उनको एक उनको क्योंकि वो ऊंची थी उनको नीचे लाने के लिए उ उन्होंने क्या किया एक कि देखो अरे बताओ तुम्हारे साथ कितना अत्याचार तुम्हें बच्चे पैदा करने पड़ते हैं ये ये इक्वलिटी में यहां तक आ गई यहां तक घुस गई वो इक्वलिटी में लाने के लिए तो उन्होंने कहा अरे बताओ तुम्हें पैदा करने पड़ते हैं बताओ तुम्हें पालने पड़ते हैं बताओ तुम्हें मेहनत करनी पड़ती है बताओ पुरुष तो कोई नहीं कर रहा ऐसा तो उन्होंने लगा हां बात तो ठीक है हम बच्चे पैदा करें तो सरोगेसी आ गया हम नहीं अपना हमारा शरीर खराब होता है ऐसे हम बच्चे नहीं पैदा करेंगे तो ये ये कहां से आ रही है ये उस समाज के द्वारा लाया गया था ये चीज तो माता निर्माता रही नहीं आज माताओं को देखो सोशल मीडिया पर टीवी पर वो कैसी माताएं हो गई है और बच्चा उनको देख रहा है एक मां बैठी है पास में और बच्चा बैठा है वो देख रही है वो टी उसमें अनुपमा चल रहा है तो माता भी तो वही ग्रहण कर रही है ना और बच्चा भी वही ग्रहण कर रहा है उसको दिख रहा है कि एक टीवी में बच्चा ग्लैमरस लाइफ जी रहा है मैं भी अपने बच्चे को वैसे ही ग्लैमरस लाइफ देना चाहती हूं तो मैंने एक बच्ची की बात सुनी वो क्या कहती है कि मेरी जो बुआ है वो अपनी बच्ची से कहती है कि ये जो स्कर्ट है ना इसको थोड़ी सी ऊंची और करो क्योंकि हम ऐसे पार्टी में जा रहे हैं तो वो उसको ऐसे कह रही है कि मेरी जो बेटी है वो उस पार्टी के अनुसार हो इसलिए स्कर्ट को थोड़ी और ऊंची कर ले ये माता है ये कहां से निर्माता बनेगी ये माता नहीं बन सकती निर्माता क्योंकि वो भी उस अनुपमा को सीरियल को देख रही है उसमें ग्लैमरस बच्चा दिख रहा है तो वो उस ग्लैमरस को बच्चे को देखकर अपने बच्चे को भी ग्लैमरस लाइफ देना चाह रही है तो ये ये खराब है ये यहां से माता निर्माता नहीं बन सकती और जैसे बात करी कि कैसे संभाल सकते हैं तो आपको लक्ष्मीबाई बनना ही पड़ेगा आपको अपने बच्चे को अगर आपकी ऐसी स्थिति नहीं है कि आपको जाना ही पड़ेगा घर से बाहर आपको करना ही पड़ेगा और एजुकेशन बहुत जरूरी है माता की बहुत जरूरी है एजुकेशन ये नौकरी करें या ना करें लेकिन एजुकेशन बहुत जरूरी है क्योंकि आपके साथ बच्चा ज्यादा जुड़ा हुआ है माता के साथ ज्यादा जुड़ा होता है ना तो मैं वैसे ही कह रही हूं कि माता को लक्ष्मी भाई बनना पड़ेगा और बच्चे को कंधे पर बांधकर चलना ही पड़ेगा यह आपका दायित्व है और आपको संभालना ही पड़ेगा धन्यवाद बहुत अच्छा मेरा आखरी सवाल आयुषी दीदी से है कि हमने बात की महिला सशक्तिकरण की कि महिला सशक्तिकरण क्या है कैसा था या इसकी आवश्यकता क्यों है पर हम अपने समाज में चेंजेज ला कैसे सकते हैं क्योंकि बात हर जगह हो रही है पर भू हत्या भी हर जगह हो रही है रेप हर जगह हो रहे है तो इस चीज को हम कैसे कंट्रोल कर सकते हैं उसके