नमस्ते दोस्तों मैं अंकुर आर्य आप सबका स्वागत करता हूं आपके अपने youtube0 सनातन में आज का वीडियो बेहद ही खास है लेकिन उससे पहले मैं आपको एक संदेश देना चाहता हूं आजकल मैसेजेस में कुछ इस तरीके के मैसेज आ रहे हैं आपके दोस्त के नाम से ही मैसेज आएगा कि उसने आपके अकाउंट में 1000 या ₹2000000 कोड ऐसा करते ही आपके अकाउंट से संबंधित जितनी भी जानकारियां हैं व इस लिंक के माध्यम से चोरों तक पहुंच जाएंगी और वह आपके पैसे को आपके अकाउंट से अपने अकाउंट में आसानी से ट्रांसफर कर लेंगे तो आप इस तरीके के किसी भी मैसेज से बचे और इस जानकारी को अपने सभी मित्रों तक पहुंचाएं क्योंकि इसके लिए स्पेशली महाराष्ट्र पुलिस ने अलग से अखबारों में विज्ञापन भी निकलवाया है और इसकी जांच भी चल रही है इसलिए पूरे भारतवर्ष में कहीं पर भी कोई भी हो इस जालसाजी से बचे अब आते हैं आज के मुद्दे पर आज का मुद्दा है कि सुप्रीम कोर्ट ने हमारी सरकार को बोल दिया है कि 90 दिन के अंदर अंदर वह तय करें कि अल्पसंख्यक की परिभाषा भारतवर्ष में आखिरकार है क्या जी हां बहुत दिनों से भारत के बहुसंख्यक हिंदू समाज के लोग इस बात के ऊपर कई सारे पीआईएल जमा कर चुके थे सुप्रीम कोर्ट में आवाज उठा चुके थे इस मुद्दे पर पहल करने के लिए सबसे पहले भारतीय जनता पार्टी के नेता और सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट अश्विनी उपाध्याय जी ने सबसे पहले सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी और उन्होंने कहा था कि लगातार मुसलमानों की जनसंख्या बढ़ती जा रही है और बहुत सारे ऐसे भी राज्य हैं जहां पर मुसलमानों की तादाद बहुत ज्यादा है लेकिन वह अल्पसंख्यक कोटे का पूरा लाभ उठा रहे हैं बहुत सारे ऐसे राज्य हैं जहां पर हिंदू अल्पसंख्यक है लेकिन उन राज्यों में हिंदुओं को अल्पसंख्यकों की कोई सुविधा नहीं मिलती है इस प्रकार से मनमाने ढंग से राज्य सरकारें अपने-अपने तरीके से अल्पसंख्यकों और बहुसंख्यक की परिभाषा को परिभाषित कर रहे हैं जिससे कि पूरे समाज में असमानता फैल रही है और जो सुविधाओं के असली हकदार हैं उन तक सुविधाएं नहीं पहुंच पा रही हैं और सुप्रीम कोर्ट अल्पसंख्यक की परिभाषा और अल्पसंख्यकों की पहचान के दिशा निर्देश तय करने की मांग पर आज सुनवाई भी कर रहा है भाजपा नेता अश्विनी कुमार उपाध्याय ने जनहित याचिका दाखिल करके सिर्फ सिर्फ वास्तव में अल्पसंख्यकों को अल्पसंख्यक संरक्षण दिए जाने की मांग उठाई थी मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ मामले की सुनवाई कर रही है याचिका में मांग की गई है कि राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम नियम की धारा 2 सी को रद्द किया जाना चाहिए क्योंकि यह धारा मनमानी अतार्किक और अनुच्छेद 14 15 और 21 का उल्लंघन करती है इस धारा में केंद्र सरकार को किसी भी समुदाय को अल्पसंख्यक घोषित करने के बहुत सारे असीमित और मनमाने अधिकार मिल जाते हैं इसीलिए अश्विनी उपाध्याय जी ने सुप्रीम कोर्ट में यह बात अपनी रखी है इसके अलावा मांग यह भी की गई है कि केंद्र सरकार की 23 अक्टूबर 1993 की उस अधिसूचना को रद्द किया जाना चाहिए जिसमें कि पांच समुदाय यानी कि पहले नंबर पर आता है मुसलमान दूसरे पर है ईसाई फिर बौद्ध सिख और फिर पारसी इनको अल्पसंख्यक घोषित किया गया था तीसरी मांग यह है कि केंद्र सरकार को निर्देश दिया जाए कि वह अल्पसंख्यक की परिभाषा को तय करें और अल्पसंख्यकों की पहचान के लिए दिशा निर्देश बनाए ताकि यह सुनिश्चित हो कि सिर्फ उन्हीं अल्पसंख्यकों को संविधान के अनुच्छेद 292 में अधिकार और संरक्षण मिले जो वास्तव में धार्मिक और भाषाई सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक रूप से प्रभावशाली ना रहे हो और जो संख्या में