लिए हमें क्या कार्य करने की आवश्यकता है देखिए जापान और कोरिया अच्छी कार बना सकते हैं लेकिन अगर कोई संस्कार दे सकता है तो वह भारत दे सकता है तो सारी समस्याओं का समाधान चाहे वह भ्रूण हत्या हो चाहे वह रेप केस हो चाहे वो कुछ भी समस्या हो सबका समाधान है संस्कार और अभी बहुत सारे प्रश्न चल रहे थे मैं कई प्रश्नों का उत्तर सामने बैठे भाई का उदाहरण देकर देना चाहूंगी फस से जुड़े हैं शायद विकास नाम है मैं अगर गलत नहीं हूं तो भाई बहुत देर से बैठे हैं अभी हमारे यहां तलाक की भी बात हुई मैं सारे समस्याओं को समेट होंगी अभी नौकरी की भी बात हुई कि महिला नौकरी कैसे करेगी तो घर कैसे संभले पहले हमारे यहां आठ और 60 की परंपरा थी आठ का अभिप्राय है कि आठ का बच्चा घर में नहीं रहेगा 8 साल के बाद बच्चा गुरुकुल जाएगा 60 के बाद आपको वानप्रस्थ सन्यास में निकल ही जाना है घर में नहीं रहना जब 8 साल का बच्चा गुरुकुल जाएगा तो गुरुकुल में पलेगा आप विचार करो आज हम कहते हैं हम बराबरी और हम ऊंचे मैं कहती हूं हम कौन थे वही चर्चा जो मैंने पहले शुरू की हम वो थे कि नालंदा तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालय हुआ करते थे जहां 101 हजार विद्यार्थी शिक्षा प्राण करते थे और लोग चलते हुए आते थे तो द्वार प बैठा द्वारपाल भी परीक्षा लेता था हम इतने उन्नत थे अभी हम कह रहे थे कि घर कैसे संभले का घर कैसे संभले का या परिवार क्यों टूट रहे हैं इसका कारण यह है कि हम या तो पति पर जिम्मेदारी डालते हैं या पत्नी पे डालते हैं या सास पर डालते हैं या नंद पर डालते हैं पूरा परिवार मिलकर जिम्मेदारी निभाने का प्रयास नहीं करता समस्या तभी उत्पन्न होती है पहला तो अभी संपत्ति का आचार्य कल्पना जीने उदाहरण दिया कि ऐसा संपत्ति का बंटवारा कर दिया कि नंद का पूरा अधिकार है कई पीढ़ियों बाद भी तो समस्या वहां उत्पन्न होती है या बच्चा पालने का अधिकार केवल माता का है या कर्तव्य माता का है अभी भाभी जी आई जैसे अंदर प्रवेश किया आके भैया को बच्चा दे दिया इसका मतलब आपकी भी जिम्मेदारी है देखिए सामने उदाहरण है और भैया ने बड़े प्यार से संभाला भी अगर दोनों मिलके संभालेंगे आप विचार करो क्या परिवार में समस्या होगी नहीं हो सकती लेकिन भाभी जी बच्चा पति को दे और इनकी माता जी कहे तुम बच्चा संभालोगे तुम्हारा यही काम है बड़े पत्नी के गुलाम हुए घूमते हो तो आप समझ लीजिए समस्या यहीं से शुरू हो जाएगी अगर सुधार करना है तो कोने कोने में सुधार करो तब जाकर के परिवर्तन होगा यह परिवर्तन हमारे अंदर से प्रारंभ होगा आप विचार करो इतना सशक्तिकरण हम इतने लोग बैठे हैं क्यों परिचर्चा कर पा रहे हैं क्योंकि अंकुर भाई ने विचार किया कि इस बार ऐसा होना चा तभी तो हम यहां बैठे हैं ना हम कहते हैं एक सफल पुरुष के पीछे एक नारी का हाथ होता है मैं कहती हू इतने सारे बैठे कहीं ना कहीं उनके प्रयास के कारण इतने सारे लोग एकत्रित है वरना एक मंच में इतने लोग तो मिल नहीं सकते तो उन्होने कहा ना कि आप आगे बढ़ हमारा समाज अगर हम संस्कारी रहेंगे अगर हम परिवार के अंदर रहेंगे तो भी हमारा समाज आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है और दोनों ही चीज स्वीकार्य है कई जगह बेटियों को मार दिया जाता है पता लगा दोबारा समझा के भेज दी गई आज आसपास की घटनाए पता लगा उसको मृत्यु के घाट उतार दिया अब लड़ते रहो केस तो दोनों ही परिस्से श्रद्धा जी ने कहा कि परिस्थिति के अनुसार हो सकता है सच में उसके साथ गलत हो रहा हो तो अपने बच्चे को हृदय से लगाओ क्योंकि आपका जन्म अनमोल है आपको केवल इसलिए नहीं मिला दिया गया कि हम फलाने के साथ शादी कर रहे हैं समलिंग में करेंगे फलाना करेंगे ढिकाना करेंगे इतनी सारी समस्याए उत्पन्न कर दी गई गृहस्थ को आश्रम कहा गया तपस्या का गया सब आश्रमों का मूल कहा गया और आज हमने उसको भोग का साधन बना दिया समस्या यहीं से उत्पन्न हुई जिनसे हमें प्रेरणा लेनी थी जिन योगीराज श्री कृष्ण चंद्र जी महाराज को आदर्श मानना था आज उनको क्या बना के रखा यह विचार तो करो गृहस्थ की प्रेरणा लो ना कृष्ण जी महाराज से 12 वर्ष तक तपस्या करी थी आज कितने ही उनके नाम पर दुकाने चलाओ आडंबर चलाओ सत्य मत बताओ लेकिन 12 वर्ष तपस्या करके माता रुक्मिणी से एक पुत्र उत्पन्न हुए थे जिनका नाम था प्रद्युमन और जब प्रदुमन चला करते थे तो लोग पहचानते नहीं थे कि कृष्ण है कि प्रद्युमन है यह होती है तपस्या उनको क्या बना दिया एक बस लिया बना दिया रास रचाने वाला और अभी मैंने कमेंट कर दिया आप क्या थी आप कैसे बोलती थी आज आप क्या हो गई मैंने कहा मैं वही थी जो आज हूं तुम समझ गलत पाए हो गलत दिशा में पकड़ लिए हैं मतलब अभिप्राय यह है मीठा मीठा तो अच्छा है जो कड़वा है वो थू जिनको आदर्श मानना था जिसको योद्धा मानना था उनको आपने क्या बना के रख दिया हमारे आदर्श क्या होंगे एक एक साथ में लेकर अगर आपके बेटे भी घूमेंगे तो स्वीकार करेंगे ना जी वो तो भगवान थे तो महापुरुष होते इसलिए है कि उनसे प्रेरणा ले सके अगर हम उनसे यह प्रेरणा लेंगे तो कैसे चलेगा देश तो अगर हमारे संस्कार ठीक नहीं होंगे रेप केस क्यों हो रहा है राह चलती बच्ची सुरक्षित क्यों नहीं जिस देश के लिए मनु महाराज ने कहा था त देश प्रसूत सका दग जन्मन स् चरित्रम शिक्ष पृथ्वी सर्व मानवा इस भारत देश से पूरी पृथ्वी के मानवों को गांव नहीं का शहर नहीं का मोहल्ला नहीं का इसीलिए कहती हूं हम कौन थे हम वो थे कि पूरी पृथ्वी के मानव को अपने अपने चरित्रों की शिक्षा लेनी चाहिए हम वो थे हम वो थे जो पद्मिनी को शीशे में दिखाने के लिए हड़ जाया करते थे नहीं देखोगे तुम