बहुत ही कम हो याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय जी ने इस मांग के साथ-साथ वैकल्पिक मांग भी रखी है जिसमें कहा गया है कि या तो कोर्ट स्वयं ही आदेश दे कि संविधान के अनुच्छेद 2930 के तहत सिर्फ उन्हीं वर्गों को संरक्षण और अधिकार मिलेगा जो धार्मिक और भाषाई आधारित आर्थिक सामाजिक राजनीतिक रूप से प्रभावशाली नहीं रहे हैं और जिनकी संख्या राज्य की कुल जनसंख्या की 1 फीसद से ज्यादा नहीं होनी चाहिए और दोस्तों आपको भी पता है कि भारत के अंदर 1 पर से ऊपर सभी वो लोग हैं जिनको आज हम अल्पसंख्याक के तौर पर जानते हैं आपको पता है कि भारतवर्ष में अभी अगर मुसलमानों के आंकड़े सुने जाएं तो मुसलमान 25 प्र से ऊपर हो चुके हैं लेकिन ना ही तो उनके नेता लोग ना उनके जो दीनी आलिम लोग हैं वो लोग भी मना नहीं कर रहे हैं कि भाई अब हम यहां के अल्पसंख्यक नहीं रहे हैं अब हम इस भीख अब हम इस खैरात को नहीं खाएंगे और बल्कि वह बेशर्मी के साथ में इस पूरी लूट को खा रहे हैं जबकि आंकड़ों के अनुसार इस समुदाय का टैक्स पेइंग में एक प्र भी योगदान नहीं है जबकि खाने के मतलब में पूरा अल्पसंख्यक कोटा यही लोग खा जाते हैं और एक्चुअल में जो अल्पसंख्यक हैं जिसमें कि हम सिख ले या बौद्ध ले या जैन या पारसी वो लोग लोग अपने बिजनेसेस में हैं और व लोग टैक्स पे कर रहे हैं लेकिन यहां जो स्थिति विषमता की बनी हुई है वो ठीक उसी तरीके से बनी हुई है जिस प्रकार से हज के क्षेत्र में बनी हुई थी कि जो लोग अच्छे से पे भी कर सकते थे जो लोग ज्यादा पे कर रहे थे बल्कि वो लोग भी हज की सब्सिडी ले रहे थे हालांकि यदि हम दूसरे मुद्दे पर देखें तो इस मजहब में किसी प्रकार की सबसिडी को लेना उसको खाना भी हराम है याच याचिका में सुप्रीम सुम कोर्ट के टीएम ए पाई मामले में दिए गए संविधान पीठ के फैसले का हवाला देते हुए कहा भी गया है कि अल्पसंख्यक की पहचान राज्य स्तर पर की जाए ना कि राष्ट्रीय स्तर पर जो कि अभी मैंने आपको बात बताई थी क्योंकि कई राज्यों में जो वर्ग बहुसंख्यक है उन्हें अल्पसंख्यक का लाभ मिल रहा है याचिका में दोस्तों यह भी कहा गया है कि मुसलमान क्योंकि लक्ष्यद्वीप में अगर आप जाएं तो वहां पर 96 पर से ऊपर मुसलमान रहते हैं जम्मू कश्मीर में अगर आप देखेंगे तो 69 पर मुसलमान जम्मूकश्मीर में रहते हैं लेकिन पूरे भारत के परिपेक्ष में देखते हुए क्योंकि उनको अल्पसंख्यक कहा गया है तो वह अल्पसंख्यक कोटे का पूरा जितना भी रेवेन्यू मिलता है सारा का सारा ही खा जाते हैं अगर आप देखें कि आसाम में 34.2 फस मुसलमान है पश्चिम बंगाल में 27.5 पर मुसलमान है केरल में आप जाएं तो 26.6 पर मुसलमान है उत्तर प्रदेश में तकरीबन लगभग 20 प्र मुसलमान है और बिहार में 18 पर है लेकिन वो लोग फिर भी अल्पसंख्याक का टैग अल्पसंख्याक की तख्ती अपने गले में टांग करके घूमते हैं जबकि जो असल अल्पसंख्यक उन राज्यों में है वो उसका लाभ भी नहीं उठा पाते हैं और सारा का सारा लाभ यही मुसलमान लोग उठा लेते हैं जबकि पहचान ना होने के कारण जो वास्तव में अल्पसंख्यक हैं उनको लाभ नहीं मिल रहा है यह भी कहा गया है कि ईसाई मिजोरम मेघालय नागालैंड में बहु संख्यक हो चुके हैं जबकि अरुणाचल प्रदेश गोवा केरल मणिपुर तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में भी इनकी संख्या बहुत ज्यादा है इसके बावजूद फिर भी इनको अल्पसंख्यक माना जा रहा है तो याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय जी का यह मानना है कि अब इसको दोबारा से गढ़ा जाना चाहिए और केंद्र सरकार संसद बैठ कर के सदन बैठ कर के इस बात को निर्धारित करें कि वास्तव में अल्पसंख्यक आखिरकार है कौन तो 90 दिन का समय दिया गया है है और इस चीज को निर्धारित करना पीएमओ के हाथ में