विदेशी आक्रांता में रहो हमारी बह बेटियों पर नजर डालने की कोशिश मत करना नजर छीन ली जाएंगी लेकिन आज आज तो रील्स पर खुद ही ठुमके लग रहे हैं समझ में ही नहीं आता जिनको देने के देखने के लिए पैसे खर्च करने पड़ते थे आज फ्री मेंही मनोरंजन हो रहा है उपभोग की वस्तु आपने बनाया क्या दोष देना पुरुषों को नारी को उपभोग की वस्तु कौन बना रहा है हम अपने को उपभोग प्रस्तुत करेंगे तो क्यों नहीं बनेंगे उपभोग एक वो रानी पद्मिनी थी मैं तो आज हमास और ल का युद्ध देख रही हूं तो मुझे समझ में आता है कि उन्होंने क्यों यह सोचा होगा कि जोहर किया जाए मेरे मरने के बाद भी मेरे शरीर को ना छुपाए कहा था ना झांसी की रानी ने भी मरने के बाद भी मेरे शरीर को ना छू पाए क्या स्वाभिमान था वो स्वाभिमान था कि रानी पद्मिनी को शीशे में देखने पड़ा था बस शीशे में दिखा दो 16000 रानियों ने जोहर किया था आज बकवास करते हुए फु की दुनिया में बोल तो देते हैं जोहर कायरता थी मैं कहती हूं मोमबत्ती में जरा हाथ तो लगाओ फिर बताएंगे जोहर क्या था 16 हज रानिया जल के जिस देश में मरी हो स्वाभिमान के लिए उस देश में जब रील्स पर दुष्टता करती हुई बेटियों को आदर्श बांधते हुए समाज को देखोगे तो रेप नहीं होगा तो क्या होगा बात कड़वी है लेकिन याद रखिए ज्यादा मीठा खाने से शुगर हो सकता है इसलिए नीम का काम भी जरूरी है तो यह रील जो हम चला रहे क्या संस्कार देंगे बच्चों को क्या समझाएंगे बच्चों को सीरियल देखेंगे एक शादी हुई नहीं दूसरी पहले चल जाता है दो शादी चार शादी एक अफेयर के बिना तो चल ही नहीं सकता इसी ने तो बिगाड़ा है हालांकि आजकल लाइन पर है जितनी मोटी बिंदी उतनी खराब महिला यही करते हैं ना जितने पंडित जी उतने ही खराब यही तो दिखाया जाता है ना क्यों नहीं कर सकते दूसरों का अपमान क्योंकि कमजोर को सब मारते हैं मजबूत को हाथ लगा के दिखाओ ना नहीं कर सकते कमजोर वीर भोग्या वसुंधरा बड़ी बड़ी बातें करते हैं लेकिन वो मजबूत लाइए सब चेंज होगा सिलेबस चेंज समलैंगिकता की बात केवल नीचे से नहीं हो रही यूनिवर्सिटी में नहीं आप थोड़े दिन रुकिए अभी तो कहां-कहां पद पे पहुंचने हैं वह आप सबको पता है मैं नाम नहीं ले रही मेरी कुछ मजबूरियां हैं वरना आप समझते हैं कि कहां पद पे बिठाने की तैयारी है जिस देश को इतना आदर्श माना गया हो जिस देश को भारत मां कहा जाता हो जिस देश में नारी का इतना सम्मान हो अगर हम सुनते हैं कि हमारी बेटी के 30 टुकड़े करके फ्रिज में रख दिए तो कहीं ना कहीं आत्मा तो रोती है दुख तो होता है और याद रखिए अपने बच्चों को इसी वातावरण में हमने भी भेजना है हम कहीं अंतरिक्ष में पढ़ने नहीं भेजेंगे कहां भेजेंगे इसी वातावरण में तो पड़ेगी हमारी बच्ची कैसे बचा पाओगे इसलिए आज दूसरों के घर में है तो बच जाओ याद रखो जलते घर को देखने वाला फूस का छप्पर आपका है भरी सड़क पे लड़की को चाकू मार दिया गया और जिस दिल्ली को देश की राजधानी कहा जाता है किसी ने रोकने की कोशिश नहीं करी आप विचार करो हम कितने मानव हैं हम कहां मनुष्य हैं विचार तो करो चलते घर को देखने वालो फूस का छप्पर आपका है आग के पीछे तेज हवा है आगे मुकद्दर आपका है उसके कत्ल पर मैं भी चुप था मेरा नंबर अब आया और मेरे कत्ल पर आप भी चुप है तो अगला नंबर आपका है मेरे कत्ल प आप भी चुप है तो अगला नंबर आपका है जागरूक होके लड़ संगठित होके लड़ परिस्थिति के अनुसार जैसा जिसके साथ होता है पहले उसको समझिए अपने बच्चों को संभालिए अगर मेरा बच्चा कहीं जा भी रहा है श्रद्धा जी ने बहुत सुंदर कहा प्रत्येक की परिस्थिति अलग होती है परिस्थितियों को समझ के संभालिए अगर आप ठुकरा देंगे वही है ना लो अछूतों को गले से लगा आर हो वरना ये लाल गैरों के घर जाएंगे अगर नहीं संभालोगे तो दूसरा संभालेगा अपनी बच्चियों को संभालिए संस्कार दीजिए और याद रखिए जिस दिन संस्कार दिया तो आपका बेटा छत्रपति शिवाजी महाराज बनेगा और आपका बेटा श्रीराम बनने का प्रयास करेगा योगीराज श्री कृष्ण चंद्र जी महाराज बनने का प्रयास करेगा तो निश्चित रूप से हमारे समाज में परिवर्तन आएगा एक एक व्यक्ति से राष्ट्र बनता है बस एक घटना कहके वाणी को विराम देती हूं कि एक जंगल में आग लग गई मैं अक्सर कहती हूं कि अकेला क्या कर सकता है मैं कहती हूं अके चना भार नहीं फोड़ सकता लेकिन ढंग से उछल जाए तो बबू की आख जरूर फोड़ देता है तो जंगल में आग लगी तो छोटी सी चिड़िया बड़े-बड़े पक्षी भागने लगे काल्पनिक कथा है तो एक छोटी सी चिड़िया चौच में पानी ला रही है अभी सोचेंगे ना मुल्तान नगर में इतने से लोग बैठे हैं तो क्यासे विचार जाएगा मैं कहती हूं विचार आप कीजिए तो सही शब्द ब्रह्म होता है नष्ट नहीं होता तो छोटी सी चिड़िया पानी ला रही है चौच में हाथी ने मजाक उड़ाया हा हा हा इतनी छोटी सी चिड़िया क्या करेगी तू कुछ नहीं होना तेरे से उसने कहा नहीं मैं इस जंगल जल में रही हूं मैंने इसको गंदा किया है जब इस जंगल का इतिहास लिखा जाएगा तो मेरा नाम आग लगाने वालों में नहीं आग बुझाने वालों में आएगा तो हमारा नाम आग लगाने वालों में नहीं आग बुझाने वालों में आए उसने कहा मैं बहुत छोटी हूं हो सकता है नाम भी ना आए लेकिन अगर नाम भी नहीं आएगा तो आत्मा परमात्मा से मैं नजर मिलाकर कहूंगी जब मेरा देश जल रहा था जब मेरा समाज जल रहा था तो मैं लड़ी संघर्ष किया तो हम सभी संघर्षशील हो तो निश्चित रूप से परिवर्तन होगा मंजिल मिले ना मिले या रखिए मंजिल मिले ना मिले कोई बात नहीं मंजिल की जुस्तजू में अपना कारवा तो हो मंजिल की जुस्तजू में अपना कारवा तो हो धनवाद बहुत-बहुत धन्यवाद अब मैं सुमेधा जी को दो मिनट का वक्त उन्होंने