है वह कोई भी क्राइटेरिया तय कर सकते हैं हालांकि अश्विनी उपाध्याय वही व्यक्ति हैं जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण कानून हम दो हमारे दो दो सबके दो को भी जो कि यति स्वामी नरसिंहानंद सरस्वती जी ने एक आंदोलन चलाया हुआ है उसको भी उन्होंने सपोर्ट किया है कॉमन सिविल कोड को लेकर के या फिर कहें कि जो तीन तलाक का मुद्दा है वह पूरी भारतीय जनता पार्टी में यदि कोई लेकर के आया है वो भी अश्विनी उपाध्याय जी हैं जो कि लेकर के आए हैं बहुत ही एक सीनियर एडवोकेट है सुप्रीम कोर्ट के अब देखना यह होगा कि अंततः इसमें क्या फैसला आता है सरकार क्या सोचती है क्या कहती है क्या उसके ऊपर निर्णय आता है इसके ऊपर भी सब लोगों की नजर काफी लंबे समय से बनी हुई थी मुझे लगता है कि तीन तलाक से ज्यादा महत्त्वपूर्ण मुद्दा है कि अब जो लोग 20 से 25 प्र हो चुके हैं कब तक वह अंगूठा चूसते रहेंगे कब तक उनको बेड पर पड़े पड़े खुद बोतल से दूध चाहिए होगा कब तक लोग कमाते रहेंगे और इन लोगों को खिलाते रहेंगे कब तक आखिरकार यह कोटे को खाते रहेंगे जिसमें कि असल अल्पसंख्यक लोगों का हिस्सा होना चाहिए था और जो अल्पसंख्यक है जिनको हमको आगे बढ़ाना चाहिए था वह लोग वास्तव में कर खा रहे हैं और टैक्स भी पे कर रहे हैं और वास्तव में जो अल्पसंख्यक नहीं बल्कि बहुसंख्यक हो चुके हैं जो दावा करते हैं कि हमने 800 साल तक यहां पर शासन किया है आज उन्हीं को बोतल में दूध चाहिए तो अब देखना यह होगा कि 90 दिन का जो समय दिया गया है उसमें सरकार जो है हमारी वह कितनी तत्परता दिखा कितने अच्छे तरीके से और कितने जल्दी तरीके से उस काम को आगे बढ़ाती है और करती है और यहां पर इस बात से हम बिल्कुल भी इंकार नहीं कर सकते कि यदि इस पर अच्छे तरीके से जो अश्विनी उपाध्याय जी ने कहा है कि 1 प्र से ज्यादा जो भी लोग हैं उनको अल्पसंख्यक माना ही नहीं जाना चाहिए ऐसे में जल्द ही मुसलमानों का जो अधिकार है यह अल्पसंख्यक कोटे में यह जल्दी छिन सकता है समाप्त हो सकता है और भारत में एक समानता का जो माहौल बनेगा उसके बाद में वो बहुत ही घोषणा मा होगा और सभी को इस बात की एक गारंटी भी प्राप्त होगी गारंटी मिलेगी कि हां भाई भारतवर्ष में अब समानता के लिए काम भी हो रहा है क्योंकि ऐसा बिल्कुल नहीं होना चाहिए कि एक पक्ष कमा कमा करके देता रहे और दूसरा व्यक्ति झूठ के आधार पर खुद को जबकि वो बहुसंख्यक है फिर भी अपने आप को केवल चोरी का माल खाने के लिए अपने आप को अल्पसंख्यक सिद्ध करता रहे दिखाता रहे और खाता रहे इसमें सभी को सामने आना चाहिए और खुद मुसलमानों की तरफ से अब तलक इस बात की आवाज क्यों नहीं उठी कि भाई अब हम बहुसंख्यक हो चुके हैं जब इनकी तबलीग लगती हैं और वहां पर बैठ कर के इनके मौलाना मौलवी चिला चिला करके कहते हैं तुम 35 करोड़ हो चुके हो तुम अपने आप को कम मत समझो तो वही मौलाना मौलवी यह क्यों नहीं कहते कि हमारा अल्पसंख्यक का जो कोटा है उसको खत्म कर दिया जाए हमको अल्पसंख्यक के दायरे से बाहर किया जाए यह डबल स्टैंडर्ड आखिरकार क्यों इसके बारे में भी लोगों को सोचना चाहिए इसके बारे में भी इनके आलिम को इनके जो कल्ट गुरु है उनको भी सोचना चाहिए और फिर मैं अपील करूंगा अपने देश के सभी लोगों से चाहे वह कोई भी हो कि वह सभी लोग सामने आए और कहे कि इसका निर्धारण एक बार फिर से सोच समझकर होना चाहिए कि कौन अल्पसंख्यक में रहे और कौन बहुसंख्यक में रहे आपने यह वीडियो देखा आपका बहुत-बहुत धन्यवाद मेरे संग बोले सत्य सनातन वैदिक धर्म की जय जय हिंद वंदे मातरम
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😲 अपना Point साबित के लिए इतने कुतर्कआइये कुछ Cross Questions करें।
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