मांगा था तो देना चाहूंगी बहुत-बहुत धन्यवाद मुस्कान बहन समय के बाद भी आपने दिया और अंकुर भाई यहां उपस्थित है हालांकि कविता से मेरा थोड़ा सा जुड़ाव होता है और भाई ने परिचर्चा का हिस्सा बनाया मैं आभार व्यक्त करती हूं जितनी भी बातें यहां हुई है मैं बस दो छंद निवेदित करना चाहती हूं उन सारी बातों को लेकर एक छोटी सी बच्ची जैसे अभी दोनों बहनों ने कहा भाई बच्चियों को सिखाना बहुत आवश्यक है क्योंकि आने वाला निर्माता आने वाली निर्मात्री वही है एक छोटी सी बच्ची थी घर के पास में मेरे और उसकी कविता की एक पुस्तक में पद्मिनी की कविता थी उसने कहा दीदी पद्मिनी कौन है तब मुझे लगा कि छोटे से बच्चे को 10 साल की बच्ची को नहीं पता पद्मिनी के बारे में क्यों नहीं पता कम से कम मेरे संपर्क में है तो पता होना चाहिए उसको पद्मिनी के विषय में बताने के बाद एक छंद हुआ वो छंद मैं निवेदित करना चाहती हूं घूमने भी जाए गर ढूंढ ढूंढ कर दिखाएं हम लोग घूमने भी जाते हैं कई जगह तो माता-पिता बर्फ दिखाना चाहते हैं हिल स्टेशन दूसरी जगह दिखाना चाहते हैं मुझे लगता है मैं बताना चाहती हूं क्या दिखाना आवश्यक है घूमने भी जाए घर ढूंढ ढूंढ कर दिखाए खून से रंगी वो बलिदान की निशानियां तीज व त्यौहार पर पूजा पाठ मंत्र तंत्र धर्म कर्म वाली भरे रक्त में वानिया कातिल जिहाद रूपी काल से बचाना अभी कातिल जिहाद रूपी काल से बचाना अभी चाहते हैं आप यदि अल्लर जवानिया नन्ही नन्ही बेटियों को नन्ही नन्ही बेटियों को लोरी में सुनाइए जी हाड़ी पद्मिनी वा पन्नाधाय की कहानियां हाड़ी पद्मिनी वा पन्नाधाय की कहानियां और बहुत आभार इस आज का जो शीर्षक है हमने बहुत बात की आज उपनयन के विषय में मंत्र पाठ के विषय में वो अधिकार हमें महर्षि दयानंद दिलाकर गए तो श्रद्धांजलि स्वरूप एक छंद महर्षि दयानंद को निवेदित करना चाहती हूं आ चलो में शीर और नयनों में कहा नीर आ चलो में क्षीर और नयनों में कहा नीर नीर क्षीर बीच निज पहचान खो गई वेद पाठ पुनर विवाह और उपनयन वेद पाठ पुनर विवाह और उपनयन छिने सभी अधिकार लगा विधि सो गई हुआ ऋषि गर्जन विधि परिवर्तन हुआ ऋषि गर्जन विधि परिवर्तन निराशा के बीच आशा चिंगारी बो गई निराशा के बीच आशा चिंगारी बो गई ऋषि ने दिलाए सभी छिने अधिकार फिर ऋषि ने दिलाए सभी छिने अधिकार फिर धन्य धन्य धन्य धन्य नारी जाति हो गई बहुत बहुत धन्यवाद बहुत-बहुत धन्यवाद आज का हमारा विषय को हम यही विराम देते हैं और समाज में इससे परिवर्तन आएगा और नारी सशक्तिकरण को एक अलग दृष्टिकोण से देखा जाएगा तो यह उम्मीद है हमारी बहुत-बहुत धन्यवाद आप सभी का
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😲 अपना Point साबित के लिए इतने कुतर्कआइये कुछ Cross Questions करें।
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